मोदी सरकार को नहीं है मजदूरों-किसानों की चिंता, उसका फोकस तो मध्य वर्ग है जो बनता है चुनावों में वोटों की फसल

BJP के लोग वही कर रहे हैं जो कि PM मोदी कर रहे हैं। PM प्रवासी मजदूरों पर कुछ नहीं बोले लेकिन 20 लाख करोड़ में वे मजदूरों के खाते में दान करवाने के विज्ञापनों की भरमार कर देंगे। प्रवासी मजदूर की समस्या प्रधानमंत्री मोदी की विचारधारा में नहीं आती है।

फोटो: Getty Images
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अनिल चमड़िया

देश भर में हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घरों के लिए परेशान प्रवासी मजदूरों के साथ होने वाले हादसों और मौतों की तस्वीरों से सोशल मीडिया भरा पड़ा है। लेकिन सरकार को कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं दे रहा हैं। इससे पहले भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये की कीमत वाले भाषण में उन लाखों प्रवासी मजदूरों पर क्यों नहीं एक शब्द भी बोला , यह बात किसी भी संवेदनशील और समझदार मनुष्य को परेशान कर रही हैं। भाजपा के एक कट्टर समर्थक ने तो दो टके से शुरू होने वाले भाषण के तुरंत बाद कहा कि चुनाव के दौरान एक एक वोट को ढुलवाने के लिए गाड़ियां भेजी जाती है। दूसरे शहरों से वोटर गाड़ियों में ढुलवाए जाते हैं। क्या मोदी को हजारों हजार किलोमीटर चिलचिलाती धूप में महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, विकलांग और लड़के लड़कियां सड़कों को भूखे प्यासे नाप रहे हैं क्या ये सब प्रधानमंत्री को पता नहीं है ? आखिर प्रधानमंत्री ने लॉकडाउन से पहले ही मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाने के बारे में क्यों नहीं सोचा? प्रधानमंत्री को क्या इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है?

मोदी के प्रवासी मजदूरों के बारे में नहीं बोलने भर की जिस तरह से आलोचना हो रही है उसे दो स्तरों पर समझा जाना चाहिए। पहला तो क्या प्रधानमंत्री मोदी के रुख पर भावुकता से भरी प्रतिक्रियाओं से कुछ राजनीतिक नुकसान होने वाला है। दूसरा वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी अति भरोसे से भरे हुए हैं। पहली बड़ी वजह यह है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में 1 अरब तीस करोड़ की जिस आबादी की गिनती कराते हैं उन्हें चुनाव में अपनी कामयाबी के लिए उन सबके समर्थन की जरूरत नहीं हैं। 2019 में चुनाव जीतने के बाद से उनके जितने भी राष्ट्र के नाम संबोधन हुए हैं उन्हें गौर से सुनें। उनका जोर हर भाषण में देश का मध्यम वर्ग होता है जिसकी ईमानदारी की बढ़ चढ़कर प्रशंसा वे करते हैं और समाज को विकसित करने में उद्योगपतियों की काबिलीयत की तारीफ करते हैं। उनके भाषणों में मजदूर या कमजोर वर्ग के लोग दया के पात्र होते हैं।

इसे इस उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। मध्य प्रदेश में एक विधायक को यह जानकारी मिली कि हाईवे पर प्रवासी मजदूर हजारों की संख्या में सैकड़ों किलोमीटर दूर से भूखे प्यासे पैदल चलकर आ रहे हैं और उन्हें आगे सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करना बाकी है। यह स्थिति उनके क्षेत्र के हर उस संवेदनशील व्यक्ति को बेचैन कर रहा था जो भाजपा समर्थक भी हैं। विधायक ने मोदी की तरह प्रवासी मजदूरों की मूल समस्या की तरफ तो ध्यान नहीं दिया लेकिन उसने मनुष्यों के भावनात्मक संकट को संबोधित किया। उन्होंने हाई वे पर पानी पिलाने और खिचड़ी खिलाने के लिए एक टेंट लगा दिया। उन्होंने खिचड़ी बांटी, पानी पिलाया और अपनी ढेर सारी तस्वीरें खिचवाई। उन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर डाल दिया। लेकिन मजदूरों के लिए गाड़ियों का इंतजाम कर उन्हें सड़क पर जितनी दूर संभव हो सकता है उतनी दूर भी भिजवाने की व्यवस्था नहीं की।

दरअसल भाजपा के लोग वहीं कर रहे हैं जो कि प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी प्रवासी मजदूरों पर कुछ नहीं बोलें लेकिन 20 लाख करोड़ में वे मजदूरों के खाते में दान करवाने के विज्ञापनों की भरमार कर देंगे। प्रवासी मजदूर की समस्या प्रधानमंत्री मोदी की विचारधारा में नहीं आती है। वे प्रवासी मजदूरों पर जो कहर बरपा है और उनकी हालत पर मोदी का जो मध्य वर्ग थोड़ा विचलित हो रहा है उस विचलन को रोकने की कवायद ही उन्हें करनी है। मध्यम वर्ग की संवेदना को संबोधित करना है। जैसे मध्य प्रदेश के एक विधायक का ऊपर उदाहरण दिया गया है। देश में चुनाव जीतने के लिए कितने वोटों की जरूरत हो सकती है? इस सवाल का जवाब जानने बिना प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में मुसलमानों की तरह प्रवासी मजदूरों के हक हकूक की बात के शामिल नहीं होने की वजहों को ठीक ठीक नहीं समझा जा सकता है। नरेन्द्र मोदी को चुनाव में कामयाबी के लिए 1 अरब पैतीस करोड़ की आबादी जो कि 2024 में बढ़कर लगभग 1 अरब चालीस करोड़ हो सकती है, उनमें तीस करोड़ मतदाताओं का समर्थन चाहिए। 2019 में भाजपा और समर्थक पार्टियों को 29,076,879 मत मिलें हैं ।

मोदी का टारगेट यदि कुल आबादी का 15-16 प्रतिशत मतदाता हैं तो जाहिर सी बात है कि उन्हें उस पर ही खुद को ज्यादा से ज्यादा केन्द्रित करना है। दूसरी एक राजनीतिक स्थिति और बनी है। नरेन्द्र मोदी ने उस राजनीति को मजबूत किया हैं जिसमें लोगों के भीतर राजनीतिक नेतृत्व के साथ राजनीतितक रिश्ते के बजाय भावनात्मक स्तर के रिश्तों के प्रति रुझान बढ़े। भारतीय समाज में यह पहले से ही यह कमजोरी मजबूत है कि वह हर तरह के रिश्ते को एक ही तरह के भावों में देखने की कोशिश करने लगता है। वह यह भूल जाता है कि सबके साथ अलग अलग रिश्ते होते हैं। तमिलनाडु और दक्षिण के राज्यों में यह देखा गया है कि लोग कैसे किसी नेता के मरने व किसी अभिनेता के मरने पर खुद आत्महत्याएं तक कर लेते हैं। प्रधानमंत्री के साथ राजनीतिक रिश्ता ही हो सकता है और पूरे ढांचे को उनके हितों में चलाने की उसकी जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी वाली बात आम लोगों के भीतर से निकालने में प्रधानमंत्री मोदी को सबसे ज्यादा कामयाबी मिली है।

मौजूदा राजनीतिक मनोविज्ञान का अध्ययन करें तो एक भिन्न किस्म की स्थिति दिखती है। पहला तो लोग के भीतर से यह विचार निकाल दिया गया है कि उसके हालात और सरकार की नीतियों के बीच सीधा रिश्ता हैं। लोगों को सरकार एक अलग चीज दिखती है। सरकार के बारे में भी जितना सोचते हैं उसमें इस विचार को तोड़ दिया गया है कि सरकार जो चलाते हैं उसमें सब की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। सरकार में भी नेतृत्व करने वाले को अलग से देखा जाता है। ये मानने का विचार पृष्ठभूमि में चला गया है कि वह एक ढांचे का नेतृत्व करता या करती है और वह ढांचे की किसी गड़बड़ी के लिए सबसे पहले जिम्मेदार हैं। ढांचे का हर अधिकारी व जन प्रतिनिधि एक व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगा हैं।

कई लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रवासी मजदूरों की परवाह नहीं करने पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है तो कुछ ने उन प्रवासी मजदूरों से अपनी बातचीत भी सोशल मीडिया पर शेयर की है जो कि अभूतपूर्व परेशानियों से जुझते हुए अपने गांव व घर तक पहुंचना चाहते हैं लेकिन वे प्रधानमंत्री मोदी को इसके लिए जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं है। दरअसल मजदूरों की पूरी राजनीति को छिन्न भिन्न कर दिया गया है। यह आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मजदूरों पर यह हमला उस तथ्य के बीच हो रहा है कि मोदी की राजनीति के समर्थक भारतीय मजदूर संघ को मजदूरों के बीच सबसे ज्यादा विस्तार हुआ हैं। मध्य वर्ग मजदूरों की राजनीतिक स्थिति के अनुसार ही अपना रुख तय करता है। मजदूरों की संगठित ताकत कमजोर हुई तो दूसरी तरफ मध्य वर्ग ने भी पलटा मार लिया।

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