मृणाल पांडे का लेख: आज़ादी के बाद के सबसे कड़वे और तनावमय चुनाव का आखिरी चरण

इस बार के चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से हमको उसकी दीर्घकालि नीतियों पर न तो कोई गंभीर बहस सुनने को मिली, और न ही सरकार के कामकाज की बाबत कोई सार्थक ब्यो रे सामने लाए गए। नोटबंदी-जीएसटी या गोवधबंदी पर भरोसेमंद सफाइयां भी नहीं सुनाई दीं।

इलस्ट्रेशन : जी डी सेठी
इलस्ट्रेशन : जी डी सेठी

मृणाल पाण्डे

आजादी के बाद भारत का सबसे कड़वा और तनावमय आम चुनाव अब अपने आखिरी चरण की तरफ बढ़ रहा है। इस बार के चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से हमको उसकी दीर्घकालिक नीतियों पर न तो कोई गंभीर बहस सुनने को मिली, और न ही सरकार के पांच सालों में निबटाए कामकाज की बाबत कोई सार्थक ब्योरे सामने लाए गए।

अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने वाले कुछ कदमों, जैसे नोटबंदी, जीएसटी या गोवध बंदी की बाबत कोई भरोसेमंद सफाइयां सुनने में नहीं आईं और दलितों, अल्पसंख्यक समुदायों पर बीजेपी समर्थकों के हमलों पर कोई सच्चा क्षोभ नहीं जताया गया। बीजेपी को एकजुट होकर चुनौती देने की बाबत विपक्षी दलों की कई रैलियां हुईं, लेकिन उनसे भी मतदाताओं के सामने महागठबंधन का कोई ठोस समयबद्ध और सर्वसम्मत ब्लूप्रिंट सामने नहीं आया।

बस यही सुनते रहे कि अमुक सूबे में अमुक दलों का गठजोड़ होगा, कि नहीं होगा। संशय के पलों में सोशल मीडिया पर भाषा और शिष्टाचार की तमाम मर्यादाएं बुरी तरह तोड़कर अप्रिय अफवाहों और फेक खबरों की बाढ़ ला दी गई। इस बार खबर यह भी है, कि सभी बड़े दलों ने अपने सोशल मीडिया प्रकोष्ठों की मार्फत पारिश्रमिक देकर ऐसी फौजें तैनात कर ली हैं जिनकी परनिंदा मुहिम कृत्रिम बुद्धि (एआई) के द्वारा संचालित की जा रही है। बस एक बटन दबा, निर्देश जारी हो जाते हैं और फिर लक्षित व्यक्तित्व और दल की छीछालेदर शुरू। कई बार झूठी सामग्रियां तस्वीरें डिलीट कर दी जाती हैं, पर लोग बाग दिनों तक पूछते रहते हैं कि भई इतनी साइट्स पर दिखी इस खबर में कुछ तो सच होगा ही।

बीजेपी के भाषणवीर नेताओं ने 2014 के उलट बार-बार अतीत में घुसकर सत्तर बरस पुराने नेहरू युग, कांग्रेस के परिवारवाद, तीस साल पहले के बोफोर्स विवाद के गड़े मुर्दे उखाड़ने की नीति अपनाई। नामदार बनाम कामदार, इटालियन कनेक्शन और कांग्रेस के पक्षधर किसी खान मार्केट गैंग या लिबरल धड़े के मुस्लिम प्रेम पर भी वे व्यंग्य छोड़ते रहे। बात हद से बढ़ी तो विपक्ष ने भी गुजरात के 2002 दंगों और उत्तर प्रदेश के पुलिसिया मुठभेड़ों में मारे गयों की बाबत राज उघाड़ने शुरू कर दिए।

तभी मीडिया में फ्रांस के साथ अरबों की राफेल डील से जुड़े रहस्य लीक हो गए। फिर तो ‘चौकीदार चोर है’, जैसे नारों का जन्म हुआ और उसके जवाब में राहुल तथा प्रियंका गांधी को लेकर तुम्हारे पिता भ्रष्टाचारी नंबर वन होकर दिवंगत हुए, तुम्हारा पति आरोपों से घिरा है सरीखे कड़वे निजी आक्षेपों की मुहिम शुरू कर दी गई। उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश तथा बिहार में लालू प्रसाद के बेटों के साथ भी काफी कुछ यही रणनीति अपनाई गई, तो मानों तेजाबी गटर का ढक्कन ही खुल गया।

हममें से जो लोग आजादी के तुरंत बाद के सालों में वयस्क हुए हैं, उनको सार्वजनिक भाषणों में राजनीति के बुनियादी शिष्टाचार और मर्यादाओं का यह पतन और चुनावी आचार संहिता के साफ उल्लंघन पर चुनाव आयोग का नरो वा कुंजरो वा वाला रुख आहत करता है। चिंता की बात यह भी है कि मोदी जी जब सरेआम यह कहें कि विपक्ष के नेता राहुल ने जानबूझ कर उस चुनाव क्षेत्र से उम्मीदवारी का पर्चा भरा है जहां ‘हमलोग’ यानी बहुसंख्य हिंदू कम, और ‘वे’ यानी अल्पसंख्यक अधिक तादाद में हैं, तो भारतीय संविधान की आत्मा का तो हनन होता ही है, दलीय कार्यकर्ताओं के बीच सांप्रदायिक फूट परस्त मानसिकता को भी देश भर में एक तरह की वैधता मिल जाती है।

जाति, धर्म, संप्रदाय और क्षेत्रीय हर तरह के आधारों पर इस चुनाव ने बार-बार भारत की बहुलता के बीच जी रही जनता के बीच गहरी विभाजनकारी रेखाएं खींची जाने की कोशिश की है, जिसकी सार्वजनिक और साफ निंदा प्रतिकार जरूरी हैं। यह भी शर्मनाक है कि मीडिया के एक बड़े भाग ने धंधई उसूल ताक पर रखकर इस आग को भड़काने का काम ही नहीं किया, चाटुकारिता भरे बेमतलब इंटरव्यू करने के नए मानदंड भी बनाए हैं।

क्या आज से कुछ साल पहले हम सोच सकते थे कि प्रधानमंत्री के पांच बरस के कार्यकाल में उनका कार्यालय एक भी गंभीर प्रेस कांफ्रेंस आयोजित नहीं कराएगा? उल्टे बॉलीवुड के अभिनेता और गीतकार प्रधानमंत्री से ऐसे बतियाते हुए उनका टीवी पर इंटरव्यू लेंगे, कि आप में एक फकीरी सी दिखती है, हें हें। या कि, सर आप अपना पसंदीदा आम काट कर खाते हैं कि चूस कर...?

उधर मुख्यधारा मीडिया का एक जतन से चयनित प्रतिनिधि प्रधानमंत्री से, सर आपको क्या- क्या पकाना आता है? सर क्या आप अपनी जेब में बटुआ रखते हैं? जैसे बेहूदा सवाल पूछता देखा जाता है।

सौ बात की एक बात यह, कि हमारे संविधान का मूल ढांचा एक संघीय गणराज्य का है। केंद्र के द्वारा जो भी राष्ट्रीय नीतियां बनें, उनमें राज्यों की बराबरी की सक्रिय भागीदारी हमेशा हो इस बात का महत्व हमारे संविधान निर्माता बखूबी समझते थे। और इतिहास गवाह है कि आजादी के शुरुआती सालों में बिधानचंद्र रॉय, गोविंद बल्लभ पंत, सी राजगोपालाचारी, रविशंकर शुक्ल या बी जी खेर जैसे सूबाई क्षत्रप, जो आज़ादी की लड़ाई में लाठी-गोली खाते हुए जेल जा चुके थे, प्रधानमंत्री नेहरू को फर्स्ट अमंग ईक्वल्स, यानी बराबरी के दर्जे वालों में पहला, मानकर सहज लहजे से निडर होकर बात करते थे और समय-समय पर अपनी असहमति भी जताते रहते थे।

आज केंद्र में प्रधानमंत्री कार्यालय में खुद प्रधानमंत्री और उनके एकाध परम विश्वस्त जनों को छोड़कर यह करने की हिम्मत उनकी काबीना तक में नहीं दिखती। सूबाई क्षत्रपों को तो छोड़ ही दें। यह खतरनाक है, इसलिए भी कि यह देश के सर्वोच्च आसन पर विराजमान व्यक्ति को कई बिना वाजिब विमर्श के बनाई लागू की गई नीतियों के आसन्न खतरों से सही समय पर आगाह किया जाना असंभव बना देता है।

इस बार चुनावी रैलियों में मायावती, चंद्रबाबू, विजयन, ममता बनर्जी सरीखे मजबूत और लोकप्रिय प्रांतीय नेताओं को पानी पी-पी कर कोसना, उनको मुस्लिम परस्त और हिंदू विरोधी होने और उनके राज्य को कंगाल बंगाल कहना भी गैरवाजिब होने के अलावा सिरे से अव्यावहारिक भी है।

बिहार में सुशासन बाबू उर्फ नीतीश कुमार की दशा तो दयनीय है। उनका समतावादी, समाजवादी धर्मरथ उस समय धरती में छह अंगुल धंस गया, जब चुनावी जनसभा में मंच पर उनकी मौजूदगी के बावजूद बीजेपी के लोगों ने खुलकर धार्मिक नारेबाजी की। फौरी तौर से प्रचारकों की भगवा ब्रिगेड का मनोबल भले इससे बढ़ा हो, लेकिन चुनावों में नीतीश की पार्टी की चूलें बुरी तरह हिलाने वाला साबित होगा।

मीडिया के राय बहादुरों की तमाम बड़बोली बहसों और तरह-तरह के शोध के बावजूद अभी यह किसी को ठीक-ठीक मालूम नहीं है कि इन चुनावों के अंतिम नतीजे किस तरह के होंगे और किसकी सरकार बनेगी। और लोगों की तरह ही तमाम विशेषज्ञों के बीच भी दो परस्पर विरोधी गुट बन गए हैं जो तर्क को कम, अपने गुट की परस्पर पीठ सहलाई को अधिक महत्व देते हुए घोषणाएं और भविष्यवाणियां कर रहे हैं।

अर्थनीति की हालत भी इन दिनों डगमग है। उसकी एक वजह अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरण तो हैं, पर बड़ी वजह केंद्र और राज्यों के बीच बिगड़ते रिश्ते और प्रांतीय नेतृत्व तथा आर्थिक सलाहकारों की निरंतर उपेक्षा और अपमान भी हैं। चुनाव तो निबट ही जाएंगे लेकिन उसके बाद जो भी सरकार आएगी उसे उत्तर प्रदेश के बदहाल किसान और सड़कों पर भटकते आवारा पशु, महाराष्ट्र-गुजरात के सूखते जलाशय और दक्षिण में ठप्प होते छोटे-मंझोले उपक्रम, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिकता और गोरक्षकों की मारपीट से एकमुश्त निबटना होगा।

नतीजे आने पर अगर अंतत: बीजेपी नीत सरकार बनी भी तो यह बहुत संभव है 2019 में बीजेपी की सीटें पिछली बार की अपेक्षा कम हों। इस दशा में वह अगर विपक्ष में बैठने की बजाय अपने सहयोगी क्षेत्रीय दलों का सहारा लेना तय करे, तो अगले पांच साल वह उनके आगे बार-बार दांतों में तिनका दबाकर जाने को मजबूर होगी। और अगर बीजेपी की मातृ संस्था के सयाने जो अभी खामोश हैं, मोदी का विकल्प लाने की सलाह और जुगत करने में जुट जाएं, तो अचरज नहीं।

नए नेतृत्व के लिए न सही नैतिकता के उसूलों तले, पर कुर्सी पर बने रहने को विनम्र और लचीला बनकर अपने अलावा दूसरी सहयोगी पार्टियों की राय का भी आदर करना शुरू करना होगा। अगर ऐसा होता है, तो वह मौजूदा स्थिति से तो अच्छा ही होगा।

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