खरी-खरीः बाबरी विध्वंस में थी मोदी के ‘न्यू इंडिया’ की नींव, आज फैसले के बाद भी देश की साझी विरासत जिंदा

6 दिसंबर,1992 को अयोध्या में जो हुआ था, वह केवल चुनाव जीतने की राजनीति नहीं थी। उस रोज तो एक ‘न्यू इंडिया’ के निर्माण की केवल नींव रखी गई थी और आज मोदी जिस ‘न्यू इंडिया’ की बात करते हैं, वह संघ के सपनों का वैसा ही हिंदू भारत है जैसा जिन्ना का पाकिस्तान है।

फोटोः सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

छह दिसंबर, 1992 को जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस आरंभ हुआ तो उस समय मैं दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में था। मुझे अच्छी तरह याद है कि वह रविवार का दिन था। परंतु क्लब 11 बजे सबह से ही पत्रकारों से खचाखच भरा था। दिल्ली के लगभग आधे पत्रकार अयोध्या जा चुके थे। जो यहां रह गए थे, उनको यह आभास था कि 6 दिसंबर, 1992 को कुछ बड़ा होने वाला है। इसी कारणवश सभी पत्रकार जल्दी-जल्दी प्रेस क्लब पहुंच रहे थे।

लगभग ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे के करीब हमारे मित्र और ‘टेलीग्राफ’ अखबार के जाने-माने पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने मुझसे कहा, मस्जिद पर कारसेवक चढ़ गए हैं और बाबरी मस्जिद तोड़ी जा रही है। मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैं उस समय ‘इंडिया टुडे’ का मुख्य राजनीतिक संवाददाता था और मैं अपने संपादक अरुण पुरी को एक सप्ताह से यही समझा रहा था कि कुछ भी हो जाए, बीजेपी मस्जिद नहीं गिराएगी।

अतः संकर्षण की बात की पुष्टि करने के लिए मैंने तुरंत उस समय अयोध्या मामला देख रहे केंद्रीय मंत्री रंगराजन कुमारमंगलम को फोन लगाया और पूछा, ‘क्या मस्जिद गिराई जा रही है।’ उन्होंने पुष्टि कर दी। उस समय हल्का-सा झटका लगा। परंतु वह पत्रकारिता की जवानी थी। हम दिनभर दिल्ली में कहां क्या हो रहा है, यह सब पता करने में लग गए। देर रात को थके-हारे घर पहुंचे। उन दिनों भारत में केवल बीबीसी टीवी का प्रसारण होता था। थोड़ी देर में बीबीसी देखने लगे। मस्जिद तोड़े जाने का दृश्य देख न जाने क्या बात हुई कि आंखों से आंसू टपटप बह निकले। मानो, एक युग बीत गया हो।

और निःसंदेह 6 दिसंबर, 1992 को एक युग बीत गया। क्योंकि उस रोज पहली बार यह आभास हुआ कि हम मुसलमान भी हैं। मेरा जन्म और परवरिश एक ऐसे घराने में हुआ था, जिसमें राम हमारी साझी विरासत थे। दशहरे के दिन स्वयं हमारे पिता हमारी उंगली पकड़कर हमको भगवान राम के दर्शन कराने ले जाते। हम सब भाई दर्शन करते और मेले से खरीददारी कर ऐसी खुशी से लौटते, जैसे ईद हो गई। 1992 को मानो किसी ने हमसे हमारे राम को छीन लिया हो।

फिर भी हम संभले और मन को ढांढस बधाया कि यह सब राजनीति है और राजनीति में तो यह सब लगा रहता है। मन में फिर यही विचार कौंधा कि भला सदियों पुरानी साझी विरासत वाले हिंदुस्तान को बीजेपी एक पाकिस्तान-जैसा हिंदू पाकिस्तान कैसे बना सकती है। 1993 में मुंबई में हुए दंगे देखे, गुजरात में नरसंहार हुआ, फिर भी भारत की साझी सभ्यता से अटूट विश्वास नहीं टूटा। सन 2014 में स्वयं ‘हिंदू हृदय सम्राट’ नरेंद्र मोदी के दिल्ली में सत्तासीन होने के बाद भी यह विश्वास नहीं टूटा।

परंतु सन 2019 में मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद एक वर्ष के भीतर ही यह प्रतीत हो गया कि 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में जो कुछ आरंभ हुआ था, वह केवल चुनाव जीतने की राजनीति नहीं थी। उस रोज तो एक ‘न्यू इंडिया’ के निर्माण की केवल नींव रखी गई थी। और आज नरेंद्र मोदी जिस ‘न्यू इंडिया’ की बात करते हैं, वह संघ के सपनों का वैसा ही हिंदू भारत है जैसा जिन्ना का पाकिस्तान है। 6 दिसंबर, 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय यह विश्वास था कि सब ठीक हो जाएगा। भला इस देश में हम मुसलमानों के अधिकारों पर क्या आंच आएगी। उस रोज केवल दुःख ही नहीं, आक्रोश भी था और फिर से एक साझा हिंदुस्तान खड़ा करने की ललक भी थी।

लेकिन 28 वर्षों बाद आज जब लाल कृष्ण आडवाणी सहित कुल 32 आरोपियों को मस्जिद गिराने की साजिश में बाइज्जत बरी कर दिया गया तो कोई आश्चर्य भी नहीं हुआ। यह प्रतीत हुआ कि यह तो होना ही था। क्योंकि सन 1949 में जिस समय बाबरी मस्जिद के अंदर राम लला यकायक प्रकट हो गए, तब से आज तक इस मामले में अदालतों से बाबरी मस्जिद वालों को कभी कोई राहत नहीं मिली। फिर कुछ माह पहले सुप्रीम कोर्ट ने जिस प्रकार राम मंदिर मामले में अपना फैसला सुनाया तो उसके बाद रही-सही उम्मीद भी टूट गई।

30 सितंबर, 2020 को जो फैसला आया, उसका आभास सभी को ही था। फैसला तो, बस, एक औपचारिकता थी। अब न आंखें डबडबाई, न गुस्सा आया और न ही आश्चर्य हुआ! आखिर पिछले लगभग तीस वर्षों में यह कैसा परिवर्तन हुआ! कहा ना, इन तीन दशकों में एक युग बीत गया। लाल कृष्ण आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा के समय जिस धर्मनिरपेक्षता को ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का तमगा पहनाया, नरेंद्र मोदी ने उस धर्मनिरपेक्षता का गला घोंट दिया।

हम-आप मानें या न मानें लेकिन यह कटु सत्य है कि मोदी ने अब हिंदू की मानसिकता ही बदल दी। पहले तो यह विश्वास जगाया कि मुगलों, अर्थात मुसलमानों ने हिंदू भारत को हिंदुओं से छीन लिया था। बाबरी मस्जिद गिराकर और उसी स्थान पर राम मंदिर निर्माण करवाकर इस देश को मुस्लिम गुलामी से स्वतंत्र करवा दिया। तब ही तो 5 अगस्त, 2020 के रोज राम मंदिर का कार्य शुरू होने की 1तुलना मोदी जी ने 15 अगस्त से की।

इस प्रकार एक ‘नए हिंदू भारत’ के निर्माण का सपना जगा दिया। और आज औसत हिंदू इसी मानसिकता के साथ जी रहा है और उसको यह प्रतीत हो रहा है कि भले ही उसको कुछ मिल रहा हो या न मिल रहा हो, कम-से-कम उसको मुसलमानों से मुक्त एक हिंदू भारत तो मिल ही गया। और इस आनंद से तृप्त वह तमाम संकट झेलने के बावजूद मोदी जी के नाम पर बीजेपी को धन्यवाद के तौर पर अपना वोट देता रहता है।

इसको आप युग परिवर्तन नहीं तो क्या कहेंगे! महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे महापुरुषों ने जिस भारत का निर्माण किया था, वह भारत आज बिखर-सा गया है। परंतु क्या वाकई मस्जिद-मंदिर के एक प्रकरण ने और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व ने भारत की सदियों पुरानी साझी विरासत को छिन्न-भिन्न कर दिया! क्या आज इस देश का हिंदू अपने बाप-दादा की मान्यताओं को संपूर्णतया ताक पर रख चुका है! क्या मोदी जी ने भारतीयों की मानसिकता यानी उनके डीएनए को ही बदल दिया है!

इतिहास में यह कोई पहला अवसर नहीं कि जब इस प्रकार एक राष्ट्र और समाज की मानसिकता के परिवर्तन की चेष्टा हुई हो। 1930 और 1940 के दशकों में जर्मनी में हिटलर ने यहूदियों के प्रति घृणा उत्पन्न कर एक ‘नए जर्मनी’ का निर्माण कर दिया था। आज उसी जर्मनी में हिटलर सबसे बड़ा खलनायक है। इसमें कोई शक नहीं कि उस राजनीति में लाखों यहूदी मारे गए थे और स्वयं जर्मनी को ही नहीं, पूरे यूरोप को द्वितीय विश्व युद्ध की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। परंतु हिटलर ने जिस मानसिकता को जन्म दिया था, आज वही मानसिकता जर्मनी में पाप है।

ऐसे ही जिस ‘न्यू इंडिया’ का भ्रम मोदी जी ने फैलाया है, वह केवल एक भ्रम है। घृणा के आधार पर मनोवैज्ञानिक तृप्ति देकर एक नेता कुछ समय तक विनाश तो उत्पन्न कर सकता है लेकिन वह किसी समाज का डीएनए परिवर्तन नहीं कर सकता है। इस देश का हिंदू वैसे ही मेरा भाई है जैसे वह उस समय था, जब मेरे पिताजी हमको उंगली पकड़कर इलाहाबाद का दशहरा दिखाने ले जाते थे। भले ही बाबरी मस्जिद ढहा दी गई हो परंतु तुलसी के भगवान राम आज भी वैसे ही मर्यादा पुरुषोतम हैं जैसे वह पहले थे।

यह ‘न्यू इंडिया’ का भ्रम विनाश और कुछ समय की झूठी तृप्ति तो दे सकता है, लेकिन युगों की सुख-समृद्धि नहीं दे सकता है। अतः मुझे विश्वास है कि हम नहीं, तो हमारे बच्चे उसी साझी विरासत वाले हिंदुस्तान में हसेंगे-खेलेंगे जो हमारे पुरखों का हिंदुस्तान था। और वह हिंदुस्तान आज के अयोध्या के फैसले के बावजूद मोदी का ‘न्यू इंडिया’ नहीं होगा।

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Published: 02 Oct 2020, 9:14 PM