एसपी को कमिश्नर बनाने से नहीं बदलेगी मानसिकता, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत करना होगा पुलिस सुधार

उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार ने पुलिस सुधार की दिशा में बड़ा कदम बताते हुए लखनऊ और नोएडा में एसएसपी का पद खत्म करते हुए पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू किया है। लेकिन कई रिपोर्ट बताती हैं कि भारत में पूरे पुलिस बल को प्रोफेशनल तरीके से प्रशिक्षित करना आवश्यक है।

फोटोः gettyimages
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राहुल गुल

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सोमवार को पुलिस व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए नोएडा और लखनऊ में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने का फैसला लिया। इससे अब यहां के पुलिस अधिकारियों के पास मजिस्ट्रेट वाले अधिकार होंगे। इसके साथ ही महिलाओं के साथ होने वाले अपराध पर लगाम लगाने के लिए एसपी रैंक की दो महिला अधिकारियों की भी विशेष तैनाती होगी। खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने कैबिनेट के इस फैसले की जानकारी देते हुए इसे ‘स्‍मार्ट पुलिसिंग' और पुलिस सुधार की दिशा में बड़ा कदम बताया। लेकिन क्या वाकई में एसएसपी के पद को कुछ मजिस्ट्रेट के अधिकारी देकर पुलिस कमिश्नर का पद बना देने से पुलिस बल में सुधार आ जाएगा? क्या इस तरह के कदमों से पुलिस बल की मानसिकता में कोई बदलाव आ जाएगा, जो आए दिन अल्पसंख्यकों और अन्य पिछड़े समुदायों के प्रति दंगों या प्रदर्शनों के दौरान दिखाई देता है?

इसमें दो राय नहीं कि भारत में पुलिस एक खास तरह की अल्पसंख्यक विरोधी मानसिकता से ग्रसित रही है और तमाम दंगों से जुड़ी रिपोर्ट इसकी कहानी बयां भी करती हैं। निश्चित तौर पर इसके लिए कई स्तरों पर सुधार की जरूरत है, पुलिस बल को प्रोफेशनल तरीके से प्रशिक्षित करना तो आवश्यक है ही। इस दिशा में एक कदम पुलिस सुधार का भी है। लेकिन अफसोस की बात है कि पुलिस सुधार अब तक कागजों में ही कैद रहा। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी धता बता दिया गया। 22 सितंबर, 2006 को प्रकाश सिंह बनाम भारतीय संघ मामले में दायर याचिका पर एक दशक से भी अधिक समय तक सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया जिसमें पुलिस सुधारों के कार्यान्वयन के विशिष्ट दिशानिर्देश थे।

गौरतलब है कि इस फैसले के आने से पहले तमाम विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों पर भी राज्यों ने अमल नहीं किया था। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बड़ी जीत थी और इसमें जिस तरह से विशिष्ट दिशानिर्देश दिए गए थे, उन्हें देखकर यही माना जा रहा था कि अब इन पर अमल नहीं करने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को सात तरह की संस्थाओं के गठन/कदम उठाने के निर्देश दिए थे।

इन दिशानिर्देशों में पुलिस सुधारों पर विभिन्न समितियों की प्रमुख सिफारिशों को शामिल किया गया था। कुछ आलोचकों ने इन्हें ‘सुधारों का राष्ट्रीय पुलिस आयोग मॉडल’ करार दिया जिसका सारा ध्यान पुलिस व्यवस्था से राजनीतिक दबाव को हटाने पर था और इस क्रम में संरचनात्मक समस्याओं की अनदेखी कर दी गई। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये दिशानिर्देश भावी सुधारों की दिशा में महज पहला कदम होते और इन पर अमल से तमाम अन्य सुधारों की जमीन तैयार हो जाती।

संविधान के अंतर्गत पुलिस समेत कानून-व्यवस्था राज्य के विषय हैं। राज्यों को अपने कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन ज्यादातर राज्यों ने भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 के प्रावधानों को बहाल रखा है जबकि न केवल ये अप्रासंगकि हो चुके हैं बल्कि औपनिवेशिक प्रकृति के भी हैं। आजादी के सत्तर साल बाद भी देश की पुलिस व्यवस्था उसी पुराने दमनकारी ढर्रे पर चल रही है, जिसमें न कोई पारदर्शिता है, न जवाबदेही, जबकि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ये दोनों नितांत जरूरी हैं। अगर कहें कि देश के लगभग सभी राज्य सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन नहीं करने के लिए अदालत की अवमानना के दोषी हैं, तो गलत नहीं होगा।

राज्यों की विफलता दो स्तरों पर है- एक तो उन्होंने दिशानिर्देशों का बिल्कुल पालन नहीं किया और दूसरा, उन्होंने ऐसे कानूनी प्रावधान किए जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भावना के खिलाफ हैं। 2006 के केस में मुख्य याचिकाकर्ता प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों पर अमल नहीं करने के लिए अवमानना याचिका दाखिल की है। इस याचिका पर अभी सुनवाई होनी है और एक दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है। राज्य सुरक्षा आयोग का प्रावधान करने वाले 13 राज्यों में सदस्यता के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का खुला उल्लंघन किया गया। पांच राज्यों ने नेता प्रतिपक्ष को आयोग का सदस्य बनाया ही नहीं जबकि चार राज्यों ने गैर-राजनीतिक या स्वतंत्र सदस्यों को जगह नहीं दी।

सुरक्षा आयोग के मामले में दिशानिर्देशों का पालन केवल दो राज्यों केरल और हिमाचल प्रदेश में किया गया। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों में पुलिस एस्टैबलिशमेंट बोर्ड और पुलिस शिकायत प्राधिकरण के भी गठन के लिए कहा गया था, लेकिन इन्हें भी व्यवस्थात्मक छिद्रों के जरिये कमजोर कर दिया गया। केरल और हरियाणा पुलिस अधिनियमों से अधिकारियों के तबादले और तैनाती की अहम भूमिका को बाहर रखा गया है, जबकि बिहार पुलिस अधिनियम में ऐसे किसी बोर्ड की व्यवस्था ही नहीं की गई। जाहिर है, ये सब सुप्रीम कोर्टे के दिशानिर्देश के खिलाफ हैं। केवल कर्नाटक, केरल और उत्तराखंड में पीईबी के गठन को बाध्यकारी बनाया गया है।

इसी तरह पुलिस शिकायत प्राधिकरण के मामले में इसके विशिष्ट प्रावधानों को कानूनन बाध्यकारी बनाने की व्यवस्था केवल हिमाचल और कर्नाटक में है, जबकि महाराष्ट्र में इस बात का प्रावधान किया गया कि अपवाद की स्थिति में लिखित कारण बताकर सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों को राज्य सरकार खारिज कर सकती है। इस तरह के उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि राज्य सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों को ठंडे बस्ते में डालने के हर संभव प्रयास करते रहे हैं।

कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का सबसे ज्यादा पालन करने वाले राज्य की बात की जाए तो इसमें हिमाचल प्रदेश का नाम सबसे पहले आता है और इसके बाद आता है उत्तराखंड का नंबर। केरल ने भी पुलिस स्वायत्तता के मामले में उल्लेखनीय काम किया है। राज्य सुरक्षा आयोग की तर्ज पर केंद्र सरकार को भी राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग का गठन करना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दस साल से भी अधिक समय के बाद 2017 में इसका गठन किया गया।

ये थे दिशानिर्देश

  1. राज्य सुरक्षा आयोग (एसएससी) का गठन जिसमें नेता प्रतिपक्ष, जज और स्वतंत्र सदस्य हों, ताकि राज्य पुलिस अवांछित सरकारी नियंत्रण, प्रभाव अथवा दबाव से मुक्त होकर काम कर सके।
  2. पुलिस महानिदेशक का चयन तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से हो और चुने गए व्यक्ति का कार्यकाल न्यूनतम दो वर्षों का हो।
  3. पुलिस महानिरीक्षक तथा ऑपरेशनल ड्यूटी निभा रहे अन्य अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित हो।
  4. मामलों की तफ्तीश के लिए अलग शाखा हो।
  5. डीएसपी रैंक तक के सभी अधिकारियों के तबादले, पोस्टिंग, प्रोन्नति और सेवा संबंधी मामलों के लिए पुलिस एस्टैबलिशमेंट बोर्ड (पीईबी) हो और वही इन कर्मचारियों की अपील सुने।
  6. डीएसपी रैंक तक के अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों को सुनने के लिए राज्य तथा जिला स्तर पर पुलिस शिकायत प्राधिकरण हो।
  7. केंद्रीय पुलिस बलों के प्रमुखों के चयन और तैनाती तथा पुलिस बलों की क्षमता की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग हो।
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