‘शाहिन बाग’ का ‘भूत’ परेशान करता रहेगा, क्योंकि आंदोलन संविधान बचाने के संघर्ष से जुड़ा है

शाहीन बाग के असर को सांप्रदायिकता से खत्म करने की कोशिश जारी है, वैसे ही जैसे देश में जब-जब सामाजिक न्याय के लिए फैसले हुए तब-तब वर्चस्ववाद ने सांप्रदायिकता से उस न्याय की चेतना को बनने से रोकने की कोशिश की। चेतना का निर्माण ही एक आंदोलन का हासिल होता है।

फोटोः सोशल मीडिया
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अनिल चमड़िया

2 अप्रैल 2018 राजनीतिक आंदोलनों के इतिहास की इसीलिए महत्वपूर्ण तारीख नहीं है, क्योंकि उस दिन भारत बंद सफल हुआ। उन लोगों ने भारतीय संविधान में अपने हक को बचाए रखने के लिए उस दिन बंद का आह्वान किया था, जिन्हें भारतीय समाज में अछूत कहा गया है। वह आह्वान अखिल भारतीय या राष्ट्रीय का बैनर लगे किसी कार्यालय से नहीं किया गया था। संसद की राजनीति करने वाले नेताओं ने तो इस आह्वान को अनदेखा किया था। बड़ी कंपनियों वाले मीडिया ने खबरें तक नहीं दी थी, बल्कि बंद के सफल होने के बाद गालियां निकाली थी। सरकारी खुफिया तंत्र भी इसका अंदाजा नहीं लगा सका था।

अब मान लें कि उस आंदोलन में कोई जज्बाती तौर पर जुड़ा और वह उस पार्टी का सदस्य हो जाए जो दलितों को अछूत मानने की विचारधारा की समर्थक हो? तो क्या यह माना जाए कि उस ऐतिहासिक दिन की स्क्रिप्ट नागपुर में लिखी गई थी? मेरे एक परिचित हैं जो एक ऐसी पार्टी में दलित नेता के रुप में विख्यात कराए गए हैं, जिस पार्टी में उनसे कहा गया है कि उसे दलित नेता ही चाहिए, दलितों के लिए नेता नहीं चाहिए।

पार्टियों में दलित नेता हैं, लेकिन दलितों के लिए बंद को सफल कर सैकड़ों की संख्या में कार्यकर्ता और संगठन तैयार कर लिए जाते हैं। मशहूर कवि नामेदव लक्ष्मण ढसाल 1972 में दलित पैंथर नामक संगठन बनाने वालों में एक थे। लेकिन उन्होंने उस शिवसेना से गठबंधन किया जिस शिवसेना के बनने की वजह दलित पैंथर के प्रभाव को खत्म करने के लिए साम्प्रदायिक राजनीति की जमीन तैयार करना था।

यह पृष्ठभूमि दिल्ली स्थित शाहीन बाग में सीएएए और उससे जुड़े मुद्दों के खिलाफ प्रतिरोध के कार्यक्रम में सक्रिय कुछ कार्यकर्ताओं के भारतीय जनता पार्टी के सदस्य के रुप में बहाली को लेकर बातचीत की गर्मी को समझने के लिए है। इसे दो तरह से दिखाने की कोशिश की जा रही है । एक ‘दिल्ली वासी सरकार’ चला रही आम आदमी पार्टी के अनुसार शाहीन बाग की स्क्रिप्ट बीजेपी कार्यालय में लिखी गई। शायद आम आदमी पार्टी ने यह इंवेस्टिगेशन दिल्ली दंगे के पुलिस इंवेस्टिगेशन से उधार लिया है।

दूसरा, अपने बनाए कानून के विरोध में खड़े आंदोलन और मुस्लिम कार्यकर्ताओं को अपने खेमे में बहाल कर बीजेपी के ‘सबका साथ’ को सही मनवा लेने की कोशिश है। प्रचार और सच का रिश्ता बन नहीं पाता है। ‘आप’ के पास इस प्रचार के अलावा और क्या हो सकता है? बीजेपी और ‘आप’ में विचारधारा का अंतर नहीं है। सरकार चलाने के तौर-तरीकों को लेकर मतभेद हैं। संसदीय राजनीति इतने मतभेद के लिए अलग पार्टी और नेतृत्व की गुंजाइश और संभावनाओं वाला लोकतंत्र माना जाता है।

दूसरे नजरिये से देखें तो ‘आप’ ने शाहीन बाग और बीजेपी को एक साथ बताकर ‘शाहीन बाग आंदोलन’ के दौरान अपनी भूमिका को सही करार देने की कोशिश की है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों के दौरान उसकी भूमिका क्या रही है और उसे शाहीन बाग आंदोलन से जोड़ने की कोशिश हो रही है। यानी ‘आप’ अपनी भूमिकाओं पर उठने वाले सवालों पर पानी फेर देने के लिए इस अवसर का इस्तेमाल करना चाहती है। उसकी नजर में समाज में चेतना नहीं होती है और वह हमेशा किसी इशारे पर आंदोलनों में उतरती हैं।

इसी तरह बीजेपी के लिए दिल्ली के शाहीन बाग में सक्रिय दिखने वाले कुछ जज्बाती किस्म के लोगों को शामिल करने का मकसद हिन्दुत्ववाद की राजनीति की वैधता को प्रचारित करने के अलावा कोई और अहमियत नहीं है। 1980 के बाद से अब तक कितने मौकों पर कितने मुसलमानों को बीजेपी ने अपने में शामिल किया है और उनका क्या हुआ? मुस्लिम ब्रांड के दो रत्नों के अलावा क्या कोई तीसरा बाजार में दिखता है ?

इस पूरे घटनाक्रम को केवल प्रचार की सामग्री के रूप में ही देखा जा सकता है। इसका और कोई राजनीतिक विश्लेषण नहीं हो सकता है। जिस शहजाद नाम के कार्यकर्ता को प्रचारित किया जा रहा है, वह दिल्ली के शाहीन बाग में ही सक्रिय था, यह दावा अधूरा है। वह राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल में भी था और यूनाईटेड एगेंस्ट हेट के साथ भी सक्रिय रहा है।

अब यह कोई मनोवैज्ञानिक बेहतर बता सकता है कि निजी महत्वकांक्षाएं किस तरह के फैसलों के हदों तक जा सकती हैं। लेकिन यह सच है कि जज्बात को विचारधारा में बदलने में तपना पड़ता है। विचारधारा में ढलने की कसौटी होती है कि व्यक्ति के जज्बात सामूहिक चेतना में बदल जाएं। केवल जज्बात कहीं भी, कभी भी लुढ़क जाता है।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि शाहीन बाग के सवालों से पीछा छुड़ाने की कोशिश दिख रही है। शाहीन बाग दिल्ली के एक इलाके का नाम है, लेकिन यहां जो शाहीन बाग है, वह एक आंदोलन का नाम है। यह आंदोलन बेशक इलाके के नाम से जाना जाता है, जहां बीच दिसंबर 2019 में सीएए विरोधी कार्यक्रम शुरू हुआ। क्या कोई भी यह कह सकता है कि शाहीन बाग आंदोलन का कोई एक नेतृत्व है?

इस आंदोलन की खासियत यह है कि आंदोलन ही नेता है और यह सबसे ज्यादा मुश्किलों में वर्चस्व की राजनीति को डालता है। नेतृत्व की पहचान जब समूह बन जाता है तो वह आंदोलन के फैलने की सीमाओं को खत्म कर देता है। देश भर में पंचायत, तहसील, जिला स्तर पर शाहीन बाग खड़े हो गए। इनकी तादाद शायद वर्षों के शोध के बाद सामने आएं। लेकिन उन दिनों समाचार पत्रों का महत्व बढ़ गया तो इसीलिए कि वे शाहीन बागों से भरे रहते थे।

इस शाहीन बाग आंदोलन को जरूर मुस्लिम पहचान देने की कोशिश की गई, लेकिन सच की यह सीमा नहीं है। सच तो यह है कि जिस तरह से 2 अप्रैल 2018 के आह्वान का अंदाजा भारतीय समाज का नेतृत्व करने वाले ढांचे को नहीं लगा था, उसी तरह सीएए बनाने से पहले उसके देश स्तर पर विरोध का अंदाजा नहीं था। यह अंदाजा तो बिल्कुल ही नहीं था कि जिन महिलाओं को तीन तलाक सुनने से मुक्ति के प्रचार का हिस्सा बनाया गया है, वे महिलाएं उस आंदोलन का चेहरा बन सकती हैं।

दरअसल हिन्दुत्ववादी राजनीति का एक औजार है- सोशल इंजीनियरिंग। मसलन यदि दलितों में कुछ जातियों के बीच आर्थिक-सामाजिक संबंधों के कारण मतभेद हैं, तो उन्हें गहरा करके आपस में बांटने में मिलने वाली कामयाबी को सफल इंजीनियरिंग माना जाता है। जातीय, धार्मिक, लैंगिक, भाषाई, क्षेत्रीय समाज पर वर्चस्व रखने वाली विचारधाराएं अपनी इसी तरह की इंजीनियरिंग के बदौलत सत्ता में बनी रहती हैं और यह सोचती हैं कि अपने हर फैसले को कामयाब बना लेंगी। राजनीति बांटने को कहते हैं लेकिन एकजुट होना भी उतनी ही राजनीति है। केवल वर्चस्व रखने वाली राजनीति ज्यादा दिखती जरूर हैं, लेकिन न दिखने वाली राजनीति भी उतनी ही सक्रिय रहती है। 2 अप्रैल 2018 का उदाहरण सामने है।

शाहीन बाग आंदोलन को भी देंखे तो वह 22 मार्च 2020 को कोराना महामारी के बहाने लॉकडाउन की घोषणा के साथ धीरे-धीरे सामूहिक जुटान के कार्यक्रमों से दूर होता चला गया। लेकिन तब तक शाहीन बाग कार्यक्रम नहीं रह गया था, वह एक देश स्तर का आंदोलन हो गया। आंदोलन की खासियत होती है, वह चेतना का हिस्सा बन जाती है। शाहीन बाग आंदोलन संविधान को बचाने के संघर्ष से जुड़ता गया। किसी भी आंदोलन के फैलाव के संकेतों को सबसे ज्यादा असुविधाजनक माना जाता है। आज भी हम क्यों 1947 की आजादी के आंदोलन की बात को दोहराते हैं। यह आंदोलनों के गहरे प्रभाव का सूचक है। इतिहास को हम याद करते हैं क्योंकि वह गहरे स्तर पर हमारी चेतना का हिस्सा होता है।

शाहीन बाग आंदोलन के असर को साम्प्रदायिकता से खत्म करने की कोशिश की गई, वैसे ही जैसे देश में जब-जब (बिहार में कर्पूरी ठाकर की सरकार, गुजरात में अमर सिंह चौधरी की सरकार, 1991 में केंद्र सरकार आदि में) सामाजिक न्याय के हक में फैसले किए गए तब-तब वर्चस्ववाद ने साम्प्रदायिकता से उस सामाजिक न्याय की चेतना को बनने से रोकने की कोशिश की। चेतना का निर्माण ही किसी आंदोलन का हासिल होता है।

शाहीन बाग के कार्यक्रम तो खत्म हो गए, लेकिन देश में हजारों-हजार संविधान के पक्ष में लड़ने वाले कार्यकर्ता दिखने लगे। वे महिलाएं जिन्हें बुरके में बंद बताया गया, वे सड़कों पर नारे लगाती दिखीं। ये जाड़े के दिनों की बात है और उन्हें बच्चों के साथ रात-रात भर जागते देखा गया। सत्ता के जोर जुल्म, पांच सौ में बिकने की तोहमत, गोली की दशहत से डराने के अलावे और न जाने क्या- क्या!

इस ताकत को क्या दर्जन भर लोगों को जेल में डालकर खत्म किया जा सकता है? दर्जन भर शब्दों से उनके भरोसे को कमजोर किया जा सकता है। शाहीन बाग के आंदोलनकारी दर्जन भर अक्षर हैं और उनका उस भरोसे के सीने में बारूद की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है, जिसने शाहिन बाग आंदोलन बनाया । वह एक भूत की तरह परेशान और पीछा कर रहा है।

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