रूस-उक्रेन युद्ध जैसा ही है तापमान वृद्धि रोकने का मसला, इसके नाम पर केवल यात्राएं कर रहे दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्ष

तापमान वृद्धि भी एक ऐसा ही मसला है। हरेक नई रिपोर्ट तापमान वृद्धि की पहले से भी अधिक भयानक तस्वीर पेश करती है।

फोटो: सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

रूस-उक्रेन युद्ध को लगभग 80 दिन हो गए– युद्ध जारी है और पूरी दुनिया केवल इसपर चर्चा ही कर रही है और इसके नाम पर दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्ष केवल यात्राएं कर रहे हैं। आज के दौर में हरेक समस्या का हल ऐसे ही निकाला जाता है – तामझाम से अन्तराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किये जाते हैं, तमाम घोषणाएं की जाती हैं, कुछ स्वघोषित विश्वगुरु पनपते हैं और इन सबके बीच समस्याएं पहले से अधिक विकराल रूप धारण करती जाती हैं। तापमान वृद्धि भी एक ऐसा ही मसला है। हरेक नई रिपोर्ट तापमान वृद्धि की पहले से भी अधिक भयानक तस्वीर पेश करती है।

यूनाइटेड किंगडम के मौसम विज्ञान विभाग ने दुनिया के अनेक संस्थानों के साथ मिल कर मई 2022 में तापमान वृद्धि से सम्बंधित एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसके अनुसार जिस 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की उम्मीद दुनिया इस शताब्दी के अंत में कर रही है, उसका नजारा अगले 5 वर्षों में ही दिख जाएगा। इस रिपोर्ट के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक संभावना है कि अगले 5 वर्षों के दौरान कम से कम एक वर्ष ऐसा होगा जिसमें औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाएगा। वर्ष 2015 तक ऐसा अनुमान 0 प्रतिशत था, पर इसके बाद के वर्षों में इसकी संभावना लगातार बढ़ती रही। कोविड 19 के दौर में जब पूरी दुनिया बंद हो गयी, तब भी तापमान वृद्धि पर असर नहीं हुआ। वर्ष 2020 में अगले 5 वर्षों के दौरान 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की संभावना 20 प्रतिशत बताई गयी थी, पर अगले ही वर्ष 2021 में यह संभावना 40 प्रतिशत तक पहुँच गयी। वर्ष 2021 में औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में 1.1 डिग्री सेल्सियस अधिक था।


इस रिपोर्ट के अनुसार 93 प्रतिशत संभावना है कि वर्ष 2026 तक कम से एक वर्ष ऐसा होगा, जो सर्वाधिक गर्म वर्ष रहेगा। वर्तमान में सबसे गर्म वर्ष का रिकॉर्ड, वर्ष 2016 के नाम है। अगले 5 वर्षों का औसत तापमान पिछले 5 वर्षों के औसत तापमान से अधिक रहेगा। यूनाइटेड किंगडम के मौसम विभाग के प्रमुख डॉ पेत्तेरी टल्लास के अनुसार इस शताब्दी के अंत तक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोकने का लक्ष्य रखा गया है, और यह 1.5 डिग्री महज एक संख्या नहीं है, बल्कि यह एक सूचक है जिससे निर्धारित होता है कि इसके बाद मनुष्यों और पूरी पृथ्वी पर संकट बड़ा हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित पेरिस समझौते के तहत तापमान बृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम पर रोकने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, पर बाद में इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस पर निर्धारित किया गया।

तापमान तेजी से बढ़ रहा है, इसके लिए जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी बढ़ रहा है पर सभी सम्मेलनों में भारत समेत हरेक देश इसे नियंत्रित करने की कोरी घोषणाएं करते रहते हैं। हमारे प्रधानमंत्री मोदी हरेक ऐसे सम्मेलन में विश्वगुरु की छवि के साथ पहुंचते हैं और घोषणाएं करते हैं। पिछले वर्ष के अंत में ग्लासगो में आयोजित कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज के 26वें अधिवेशन में पहली बार कोयले के उपयोग पर चर्चा की गई और प्रधानमंत्री मोदी ने आनन्-फानन में कोयले के उपयोग में कटौती की घोषणा के साथ ही यह भे ऐलान किया था कि वर्ष 2030 तक देश में बिजली के कुल उत्पादन में से आधी से अधिक बिजली का उत्पादन नवीनीकृत उर्जा स्त्रोतों द्वारा किया जाने लगेगा।


प्रधानमंत्री घोषणाएं कुछ भी करें पर सच यही है कि हमारे देश में जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के नियंत्रण के लिए बस उतना ही काम होता है जिससे दिनरात लगातार जनता और सरकारों को लूटकर मुनाफा कमाते अडानी और अम्बानी को मुनाफा होता है। हमारे प्रधानमंत्री जी भी जलवायु परिवर्तन नियंत्रण के लक्ष्य भी केवल वही बताते हैं, जिसमें अडानी-अम्बानी की भागीदारी है। प्रधानमंत्री जी जलवायु परिवर्तन के हरेक अधिवेशन में केवल नवीनीकृत ऊर्जा की बात करते हैं, इसे लेकर चमात्कारिक आंकड़े प्रस्तुत करते हैं और जाहिर है इस क्षेत्र में अडानी का वर्चस्व है और अम्बानी इस क्षेत्र में तेजी से कूदने वाले हैं।

अडानी देश में सबसे अधिक कोयला-आधारित बिजली घरों के मालिक हैं और कोयला उत्खनन में देसी और अंतरराष्ट्रीय व्यवसायी हैं। दूसरी तरफ अम्बानी समूह की गुजरात के जामनगर में पेट्रोलियम रिफाइनरी है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी का तमगा मिला है। जाहिर है, देश के सबसे अमीर अडानी और अम्बानी को वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की कोई परवाह नहीं है, फिर भी दोनों का ध्यान नवीनीकृत उर्जा के मुनाफे पर टिका है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2030 तक देश में कुल 817 गीगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता के संयंत्र लग चुके होंगें, जिसमें से 525 गीगावाट के संयंत्र नवीनीकृत उर्जा स्रोतों पर आधारित होंगें - इसमें सौर उर्जा का हिस्सा 280 गीगावाट, पवन उर्जा का 140 गीगावाट और पनबिजली का 71 गीगावाट हिस्सा होगा।

विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ग्लासगो में आयोजित जलवायु परिवर्तन अधिवेशन में दिए गए भाषण के बाद कहा था कि नवीनीकृत उर्जा के क्षेत्र में देश तेजी से आगे बढ़ रहा है। पहले, वर्ष 2030 ले लिए 175 गीगावाट का लक्ष्य था, जिसे हम वर्ष 2022 तक ही पूरा कर लेंगें। इसके बाद 450 गीगावाट का लक्ष्य तय किया गया था, पर ग्लासगो के मंच से प्रधानमंत्री ने नए लक्ष्य, 500 गीगावाट, का ऐलान कर दिया। इस ऐलान के पीछे सबसे बड़ा कारण है अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड की इस क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी। पिछले तीन वर्षों के भीतर ही अडानी समूह की इस कंपनी ने 20 गीगावाट से अधिक क्षमता का सौर, पवन या फिर हाइब्रिड स्त्रोतों से बिजली बनाने का संयंत्र स्थापित कर लिया है। इसका सीधा मतलब है कि देश में इन स्त्रोतों से जितनी बिजली बनाई जा रही है, उसका 20 प्रतिशत से अधिक अडानी के संयंत्रों से पैदा हो रही है। पिछले दो वर्षों के भीतर ही अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड के शेयर्स में 13 गुना से अधिक वृद्धि हो चुकी है। अडानी का सपना वर्ष 2030 तक दुनिया का सबसे बड़ा नवीनीकृत उर्जा से बिजली उत्पादक बनने का है।


अम्बानी का लक्ष्य वर्ष 2030 तक नवीनीकृत उर्जा स्त्रोतों से, विशेष तौर पर सौर उर्जा से, कम से कम 100 गीगावाट बिजली उत्पादन का है। अम्बानी इसके लिए तेजी से काम भी कर रहे हैं। अम्बानी ने नोर्वे की सोलर पैनल बनाने वाली कंपनी, आरईसी सोलर होल्डिंग्स, को 77 करोड़ डॉलर में खरीदा है। इस कंपनी ने अबतक कुल 446 पेटेंट हासिल किये हैं और इनके उत्पादन में सामान्य पैनल की अपेक्षा 75 प्रतिशत कम उर्जा की खपत होती है। इसके बाद अम्बानी ने स्टर्लिंग एंड विल्सन सोलर लिमिटेड के 40 प्रतिशत शेयर खरीद लिए। इस कंपनी के पास 3000 से अधिक अभियांत्रिकी टीमें हैं जो दुनियाभर में सोलर पैनल्स स्थापित कर रही हैं।

अब सवाल यह उठता है कि अम्बानी-अडानी जैसे शुद्ध व्यवसायी क्या जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए नवीनीकृत उर्जा स्त्रोतों को विकसित कर रहे हैं या फिर यह उनके लिए बेहद मुनाफे का सौदा है, या फिर आगे बन सकता है। इसका एक जवाब तो यही है कि हमारे प्रधानमंत्री जी सौर ऊर्जा के सम्बन्ध में बेहद उत्साहित रहते हैं, इससे ही समझ लेना चाहिए कि यह देश के फायदे में हो या ना हो, पर अडानी-अम्बानी के फायदे का सौदा है। ऐसे संयंत्र स्थापित करने के लिए भूमि अधिग्रहण आसान है, अनेक सरकारी स्वीकृतियों से मुक्ति मिल जाती है, और सरकार अनेक रियायतें देती है। भारत इन्टरनेशनल सोलर अलायन्स का संस्थापक सदस्य है और इसके तहत भी सौर उर्जा उत्पादन के लिए तमाम आर्थिक मदद दी जाती है। भारत जैसे विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण के नाम पर अमीर देशों की तरफ से आर्थिक सहायता मिलती है और इसका बाद हिस्सा सौर उर्जा विकसित करने में खर्च किया जाता है – जाहिर है ये सारे लाभ अडानी-अम्बानी को मिल रहे हैं। भारत द्वारा वर्ष 2070 तक कार्बन-न्यूट्रल के ऐलान के बाद इस क्षेत्र में आर्थिक सहायता कई गुना बढ़ जायेगी।

यहाँ एक प्रश्न यह भी है कि हमारे देश में सौर उर्जा की दर बहुत सस्ती है, जिसके कारण अनेक देसी-विदेशी कंपनियों ने परियोजनाओं की स्वीकृति के बाद भी अपने संयंत्र स्थापित नहीं किया, तो फिर अडानी-अम्बानी इस क्षेत्र में कैसे आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल, पूंजीवाद का यह सामान्य सा नियम है कि बाजार पर जिसका अधिपत्य होता है कीमतें वही तय करता है। इस मामले में भी यही होने वाला है – अगले 2-3 वर्षों बाद जब देश के कुल सौर उर्जा में से 50 प्रतिशत से अधिक का उत्पादन अडानी-अम्बानी करने लगेंगें, उसके बाद कीमतें सरकार नहीं बल्कि अडानी-अम्बानी ही तय करेंगें। प्रधानमंत्री जी ने ग्लासगो के जलवायु परिवर्तन अधिवेशन में वन सन, वन अर्थ, वन ग्रिड का नारा दिया है। इस नारे से जलवायु परिवर्तन पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसके लिए कई वर्षों का इंतज़ार करना पड़ेगा, पर यदि ऐसा होता है तो जाहिर है फायदा केवल अडानी-अम्बानी को ही पहुंचेगा। अधिकतर यूरोपीय देशों में साल के अधिकतर समय तेज धूप नहीं रहती, दूसरी तरफ ये देश कोयले के उपयोग को बंद करने की घोषणा भी कर चुके हैं। ऐसे में अडानी-अम्बानी की सौर बिजली का यूरोप एक बड़ा बाजार बन सकता है।


गौतम अडानी देश और विदेशों में स्थित अनेक कोयला खदानों के मालिक भी हैं और सरकार समय-समय पर कोयाले का कृत्रिम संकट पैदा कर अडानी के मुनाफे को बढ़ाती है। हाल में ही पर्यावरण मंत्रालय की 7 मई 2022 की एक अधिसूचना के अनुसार अब तक कोयला खदानों को 40 प्रतिशत क्षमता पर की काम करने की अनुमति थी, पर अब इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है,, और इसके लिए किसी भी जन-सुनवाई या फिर नए पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह भारत सरकार ने राज्य सरकारों द्वारा संचालित घाटे में चल रहे या फिर बंद किये गए 100 से अधिक कोयला खदानों को अडानी ग्रुप या फिर वेदांता ग्रुप जैसे पूंजीपति घरानों को लीज पर देने का फैसला इस आश्वासन के साथ किया है, कि पर्यावरण स्वीकृति तुरंत दी जायेगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने भले ही कोयले के उपयोग को कम करने की घोषणा की हो, पर तथ्य ठीक उलटे हैं। वर्ष 2021-2022 में देश में कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन 77.7 करोड़ टन था, जिसे अगले 2 वर्षों में 1.2 अरब टन तक पहुंचाने का लक्ष्य है। यह सब ऐसे समय किया जा रहा है, जिस समय ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में भारत तीसरा देश है और दूसरी तरफ वायु प्रदूषण के सन्दर्भ में तो हम दुनिया के हरेक देश से आगे हैं। जाहिर है, देश में जलवायु परिवर्तन के नाम पर केवल उतना ही काम हो रहा है जिनसे अडानी-अम्बानी की जेब भर सके। प्रधानमंत्री जी के अन्तराष्ट्रीय मंचों से किये गए दावे भी बस अडानी-अम्बानी की क्षमता पर ही टिके होते हैं।

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