मरुधरा का महासंकट: उजड़ते ओरण और अस्तित्व की लड़ाई

अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान की धरती पर आज फिर से 'सिर साठे रूँख रहे' का आह्वान हो रहा है। यह समय नीति निर्माताओं के लिए आत्ममंथन का है कि क्या हम एक पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करके प्राप्त की गई बिजली को वास्तव में 'हरित ऊर्जा' कह सकते हैं?

राजस्थान में इन दिनों ओरण बचाओ आंदोलन जारी है। कई तरह से इन पवित्र वनों के बचाने की मुहिम जारी है
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पंकज चतुर्वेदी

राजस्थान के पश्चिमी अंचल में इन दिनों एक ऐसी गूँज सुनाई दे रही है, जो आधुनिक विकास के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करती है। बीकानेर और जैसलमेर के रेतीले धोरों से उठा 'खेजड़ी और ओरण बचाओ आंदोलन' महज़ चंद पेड़ों को बचाने की कवायद नहीं है, बल्कि यह उस प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की अंतिम पुकार भी है, जिसने सदियों से थार के मरुस्थल को जीवंत बनाए रखा है।

विडंबना यह है कि जिस 'हरित ऊर्जा' को हम वैश्विक जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में देख रहे हैं, वही सौर परियोजनाएं आज राजस्थान के 'देव-वनों' यानी ओरण और राज्य वृक्ष 'खेजड़ी' के अस्तित्व का संकट बन गई हैं। यह संघर्ष इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब विकास की योजनाएं स्थानीय भूगोल और जैव-विविधता को नजरअंदाज करती हैं, तो वे वरदान के बजाय अभिशाप सिद्ध होने लगती हैं।

मरुस्थल के पर्यावरण में 'ओरण' की महत्ता को वैज्ञानिक और सामाजिक, दोनों ही धरातलों पर समझना आवश्यक है। ओरण वे सामुदायिक वन क्षेत्र हैं, जिन्हें लोक देवताओं के नाम पर समर्पित कर दशकों और सदियों से संरक्षित किया गया है। सरकारी दस्तावेजों में भले ही इन्हें 'वेस्टलैंड' (बंजर भूमि) के रूप में वर्गीकृत किया गया हो, लेकिन पारिस्थितिकी विज्ञान के नजरिए से ये 'बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट' हैं। ओरण' शब्द 'अरण्य' (वन) से निकला है। यह एक ऐसी सामुदायिक भूमि होती है जिसे किसी स्थानीय लोक देवता (जैसे पाबूजी, गोगाजी, या रामदेवजी) के नाम पर समर्पित कर दिया जाता है। यहाँ की वनस्पति को काटना धार्मिक रूप से वर्जित होता है, जिससे ये क्षेत्र प्राकृतिक रूप से संरक्षित रहते हैं।

राजस्थान में लगभग 25,000 ओरण हैं, जो करीब 6 लाख हेक्टेयर भूमि पर फैले हैं। ये क्षेत्र न केवल दुर्लभ वनस्पतियों के घर हैं, बल्कि लुप्तप्राय गोडावण , चिंकारा और रेगिस्तानी लोमड़ी जैसे जीवों के लिए अंतिम शरणस्थली भी हैं। यहां की जैव-विविधता अन्य मरुस्थलीय क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है, जो पूरे क्षेत्र के सूक्ष्म-जलवायु को नियंत्रित करती है। ओरण की घनी वनस्पति और घास मिट्टी को बांधकर रखती है। यह धूल भरी आंधियों की तीव्रता को कम करती है और 'डेजर्टिफिकेशन' (रेगिस्तान के फैलने) को रोकती है। अधिकांश ओरणों के केंद्र में एक 'नाडी' (तालाब) या कुआं होता है। पेड़ों की जड़ें जमीन के जल स्तर को बनाए रखने में मदद करती हैं और मिट्टी में नमी बरकरार रखती हैं।


थार मरुस्थल में मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ओरण और खेजड़ी का विनाश इसी गति से जारी रहा, तो धूल भरी आंधियों की तीव्रता उत्तर भारत के मैदानी इलाकों, यहां तक कि दिल्ली-एनसीआर तक, कई गुना बढ़ जाएगी। ओरण की घास और पेड़ों की कमी का सीधा अर्थ है—रेत का अनियंत्रित प्रसार।

कानूनी मोर्चे पर, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि ओरण को 'डीम्ड फॉरेस्ट' माना जाए, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में इन्हें आज भी 'बंजर' के रूप में दर्ज किया जाना एक बड़ी प्रशासनिक चूक है। इसी चूक का फायदा उठाकर ऊर्जा कंपनियां इन जमीनों को कौड़ियों के दाम पर लीज पर ले रही हैं।

वर्तमान संकट का केंद्र वे विशाल सौर पार्क हैं, जिनके लिए मरुधरा के सीने पर लगे लाखों पेड़ों की बलि दी जा रही है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में सौर परियोजनाओं के विस्तार के कारण केवल पश्चिमी राजस्थान में 26 लाख से अधिक खेजड़ी के पेड़ काटे गए हैं।  

वैज्ञानिक शोध (जैसे फोटोवोल्टिक हीट आइलैंड इफेक्ट संबंधी अध्ययन) चेतावनी देते हैं कि सौर पैनलों का अत्यधिक जमाव स्थानीय तापमान को 3 से 4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा देता है। यह ऊष्मा मरुस्थल के नाजुक पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ रही है। इसके अतिरिक्त, 'लेक इफेक्ट' के कारण आकाश से उड़ते पक्षियों को ये नीले पैनल जलस्रोत का भ्रम देते हैं, जिससे टकराकर उनकी मृत्यु हो रही है। यदि यही गति रही, तो गोडावण जैसा राजकीय पक्षी, जिसकी संख्या अब 150 से भी कम रह गई है, इतिहास के पन्नों तक सीमित हो जाएगा।

जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से देखें तो थार मरुस्थल में पानी की एक-एक बूंद स्वर्ण के समान है। लेकिन एक विशाल सौर परियोजना को सुचारू रखने के लिए पैनलों की सफाई हेतु प्रति सप्ताह लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है। यह पानी उसी भूजल स्रोत से खींचा जा रहा है, जो स्थानीय समुदायों और वन्यजीवों की जीवनरेखा है। जब ओरण की ज़मीन पर कंक्रीट के ढांचे और पैनल बिछ जाते हैं, तो वर्षा जल के संचयन की प्राकृतिक प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है, जिससे भविष्य में भयानक जल संकट की आशंका प्रबल हो गई है।


विकास का वह मॉडल जो प्रकृति की कीमत पर खड़ा हो, कभी स्थायी नहीं हो सकता। विकास का पैमाना केवल 'मेगावाट' न हो, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी हो जो सदियों से हमें ऑक्सीजन, चारा और आश्रय देता आया है। मरुभूमि का पर्यावरण, उसकी जैव-विविधता और यहाँ की अनोखी जलवायु को बचाने के लिए ओरण को बचाना अब केवल एक क्षेत्रीय मांग नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय आपातकाल बन चुका है। हमें यह समझना होगा कि बिना खेजड़ी और ओरण के, राजस्थान का मरुस्थल केवल एक तपता हुआ सौर-कांच का घर बनकर रह जाएगा, जहाँ जीवन के लिए कोई स्थान नहीं होगा।

अमृता देवी बिश्नोई के बलिदान की धरती पर आज फिर से 'सिर साठे रूँख रहे' का आह्वान हो रहा है। यह समय नीति निर्माताओं के लिए आत्ममंथन का है कि क्या हम एक पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट करके प्राप्त की गई बिजली को वास्तव में 'हरित ऊर्जा' कह सकते हैं?

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