2014 के बाद पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है 2002 के गुजरात दंगों के पीछे की सोच ने

28 फरवरी 2002 को अहसान जाफरी की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई थी और यह घटना गुजरात के मुसलमानों को अकेला छोड़ देने की एक भयावह मिसाल बन गई। और हकीकत यह है कि 2014 के बाद उस विचारधारा ने पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है जो गुजरात दंगों का आधार था।

1 मार्च, 2002 की अहमदाबाद की तस्वीर जब सुरक्षा बल उन्मादी भीड़ को काबू करने की कोशिश कर रहे हैं (Getty Images)
1 मार्च, 2002 की अहमदाबाद की तस्वीर जब सुरक्षा बल उन्मादी भीड़ को काबू करने की कोशिश कर रहे हैं (Getty Images)
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तीस्ता सीतलवाड़

गुजरात दंगों को 20 साल हो चुके हैं। इस दौरान क्या हुआ और एक समाज के तौर पर हम कहां हैं, इस पर गौर करना जरूरी है जिससे अंदाजा लग सके कि हम किस ओर जा रहे हैं। एक तो, ज्यादातर लोगों ने सबकुछ ‘जज्ब’ कर लेना बेहतर समझा और जिन्होंने इंसाफ पाने की राह पर चलने का फैसला किया, अब उनके कदम भी थकने लगे हैं। लेकिन एक समाज, एक देश के तौर पर आज हम किस मुकाम पर हैं, यह देखना जरूरी है। पीढ़ियों के लिए अपने बेपनाह दर्द का बोझ उठाए जिंदगी को आगे बढ़ाना कितना मुश्किल हो सकता है, यह शायद ‘वे’ देख-समझकर भी महसूस न कर पाएं।

तारीख थी 4 मार्च। मेरी सैंडल के नीचे हजारों कांच के टुकड़े और रबर के यहां-वहां बिखरे टुकड़े आ रहे थे। मिट्टी के तेल में डुबोकर जलाए गए अधजले टायरों के अंगारे हवा में अजीब-सी गंध छोड़ रहे थे। चारों ओर खौफनाक खामोशी। इधर-उधर अधजले इंसानी अंग दिख रहे थे- बाद में इन्हीं में युवा वकील कासिम भाई मंसूरी के परिवार के सदस्य मोहम्मद सांधी के अवशेष की पहचान हुई। हाउसिंग सोसाइटी के तमाम लोगों के जले-अधजले अवशेष ऐसे ही मिले थे। यह था अहमदाबाद के मोघानी नगर स्थित गुलबर्ग सोसाइटी का दिल दहला देने वाला नजारा। जब भी 2002 के गुजरात दंगों की बात होती है, गुलबर्ग सोसाइटी का जिक्र आता है।

अहसान जाफरी साहब के अवशेष भी चौथे दिन उनके घर के सामने से इकट्ठा किए गए थे। वह आम लोगों में बेहद लोकप्रिय थे। गुलबर्ग सोसाइटी के लोगों को भरोसा था कि जब भी कोई मुसीबत आएगी तो वह इंसान उनकी हिफाजत करेगा, जैसा उन्होंने पहले हुए दंगों के दौरान तमाम मौकों पर किया भी था। सौ से ज्यादा लोग अहसान साहब के घर पर जा छिपे थे, उन्हें यकीन था कि यही वह जगह है जहां उनकी जान को खतरा नहीं। लेकिन इस बार लोगों का वह भरोसा टूटने वाला था और इसका अंदाजा दोपहर बाद 2.45 बजे के आसपास हो गया जब पुलिस वालों और प्रभावशाली लोगों को बेसब्री में की गई दर्जनों कॉल के बाद भी किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली। इस बार तो वह मसीहा खास निशाने पर था और अपने लोगों को बचाने की कोशिश करते-करते उसने खुद को खून की प्यासी भीड़ के हवाले कर दिया।

सैकड़ों की संख्या में कांच की बोतलों में सफेद रासायनिक पाउडर, ट्रकों और टेंपो से लदे गैस सिलिंडर जो मुझे गुलबर्ग, नरोदा, सरदारपुरा और पंचमहल में हताश बचे लोगों और गवाहों द्वारा दिए गए थे, ये सामूहिक विनाश के खास औजार थे। गुजरात के 182 विधानसभा क्षेत्रों में से 153 में 300 से ज्यादा जगहों पर हमले की साजिश रची गई थी। एक गवाह के तौर पर मैं जहां-जहां चश्मदीदों से मिली, हर किसी ने अपने-अपने तरीके से आगाह किया कि मैं अपना खयाल रखूं। एक बुजुर्ग ने कहा कि ‘बेटा शहर के बाहर अकेली निकलोगी तो माथे पर तिलक और भगवा दुपट्टा ना भूलना।’ हकीकत भी कुछ ऐसी ही थी। पूरे हाईवे पर बेकाबू भीड़ का कब्जा था। वे आने-जाने वाली गाड़ियों को रोक- रोककर पूछताछ कर रहे थे। कई बार ऐसा हुआ कि मुझे कोई गाड़ी नहीं मिली या फिर खतरे को भांपकर ड्राइवर गाड़ी को छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

28 फरवरी को दोपहर 3 बजे पुलिस कमिश्नर के दफ्तर से महज तीन किलोमीटर दूर अहसान जाफरी की दिन-दहाड़े हत्या कर दी जाती है और यह गुजरात के मुसलमानों को अकेला छोड़ देने की मिसाल बन गया। दरअसल, उसके बाद से 2002 तरह-तरह से हमारे सामने आता रहा है और हकीकत यह है कि 2014 के बाद गुजरात की 2002 की उस ‘मिसाल’ ने तकरीबन पूरे देश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।


जब न्यायिक प्रक्रियाओं की अवहेलना की जाती है और सामूहिक नरसंहार को अंजाम देने वाले लोग और पार्टियां सत्ता पिरामिड की चोटी पर पहुंच जाएं तो संवैधानिक शासन के प्रति गणतंत्र की प्रतिबद्धता खोखली हो जाती है। भारत ने 1948 के जीनोसाइड कन्वेंशन के सभी प्रावधानों की 1959 में पुष्टि तो कर दी लेकिन इसे कानूनी जामा नहीं पहनाया गया और इसका नतीजा 2002 में गुजरात और उसके बाद देखने को मिला। हालांकि हम भारतीय संस्थागत और सार्वजनिक स्मृति-लोप के लिए कुख्यात हैं, इसलिए 2002 के गुजरात के कुछ आंकड़ों को याद करना जरूरी हो जाता है। बेरहमी से मार-काट दिए गए 2,000 मुसलमानों के अलावा उनके घर-दुकान-व्यापारिक प्रतिष्ठानों को चुन–चुनकर निशाना बनाया गया। 18,924 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया गया, 4,954 घर पूरी तरह नष्ट कर दिए गए। 10,429 दुकानें जला दी गईं और 1,278 में तोड़फोड़ की गई। मुसलमानों को 4,000 करोड़ का नुकसान पहुंचाया गया। धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को काफी नुकसान पहुंचा। 285 दरगाह, 240 मस्जिदें, 36 मदरसे, 21 मंदिर और 3 चर्च क्षतिग्रस्त/नष्ट हो गए। इनमें से 412 की मरम्मत स्वयं संबद्ध समुदाय ने की और 167 अब भी क्षतिग्रस्त हैं। गुजरात उच्च न्यायालय ने इन स्थलों को सरकार द्वारा दुरुस्त करने का आदेश सुनाया लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे कमजोर कर दिया।

करीब 20 साल बाद दिसंबर, 2021 में जब मुसलमानों के नरसंहार की निर्लज्ज अपील की जाती है तो भारत का सत्तारूढ़ राजनीतिक नेतृत्व खामोशी की चादर ओढ़ लेता है। बहुत पीछे न भी जाएं तो कम-से-कम 2002 के गुजरात तक जाकर तो खूनी सार्वजनिक पृष्ठभूमि को तो खंगाल ही सकते हैं।

क्या हमारी अदालतें भीड़ को उकसाकर उनसे सामूहिक नरसंहार कराने के मामलों में बेबसी से निकलकर वास्तविकता का सामना कर सकती हैं? निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कुल मिलाकर 68 मामलों में हमारे प्रयास बड़े ही उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। बहादुर व्हिसलब्लोअर रहे पुलिस अधिकारियों ने भी भारी कीमत चुकाई है। सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) ने पहले चरण में 172 दोष सिद्धि, 124 आजीवन कारावास सुनिश्चित किया। इनमें से कुछ को अपील में पलट दिया गया और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी पूर्वमंत्री सहित घातक अपराधों के दोषियों को तुरंत जमानत दे दी थी। गोधरा सामूहिक आगजनी मामले में पहली सजा के बारह साल बाद भी उन आरोपियों को अब भी जमानत मिलनी बाकी है।


27 फरवरी, 2002 को गोधरा ट्रेन जलाने के कुछ घंटों के भीतर हुई हिंसा में मिलीभगत और साजिश को साबित करने के क्रम में हमारे लिए 50,000 पन्नों के रिकॉर्ड को सुप्रीम कोर्ट में पेश करना एक बेहद थकाऊ काम था। फिर भी ऐसे सबूतों को इकट्ठा कर पाना एक सुकून का अहसास देने वाला था।

आज, कैलेंडर पर 20 साल का समय बीत चुका है और इस दौरान दर्द, संघर्ष, अपमान और निराशा भरी यात्रा के बीच हमारे जेहन में एक ही सवाल कौंध रहा है- क्या कभी वास्तव में इंसाफ हो सकेगा?

इसका उत्तर भारतीय गणतंत्र के संवैधानिक अवशेषों के बीच कहीं दबा हुआ है।

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