राम पुनियानी का लेखः जंतर-मंतर आंदोलन से नई सुबह की उम्मीद जगी, लेकिन आगे और भी कठिन चुनौती

क्या हम लोकतांत्रिक प्रतिरोध के रास्ते एक तानाशाह सरकार का स्थान एक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा लिए जाने की उम्मीद कर सकते हैं– एक ऐसी सरकार जो भारतीय संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध हो?

जंतर-मंतर आंदोलन से नई सुबह की उम्मीद जगी, लेकिन आगे और भी कठिन चुनौती
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दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदोलनों ने हमारे देश की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला है। कॉकरोच जनता पार्टी ने कई बड़े आंदोलन किए और सरकार द्वारा विरोध के दमन से समाज के कई वर्गों को पीड़ा झेलनी पड़ी। वैसे घोषित तौर पर यह आंदोलन परीक्षाओं के पर्चे लीक होने पर केन्द्रित था लेकिन इसके यह स्वरुप अख्तियार करने की वजह सामाजिक-आर्थिक तंत्र में व्याप्त गड़बड़ियां थीं। पैलेट गन और बंदूकों के इस्तेमाल के मामले सामने आने के बाद तो लोगों के गुस्से ने जुगुप्सा का रूप ले लिया। यह मुद्दा इतना बड़ा था कि साकार के प्रमुख नेता- प्रधानमंत्री और गृहमंत्री- संसद के सत्र में भाग लेने तक की हिम्मत नहीं जुटा सके। वे देश को यह यकीन दिलाने की कोशिश करते रहे कि विपक्ष के हंगामे के चलते संसद में चर्चा नहीं हो पा रही है, इसलिए वहां जाने का कोई औचित्य नहीं है।

इन आंदोलनों के मोटे तौर पर तीन केंद्र थे- कॉकरोच, वामपंथी रूझान वाले युवा और कांग्रेस के नेतृत्व वाला प्रतिरोध। आंदोलन का चमत्कारी नतीजा हुआ क्योंकि सरकार, जिसे ‘निर्वाचित तानाशाही‘ कहा जा रहा है, ने भय का माहौल कायम कर रखा था। वह सरकार की आलोचना और उसके खिलाफ आंदोलनों को राष्ट्रद्रोह कहकर खारिज करती आ रही थी और जब भी मुमकिन होता था, वह सत्ता की ताकत का इस्तेमाल कर मानवाधिकारों के पक्ष में उठने वाली आवाजों को कुचलने का हर संभव प्रयास करती थी। उमर खालिद और शरजिल इमाम  छः साल से भी अधिक समय से जेल में हैं। अभी तक उनके मुकदमों की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई है। इस  मामले से मानवाधिकारों के मामले में भारत की दयनीय स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। भीमा कोरेगांव मामले से जुड़े बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी भी इसी स्थिति को रेखांकित करती है। फॉदर स्टेन स्वामी की 'संस्थागत हत्या' दर्शाती है कि शासन तंत्र कितना जालिम है।

इस आंदोलन के बाद सरकार का विरोध करने में हिचकिचाहट में कमी आई है। कई जगहों पर जेनरेशन अल्फा आंदोलन और विरोध कर रहा है। गोदी मीडिया का रुख जस का तस बना हुआ है। ऐसा महसूस हो रहा है कि अब सोशल मीडिया जैसे इंस्टाग्राम, यूटयूब और ट्विटर-फेसबुक समाज के हालातों को ज्यादा अच्छे से प्रतिबिंबित कर रहे हैं। सरकार शुरू में इस आंदोलन को राष्ट्रविरोधियों और आतंकियों द्वारा प्रायोजित बता रही थी और उसके खिलाफ अपने कई अन्य पसंदीदा अपशब्दों का इस्तेमाल कर रही थी, जैसा कि तानाशाह अक्सर करते हैं। लेकिन आंदोलन की आंधी इतनी तेज थी कि बीजेपी के पितृ संगठन आरएसएस और बंजरग दल आदि सभी ने अपने सुर बदल लिए और बढ़-चढ़कर अपने आपको आंदोलन का समर्थक साबित करने में जुट गए। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत तो इस हद तक आगे बढ़ गए कि उन्होंने जेन ज़ी के 2000 लोगों की बैठक आयोजित की और उन्हें लोकतंत्र की खूबियों के बारे में बताया।

एक दिलचस्प घटना यह हुई कि इस बैठक में किसी ने उनसे पूछ लिया कि आरएसएस ने स्वतंत्रता के बाद 52 सालों तक तिरंग क्यों नहीं फहराया। उन्होंने इस सवाल को टालते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में तिरंगे से जुड़ा एक किस्सा सुनाकर स्वयं को इस परेशानी भरी स्थिति से उबारा। उनकी खुशकिस्मती से वहां कोई ऐसा व्यक्ति मौजूद नहीं था जो पूछता कि उनके संगठन से जुड़े लोगों ने अंबेडकर का पुतला क्यों जलाया था। भागवत के समर्थक इसे लोकतान्त्रिक प्रणाली की एक गौरवशाली नजीर बताते हुए जश्न मना रहे हैं। उनके समर्थक यह भी कह रहे हैं कि जहां भी आंदोलनों का दमन किया गया वहां ‘अराजकता‘ के हालात बन गए। हम यह अच्छे से जानते हैं कि अब तक सरकार की नीतियों के खिलाफ हुए सभी बड़े आंदोलनों को संघ परिवार ने या तो नजरअंदाज किया है या उनका दमन किया है।


किसानों के आंदोलन की पूरी तरह उपेक्षा की गई। सरकार ने जब चुनावी बाध्यताओं के चलते कृषि संबंधी तीन कानून वापिस लिए तब तक लगभग 600 किसान अपनी जान खो चुके थे। शाहीनबाग आंदोलन का मामला तो और अधिक दुःखद है। इस आंदोलन को नजरअंदाज किया गया, उसका दानवीकरण किया गया और आंदोलन खत्म करवाने के लिए हिंसा करवाई गई। हमें जेएनयू में हुआ आन्दोलन भी याद है जिसका दमन और दानवीकरण किया गया (टुकड़े-टुकड़े गैंग), विश्वविद्यालय की प्रकृति बदलने का प्रयास किया गया और उसे दक्षिणपंथियों का अड्डा बना दिया गया।

सच तो यह है कि आरएसएस की हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा में लोकतान्त्रिक नीतियों के लिए कोई स्थान नहीं है। लोकतंत्र में  विरोधियों से चर्चा एक सामान्य बात है, ना कि मजबूरी में, कोई अन्य विकल्प न होने पर, अपनाया जाने वाला रास्ता, जैसा इस बार भागवत का रवैया था।

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धर्म-आधारित राष्ट्रवाद का विचार ही लोकतंत्र के एकदम खिलाफ है। आरएसएस, जो सामंतवाद और उपनिवेशवाद के बचे-खुचे तत्वों से उभरा था, ने लोकतांत्रिक संविधान का विरोध किया। जहां हमें जाति और लिंग आधारित गैर-बराबरी साफ नजर आती रही है, वहीं आर्थिक असमानता, खासतौर से पिछले 12 सालों में क्रोनी केपेटिलिज्म और समाज के ऊंचे तबकों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण, और ज्यादा साफ दिखने लगी है। ऐसी विचारधारा वालों से लोकतांत्रिक नीतियों की उम्मीद करना  एकदम बेकार है।

क्या हम लोकतांत्रिक प्रतिरोध के रास्ते एक तानाशाह सरकार का स्थान एक लोकतांत्रिक सरकार द्वारा लिए जाने की उम्मीद कर सकते हैं– एक ऐसी सरकार जो भारतीय संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध हो? ऐसा लगता है कि वर्तमान में लोकतांत्रिक मूल्यों का अवमूल्यन जिस सीमा तक हो चुका है, उसके चलते समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना एक बड़ी चुनौती है, जिस पर हमें विजय हासिल करनी होगी। जंतर मंतर से शुरू हुए आंदोलन ने सारे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है क्योंकि साधारण लोगों की मूलभूत समस्याओं की उपेक्षा की जा रही है।

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हालांकि ताजगी भरी हवा बह रही है लेकिन हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा पैदा की गई सड़ांध ज्यादा गहरी है। मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति नफरत गहरी जड़ें पकड़ चुकी है। आरएसएस के प्रचारकों की जबरदस्त घुसपैठ विभिन्न संस्थानों जैसे निर्वाचन आयोग, ईडी, सीबीआई, नौकरशाही, पुलिस और विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थाओं में हो चुकी है। इसके असर को भारतीय संस्कृति की जड़ें मजबूत करके ही कम किया जा सकता है, जो परत दर परत विकसित हुई (नेहरू के अनुसार इन विभिन्न परतों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है और वे शांतिपूर्वक एक-दूसरे से संवाद करती हैं), जो भारत की आजादी के आंदोलन के दौरान अपने शिखर पर पहुंची और जिसे आरएसएस की पिछले 100 सालों की कारगुजारियों ने क्षत-विक्षत कर दिया है।

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यह बहुत राहत की बात है कि इन आंदोलनों से भय का माहौल काफी हद तक कम हुआ है। यह निश्चित ही भारतीयों के रूप में हमें उसी तरह एकताबद्व करेगा जैसा कि आजादी के आंदोलन की वजह से हुआ था। हमारे सामने सवाल यह है कि भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध राजनैतिक दलों को दुबारा कैसे सशक्त किया जाए। जहां मौजूदा माहौल, जिसमें हम खुलकर सांस लेने की उम्मीद कर सकते हैं, स्वागतयोग्य है, वहीं राज्यसत्ता को साम्प्रदायिक तत्वों से मुक्त कराने की चुनौती हमारे सामने है।

अगला कदम काफी कठिन और चुनौतीपूर्ण है, लेकिन ‘भारत के विचार‘ की पुनर्स्थापना के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जो आजादी के आंदोलन के दौरान उभरा था। हमें उन युवकों को सलाम करना चाहिए जिन्होंने दमनकारी माहौल को तोड़़ा और और चुनावी मोर्चे पर क्या किया जाना है, इस पर विचार करना चाहिए।

(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)

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