जमुई की घटना ने बीजेपी के महिला सुरक्षा और चौकस कानून-व्यवस्था के दावों को बेनकाब कर दिया
बिहार के जमुई की घटना ने बीजेपी के उन दावों की असलियत बेनकाब कर दी है जिसमें वह महिला सुरक्षा और कानून के राज की दुहाई देते नहीं थकती।

बिहार के जमुई में सड़क पर एक नाबालिग लड़की और उसके साथ मौजूद नाबालिग लड़के को रोकना, घेरना, लड़के के साथ मारपीट करना और लड़की के साथ यौन दुर्व्यवहार करना केवल कुछ युवकों की आपराधिक हरकत नहीं है। यह घटना उस सामाजिक मानसिकता का भयावह प्रदर्शन है जिसमें कुछ लोग सड़क को अपनी निजी सत्ता का क्षेत्र समझने लगते हैं और किसी लड़की की स्वतंत्रता, उसकी देह और उसकी गरिमा पर अपना अधिकार मान लेते हैं।
19 सितंबर की शाम हुई इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद मामला सार्वजनिक हुआ। पुलिस के अनुसार वीडियो के आधार पर आरोपियों की पहचान की गई, सात लोगों को चिन्हित किया गया और तीन को गिरफ्तार किया गया। मामले में पॉक्सो अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। जांच के लिए विशेष जांच दल भी बनाया गया है।
लेकिन इस घटना का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि एक नाबालिग लड़की को सड़क पर इस तरह घेरने और उसके साथ हिंसक तथा यौन दुर्व्यवहार करने का साहस अपराधियों में आया कैसे? किसी अपराध के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन शासन की असली परीक्षा तो यह है कि अपराधियों को कानून का खौफ ही नही रहे। जमुई की घटना कानून-व्यवस्था से आगे जाकर प्रशासन के तौर-तरीके और शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है।
यौन उत्पीड़न को सिर्फ यौन विकृति नहीं है, बल्कि उसका मूल तत्व इच्छा नहीं, नियंत्रण और प्रभुत्व होता है। किसी राह चलती लड़की को रोकना, उसकी देह को छूना, उसके साथ मौजूद लड़के को पीटना और उसकी बेबसी को तमाशे में बदल देना—इन सबमें एक ही संदेश छिपा होता है : तुम हमारे सामने कमजोर हो और हम तुम्हारे ऊपर अधिकार रखते हैं। यह मानसिकता ऐसे सामाजिक संस्कारों से बनती है जिनमें लड़कों को स्वतंत्रता और लड़कियों को नियंत्रण सिखाया जाता है। लड़की किसके साथ जा रही है, किससे बात कर रही है, कब घर लौट रही है—इन सवालों को समाज अक्सर पुरुषों की निगरानी का विषय बना देता है। यहीं से तथाकथित 'नैतिक पुलिसिंग' जन्म लेती है।
लेकिन किसी लड़की के चरित्र, उसके मित्रों या उसके निजी जीवन पर निर्णय देने का अधिकार किसी सड़कछाप समूह को नहीं मिल जाता। उससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि नैतिकता के नाम पर हिंसा करने वाला समूह स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगता है। जमुई की घटना में यही तत्व दिखाई देता है। उपलब्ध वीडियो और पुलिस के प्रारंभिक विवरण के अनुसार दोनों किशोरों को रोका गया और उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि आज यदि किसी समूह को किसी किशोरी के व्यवहार पर आपत्ति है और वह उसे रोककर दंडित करने लगता है, तो कल किसी दूसरे समूह को किसी और लड़की के कपड़े, मित्रता, प्रेम या आवाज पर आपत्ति हो सकती है। यदि कानून की जगह भीड़ निर्णय करने लगे तो समाज में नागरिक स्वतंत्रता का कोई सुरक्षित क्षेत्र नहीं बचता।
जमुई पुलिस ने घटना सामने आने के बाद कार्रवाई की है। पुलिस के अनुसार उसे घटना की जानकारी औपचारिक शिकायत के बजाय वायरल वीडियो के माध्यम से मिली और वीडियो में दिखाई दे रहे वाहन के पंजीकरण नंबर की मदद से पीड़ितों तक पहुंचा गया। यह कार्रवाई महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ एक असहज प्रश्न भी खड़ा होता है।
क्या किसी नाबालिग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पहले उसका वीडियो वायरल होना जरूरी है?
यह प्रश्न कानून-व्यवस्था की प्रकृति सामने रखता है। यदि कोई अपराध सार्वजनिक स्थान पर होता है और कई लोग उसमें शामिल होते हैं, तो वह केवल निजी घटना नहीं रह जाता। सार्वजनिक स्थानों की निगरानी, संवेदनशील इलाकों में पुलिस की मौजूदगी, शिकायत की सहज व्यवस्था और फौरी एक्शन- ये सभी पुलिस व्यवस्था की जिम्मेदारियां हैं।
यह भी समझना होगा कि यौन अपराधों में पीड़ित का तत्काल पुलिस के पास न पहुंचना असामान्य नहीं है। भय, शर्म, सामाजिक दबाव, परिवार की प्रतिक्रिया और अपराधियों से बदले की आशंका पीड़ित को चुप करा सकती है। इसलिए शिकायत का अभाव अपराध के अभाव का प्रमाण नहीं हो सकता।
नाबालिगों के मामले में पुलिस से अपेक्षा और अधिक होती है। पॉक्सो कानून केवल दंड देने वाला कानून नहीं है; वह बच्चे की सुरक्षा, गरिमा और बाल-अनुकूल प्रक्रिया पर भी जोर देता है। कानून के तहत अपराध की जानकारी मिलने पर रिपोर्टिंग, बच्चे का बयान बाल-अनुकूल तरीके से दर्ज करना, आवश्यक होने पर देखभाल और संरक्षण तथा संबंधित संस्थाओं को सूचना देने जैसी व्यवस्थाएं हैं। इसलिए पुलिस की भूमिका केवल आरोपी पकड़ने तक समाप्त नहीं होती।
भारत ने बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए पॉक्सो जैसा विशेष कानून बनाया है। 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों के लिए इसमें अलग कानूनी ढांचा, विशेष न्यायालय और बाल-अनुकूल प्रक्रियाएं निर्धारित हैं। भारतीय न्याय संहिता में भी महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीड़न और आपराधिक बल के इस्तेमाल से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। फिर भी सड़क पर किसी लड़की को घेर लेने का साहस यदि अपराधी कर सकता है तो समस्या कानून की अनुपस्थिति से अधिक कानून के प्रभाव की कमजोरी की है।
दरअसल प्रशासन की जिम्मेदारी घटना के बाद शुरू नहीं होती। प्रशासन का काम केवल पुलिस को निर्देश देना या घटना के बाद बैठक करना नहीं है। सार्वजनिक सुरक्षा एक सतत प्रशासनिक जिम्मेदारी है। जिन रास्तों से बच्चे नियमित रूप से स्कूल और कोचिंग जाते हैं, वहां प्रकाश व्यवस्था कैसी है? संवेदनशील स्थानों की पहचान हुई है या नहीं? शाम के समय पुलिस गश्त कितनी प्रभावी है? स्थानीय स्तर पर असामाजिक तत्वों की गतिविधियों पर निगरानी है या नहीं?
इन प्रश्नों का उत्तर किसी प्रेस विज्ञप्ति से नहीं मिलेगा।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने 2026 में भी बच्चों की सुरक्षा और पॉक्सो के क्रियान्वयन से संबंधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। यानी व्यवस्था के पास दिशानिर्देशों की कमी नहीं है। समस्या उनके जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन की है।
उधर हर ऐसी घटना के बाद सरकार के सामने दो तरह की प्रतिक्रिया का रास्ता होता है। पहला—घटना पर तत्काल प्रतिक्रिया : गिरफ्तारी, जांच, प्राथमिकी, बयान और आश्वासन। दूसरा—उस व्यवस्था की समीक्षा जिसके न होने के कारण अपराध घटित हुआ। सरकार यदि केवल पहली प्रतिक्रिया तक सीमित रहती है तो हर नई घटना फिर उसी तरह सामने आएगी। अपराधी बदलेंगे, स्थान बदलेंगे, पीड़ित बदलेंगे, लेकिन व्यवस्था का चरित्र वही रहेगा।
जमुई के मामले में सोशल मीडिया की भी दोहरी भूमिका है। इसने अपराध को उजागर भी किया और दूसरी बार अपराध भी किया। जमुई की घटना का वीडियो सामने नहीं आता तो शायद पुलिस तक मामला इतनी तेजी से नहीं पहुंचता। इस अर्थ में डिजिटल माध्यम ने घटना को छिपने नहीं दिया। लेकिन यही माध्यम पीड़िता की निजता के लिए खतरा भी बन सकता है। किसी नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न का वीडियो बार-बार प्रसारित करना न्याय की मांग नहीं है। वह पीड़िता के लिए दूसरी यातना बन सकता है। पॉक्सो व्यवस्था बच्चे की पहचान और निजता की रक्षा पर विशेष जोर देती है।
यदि कोई किशोरी घटना के बाद भय के कारण घर से निकलना बंद कर दे, पढ़ाई छोड़ दे या समाज की निगाहों से बचने लगे, तो केवल आरोपी की गिरफ्तारी को पूर्ण न्याय नहीं कहा जा सकता। पीड़ित की सुरक्षा का अर्थ यह नहीं कि लड़की को हर समय किसी पुरुष संरक्षक की आवश्यकता हो। सुरक्षा का अर्थ है कि सड़क, विद्यालय, कोचिंग, सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक स्थान कानून के शासन के अधीन हों।
एक और प्रश्न भी है—समाज की भूमिका क्या है?
किसी लड़की को घेरती भीड़ में यदि आसपास के लोग तमाशबीन बने रहें, तो अपराध केवल अपराधियों का नहीं रह जाता। हर नागरिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हिंसक भीड़ से अकेले भिड़ जाए, लेकिन पुलिस को सूचना देना, पीड़ित की मदद करना और अपराध का वीडियो तमाशे की तरह प्रसारित न करना नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
जमुई की घटना इसलिए केवल एक अपराध की खबर नहीं है। यह हमारे सामने राज्य और समाज दोनों का आईना रखती है।
राज्य के पास कानून है। पुलिस के पास अधिकार हैं। प्रशासन के पास तंत्र है। सरकार के पास नीतियां और संस्थाएं हैं। फिर भी यदि एक नाबालिग लड़की सार्वजनिक सड़क पर कुछ लोगों के सामने इस तरह असहाय हो जाती है, तो हमें केवल अपराधियों से सवाल नहीं करना चाहिए। हमें व्यवस्था से भी पूछना चाहिए।
जमुई घटना के कुछ आरोपी पकड़े गए हैं, कुछ की तलाश है। अब जांच कितनी निष्पक्ष और पूरी होती है, सभी संबंधित आरोपियों की भूमिका कानून के अनुसार तय होती है या नहीं, पीड़ित बच्चों की निजता और सुरक्षा कितनी सुनिश्चित होती है और मामला न्यायिक प्रक्रिया में कितनी मजबूती से आगे बढ़ता है। यह सब अभी होना है।
किसी घटना के बाद कुछ गिरफ्तारियां होना आसान है। मुश्किल यह है कि ऐसी घटना दोबारा न हो, उसके लिए व्यवस्था को बदलना। और यही सरकार, प्रशासन और कानून-व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा है। जब तक सड़क पर खड़ी एक किशोरी को अपने आसपास के पुरुषों से नहीं, बल्कि अपने समाज और राज्य से सुरक्षा का भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक कानून की किताबें चाहे जितनी मोटी हों, उनमें लिखी सुरक्षा अधूरी ही रहेगी।
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए
