प्रकृति से इंसानों की बढ़ती दूरी, आज विनाश का सबसे मुख्य कारण

हमारे प्रधानमंत्री जी लगातार पर्यावरण संरक्षण की 5000 वर्षों की परंपरा के बारे में बातें करते हैं, पर किसी भी “मन की बात” में पर्यावरण और प्रकृति की गंभीर चर्चा नहीं की है। पर्यावरण और प्रकृति का नाश भी सबसे अधिक हाल के वर्षों में ही किया गया है।

प्रकृति से इंसानों की बढ़ती दूरी, आज विनाश का सबसे मुख्य कारण
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महेन्द्र पांडे

प्रकृति का लगातार विनाश किया जा रहा है और दूसरी तरफ प्रकृति और मनुष्य के बीच का संबंध भी तेजी से कम होता जा रहा है। हम जिस विकास की बात करते हैं, वह तथाकथित विकास प्रकृति से हमें लगातार दूर करता जा रहा है। अब तो बच्चे भी प्रकृति से दूर हैं क्योंकि अभिभावक उन्हें प्रकृति के पास नहीं ले जाते, पर्यावरण के बारे में नहीं बताते। यूनिवर्सिटी ऑफ डरबी की वैज्ञानिक माइल्स रिचर्डसन ने हाल में ही इसी विषय पर एक विस्तृत अध्ययन “अर्थ” नामक जर्नल में प्रकाशित किया है। इस अध्ययन के अनुसार वर्ष 1800 से अब तक प्रकृति से हमारी दूरी 60 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ गई है, और यही प्रकृति विनाश का मुख्य कारण भी है।

प्रकृति से हमारी दूरी इस कदर बढ़ गई है कि अब तो बच्चों के पाठ्यक्रमों में भी प्रकृति का संकेत देने वाले शब्द, जैसे नदी, झरना, मरूभूमि और फूल, इत्यादि कम होने लगे हैं। पर्यावरण शिक्षा के नाम पर जो कुछ पढ़ाया जाता है उसमें भूगोल और जलवायु परिवर्तन अधिक रहता है और समग्र प्रकृति के बारे में कम। शिक्षा में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे बच्चे प्रकृति के करीब जाने के लिए प्रेरित हों। दूसरी तरफ बच्चों को लेकर अभिभावकों का प्रकृति में सैर कराना, पार्क में ले जाना, जंगलों और नदियों के किनारे की सैर के साथ ही उसके बारे में बातें करना और अपने अनुभव साझा करना लगभग खत्म हो गया है। इस अध्ययन के अनुसार पाठ्यक्रमों से प्रकृति सूचक शब्द वर्ष 1800 से वर्ष 1990 के बीच 60.6 प्रतिशत कम हो गए, पर अब यह कमी 52.4 प्रतिशत ही रह गई है। हालांकि वर्ष 1990 के बाद इसमें कुछ सुधार देखा गया है।

प्रकृति से हमारी नजदीकी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है। साइंस रिपोर्ट्स नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोधपत्र का निष्कर्ष है कि प्रकृति की नजदीकी से एकाकीपन कम होता है। प्रकृति से नजदीकी का मतलब है, पानी, पहाड़ों और हरियाली के पास, या फिर खुला नीला आसमान दिखना। समस्या यह है कि दुनियाभर में आवासीय स्थानों में शहर सबसे तेजी से बढ़ रहे हैं, जनसंख्या भी बढ़ती जा रही है, और अधिकतर शहर केवल कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गए हैं। जो शहर कुछ दशक पहले तक हरियाली के लिए जाने जाते थे, वहां भी हरियाली नष्ट कर मकान, बाजार, शॉपिंग मॉल, उद्योग, सड़क और पुल, और ऑफिस काम्प्लेक्स खड़े हो चुके हैं।

ब्रिटिश जर्नल ऑफ एजुकेशनल साइकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, हरे-भरे माहौल में रहने वाले बच्चे ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने में सक्षम होते हैं और जल्दी सीखते हैं। ऐसे बच्चे अध्ययन में, विशेष तौर पर गणित में, उन बच्चों से तेज होते हैं जो हरे-भरे वातावरण में नहीं रहते। यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लन्दन की ईरिनी फ्लोरी की अगुवाई में किये गए इस अध्ययन में 11 वर्ष की उम्र के 4768 बच्चों को शामिल किया गया था जो ब्रिटेन के शहरी क्षेत्रों से थे।


जब हम प्रकृति की बात करते हैं तब यही मानते हैं कि केवल मनुष्य और मनुष्य द्वारा बनाई गई चीजें प्राकृतिक नहीं हैं, शेष सभी प्रकृति का हिस्सा हैं। पूरी दुनिया में प्रकृति की ऐसी ही परिभाषा है। कुछ वैज्ञानिकों, समाज वैज्ञानिकों और मनोवैज्ञानिकों की यह धारणा है कि जब हम प्रकृति से मनुष्य को अलग कर देते हैं तब मनुष्य और प्रकृति के बीच का रिश्ता भी आत्मीय नहीं रह जाता। पिछले कुछ वर्षों से प्रकृति की परिभाषा में मनुष्यों को शामिल करने की मुहिम चल रही है।

पूंजीवाद ने पूरे समाज को पर्यावरण और प्रकृति से दूर कर दिया है। पर्यावरण का विनाश कर शहर बसाये गए और उनका अंतहीन विस्तार किया जा रहा है। रोजगार के अवसरों के कारण गावों को खाली कर आबादी शहरों में बढ़ती जा रही है। इस असीमित आबादी को सुविधाएं देने के नाम पर शहरों के बचे-खुचे प्राकृतिक संसाधन भी नष्ट किए जा रहे हैं। शहरों के बच्चे हरेक तरह के प्रदूषण की मार झेलते हैं। उनके लिए तो निश्चित तौर पर प्रकृति का कोई महत्व नहीं होगा। शहरों के अभिभावक तो अपने बच्चों को बहुत छोटी उम्र से ही घूमने के नाम पर बाजार और मॉल ही ले जाने लगे हैं, या फिर एडवेंचर वाले बनावटी स्थानों पर।

गावों में भी बाजारवाद के बाद से प्रकृति का विनाश किया जाने लगा है। खेती का दायरा बढ़ने लगा है और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट गावों से गुजरने लगे हैं। हरेक ऐसे प्रोजेक्ट अपने पूरे क्षेत्र के पर्यावरण का विनाश करते हैं। पर्यावरण और प्रकृति के बारे में मेनस्ट्रीम मीडिया कभी पूरी जानकारी नहीं देता- हरेक समाचार इसके रौद्र रूप को ही दिखाता है। नदियों की चर्चा बाढ़ के समय, पहाड़ों की भूस्खलन के समय और हवा की चर्चा बढ़ते प्रदूषण के समय ही की जाती है।समाचारों से समाज केवल प्रकृति द्वारा किया जाने वाला विनाश की देखता है और समझता है।जाहिर है ऐसे में समाज को, विशेष तौर पर बच्चों को प्रकृति एक विध्वंसक के तौर पर ही नजर आएगी।

आज के दौर में स्मार्टफोन ने प्रकृति से दूरी बढ़ा दी है। हर कोई यही कहता है कि स्मार्टफोन से पूरे दुनिया आप के हाथ में है और कोई भी ज्ञान आप इससे ले सकते हैं। पर, हकीकत तो यह है कि जिस ज्ञान को, प्रकृति के सहअस्तित्व को आप प्रकृति के बीच में रहकर सीख सकते हैं वह ज्ञान कोई भी स्मार्टफोन नहीं दे सकता है।


“अर्थ” नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार प्रकृति से मनुष्यों की नजदीकी पृथ्वी के साथ ही मानव स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है। इस नजदीकी के लिए आवश्यक है कि शहरी क्षेत्रों में हरियाली का दायरा काम से काम 30 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए। अभिभावक अपने बच्चों को लेकर हरियाली वाले क्षेत्रों में या दूसरे प्राकृतिक स्थानों पर नियमित जाएं और अपने बचपन के अनुभव बच्चों के साथ साझा करें। बच्चों के शिक्षा की शुरुआत में ही उन्हें प्रकृति की पर्याप्त जानकारी दी जाए।

इन सबको ध्यान में रखकर अगले 25 वर्षों की योजना तैयार की जानी चाहिए तभी अगली पीढ़ी अपने स्वास्थ्य के साथ ही प्रकृति को भी बचा पाएगी। हमारे प्रधानमंत्री जी लगातार पर्यावरण संरक्षण की 5000 वर्षों की परंपरा के बारे में बातें करते हैं, पर किसी भी “मन की बात” में पर्यावरण और प्रकृति की गंभीर चर्चा नहीं की है। पर्यावरण और प्रकृति का नाश भी सबसे अधिक हाल के वर्षों में ही किया गया है।

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