इंदौर की त्रासदी: कहना पड़ेगा इस शहर में कभी विकास रहता था

एक मां ने बच्चे को दूध में पानी मिलाकर पिलाया। वह क्या जानती थी कि जो पिला रही है, वह गरल हो चुका है। अमृत काल का डंका बज रहा है और बच्चे जहरीले पानी से दम तोड़ रहे हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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मीनाक्षी नटराजन

कई दिनों से इंदौर शहर सुर्खियों में रहा है। छोटे-छोटे बच्चे विषाक्त पानी पीने से असमय चले गए। भला कौन सोच सकता था कि पीने का पानी विषैला हो जाएगा, वह भी एक ऐसे शहर का पानी जो अपने स्वच्छ होने पर इतराता हो।

कुछ बेहद विचलित करने वाले दृश्य सामने आए हैं। जब एक मां कहती है कि उसने बच्चे को दूध में पानी मिलाकर पिलाया ताकि गाढ़े दूध से नुकसान न हो। दूध को अमृत कहते हैं। वह क्या जानती थी कि जो पिला रही है, वह गरल हो चुका है। वह शायद खुद को उम्र भर कोसती रहेगी। देश में अमृत काल का डंका बज रहा है और बच्चे जहरीले पानी से दम तोड़ रहे हैं।

इस शहर के साथ कई बहुत सुखद यादें जुड़ी हैं। ‘दिल ढूंढता है’ गुनगुनाए जाने वाली यादें। जहां पढ़ाई हुई हो, वह जगह खास होती है। वही शहर जो अहमदनगर से आई देवी अहिल्या बाई की कर्म भूमि बन गई। अट्ठारहवीं सदी की न्यायप्रिय शासक जिनके कारण होलकर राजवंश याद रखा जाता है। वह जितनी धार्मिक थीं, उतनी ही प्रजावत्सल भी। उनके रहते ईस्ट इंडिया कंपनी मनमानी नहीं कर सकी जबकि अनेक दूसरे राजघरानों ने घुटने टेक दिए।

इसी इंदौर की रेजीडेंसी में 1857 की क्रांति में सादत खान ने मशाल जलाई। इसी इंदौर के पास महू की छावनी में बाबा साहेब का जन्म हुआ। देश का विधान "संविधान" बनाने वाले की जन्म भूमि।

इंदौर की अपनी एक पहचान रही है, विशेषकर यहां का पर्यावरण जिसने सबको आकर्षित और प्रभावित किया। इस नगर में कई बाग-बगीचे थे। मोहल्लों के नाम के साथ भी बाग जुड़ा। पक्षी बाग, नारायण बाग सबसे पुराने माने जाते हैं। यह शहर कॉलोनाइजर, भूमाफियों का उपनिवेश होने के बहुत पहले खुली हवा में सांस लेता था। नब्बे के शुरुआती दशक में भी काफी दूर तक पैदल जाया जा सकता था। हालांकि धीरे-धीरे बढ़ते प्रदूषण और ट्रैफिक के पदचाप सुनाई पड़ने लगे थे, फिर भी दुमंजिले छात्रावास के कमरे की खिड़की से मई में भी रात को ठंडी आती थी।

इंदौर समाजवादी, साम्यवादी, प्रगतिगामी, दक्षिणपंथी- सभी तरह के विचारों की सम भूमि रही है। पूरी तरह विपरीत विचार रखने वाले भी सुबह पोहे-जलेबी साथ खाते, एक-दूसरे की घनघोर आलोचना करते और उसको ठिलवई का नाम देते। अपने विचार के प्रति पक्के रहते और दोस्ती के प्रति भी। यह शहर संवाद, वाद-विवाद के लिए प्रसिद्ध रहा। इस शहर ने सबको अपनाया। होमी दाजी, दादाभाई नाइक, कल्याण जैन, पी.सी. सेठी अनेक ऐसे नाम हैं जिनकी विरासत यहां बसती है। यहां शास्त्रीय संगीत का पुरसुकूं रियाज चलते-चलते कई घरों से सुनाई पड़ जाता। लता मंगेशकर यहां से मुंबई गईं। हिन्दी और हिन्दुस्तानी बड़ी नफासत से बोली जाती। शहर उन दिनों बहुत समृद्ध हुआ करता था। मध्यमवर्गीय संघर्ष शीलता, सौहार्द्र इसकी फिजा में था। खान-पान, शिक्षा, कला, संगीत, खेल इस शहर की धड़कन होता था।

फिर समय ने करवट बदली। राजनीति में सिद्धांत का स्थान संसाधन ने लेना शुरू किया। इंदौर में विकास होने लगा। कई पुल टूट गए कि फ्लाई ओवर बन सकें। फिर फसादात हुए। मोहल्ले बंटने लगे। कॉलोनी कटने लगी। भूमाफिया हावी हुए। अवैध कहाती बस्तियां बसने लगीं। तमाम विचार बाजार में तब्दील हुए। शहर सतही तौर पर बेहद साफ दिखाई देता रहा। बाहरी जगमगाहट सबको लुभाती रही। कौन शहर को साफ रखता है, उनकी तरफ वैसे ही किसी का ध्यान नहीं गया। मैनहोल को साफ करते हुए किसी पर क्या बीती की सुध कौन लेता। सफाईकर्मियों के न्याय की बात भी कभी नहीं हुई।

किसी शहर को नियंत्रण से चलाने का नमूना सामने है। नियंत्रण से चलता शहर सुंदर दिखता है। कमियों को ढंकता है, विभिन्नता को कुचलता है। वहां भेद का आकलन ही नहीं हो पाता, क्योकि सारे पुल टूट चुकने के बाद हर तबका बंट गया है। कोई साझा मंच हो तो सामना हो पाए। नियंत्रण से चलते शहर में चंद लोग अपने स्वार्थ के लिए सारी व्यवस्था को नजरअंदाज करते हैं। बुनियाद को ठीक करने की जरूरत नहीं समझते, आवरण सजाते है। मगर नींव की सड़ांध कितनी देर छुपी रहेगी।

वह इस वीभत्स रूप में सामने आई। जिम्मेदार सत्तारूढ़ दल के जनप्रतिनिधि के असंवेदनशील बयान ने माहौल को और विषैला किया। जनप्रतिनिधि अब भी लीपापोती कर रहे हैं। निस्तारण का पानी यदि पेयजल में मिल गया तो किसकी जिम्मेदारी है। यह भी कहा जा रहा है कि असल में पोलो ग्राउंड स्थित औद्योगिक क्षेत्र का रासायनिक अपशिष्ट बिना किसी शुद्धिकरण प्रक्रिया के छोड़ दिया जाता है। सस्ता मुनाफा कमाने हेतु उद्योग ऐसा करते है, फिर पूंजी के आधार से बच निकलते हैं। वैसे, भोपाल त्रासदी वालों को कौन-सा न्याय मिला। अब परमाणु ऊर्जा के नाम पर हर शहर चेर्नोबिल में बदल सकता है।

“मालव धरती गहर गंभीर, पग-पग रोटी डग-डग नीर” कहते थे। अब डग-डग पर विष मिला हुआ है और फिर हम विश्वगुरु होना चाहते हैं।

देश की राजधानी में साफ हवा नहीं, इस शहर में साफ पानी नहीं। यह सब निसर्ग ने जबकि शुद्ध दिया है, वह अब प्रदूषित किया जा रहा है कि हम विकास कर रहे हैं। कुछ सालों में राशन की दुकान से शायद सबको ऑक्सीजन सिलिंडर और पीने का पानी लाइन लगाकर लेना पड़ेगा। उस शहर में बहुत साल तक सीधे नल का पानी पीते थे। आरओ की जरूरत नहीं थी। कभी नहीं सोचा कि बात पानी तक आ जाएगी। इंदौर से लगते कई शहरों में दो दिन में एक बार पानी मिलता है। 'पैसे को पानी-सा मत बहाओ' सुनते थे। अब पैसे देकर पानी भरते हैं।

सवाल शहर के निर्माण से भी जुड़ा है। शहर का निर्माण करता वर्ग, स्टेशन पर आसमान के नीचे सोता है। उसके लिए कोई ठिकाना नहीं। सड़कें धंसती जाती हैं, बार-बार मरम्मत के लिए खुदती है। शहर को समृद्ध करने की कोई दृष्टि नहीं है। शहर की निचली बस्तियां बारिश, गर्मी, सर्दी में तड़पती हैं और कोई नहीं सुनता। बस कुछ मीनारें खड़ी की जाती हैं। स्मार्ट सिटी में मैट्रो बनता है, जबकि पीने तक का पानी मुहैया नहीं। पेड़ कटते हैं, हवा घुटन देती है, सुरक्षा महसूस नहीं होती, अवैध बस्तियों को बसने देते हैं पर सुविधा नहीं देते।

नगरीय निकाय औपचारिक बन कर रह जाता है, समानांतर विकास प्राधिकरण बनते हैं और उनको वे चलाते हैं जो चुने नहीं जाते। किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते। चुने निकाय प्रतिनिधि बजट का संपूर्ण आंकड़ा तक नहीं जान पाते। नागरिकता खो जाती है, या तमाशबीन बनाई जाती है। तेजी से शहरीकृत होते देश में सशक्त नगरीय निकाय के बिना 'निहित स्वार्थ के लिए संसाधनों पर नियंत्रण' को रोका नहीं जा सकता। भूमाफियों का गठजोड़ शहर को मात्र कामधेनु के तौर पर आंकता है।

शहर समृद्ध तब होता है, जब वहां सरोकार हो, जब सीसीटीवी की जरूरत न पड़े; जब नल का पानी सीधे पिया जा सके; जब साफ हवा हो, दूर के पंछी भी वहां आकर बसेरा करते हों। जब शहर की नागरिकता इतनी मजबूत हो कि कोई भूखा न सोए और आसमान के नीचे न सोए; जब शासकीय निकाय के स्कूल और अस्पताल में हर परिवार जा सके; किताब घर बन सकें।

वरना कुछ सालों बाद शहर सीमेंट कंक्रीट के खंडहर से हो जाएंगे। विगत दिनों विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे। पर उन्हीं के अंदाज में उस खंडहर को देखते हुए कहना पड़ेगा, “इस शहर में कभी विकास रहता था”।

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