आकार पटेल / काम न आईं झप्पियां, न झूले पर बैठ हुई मुलाकातें...
कूटनीति के मामले में हम 2014 से जिस राह पर चल रहे हैं, उसमें झप्पियों और झूले की तस्वीरें तो आम हैं, लेकिन क्या हमें इससे कोई लाभ मिला है!

किसी समस्या को दुरुस्त करने के लिए, हमें सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि समस्या मौजूद है। अगर हम यह स्वीकार नहीं करेंगे, तो हम समस्या को देख नहीं पाएंगे और उसका समाधान भी नहीं हो पाएगा। पहला कदम तो यह स्वीकार करना है कि कोई समस्या है और फिर हम उसके समाधान की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
आज हम जिस समस्या पर चर्चा कर रहे हैं, वह 2014 से देखी जा रही व्यक्तिगत कूटनीति की प्रभावशीलता है। यह झप्पियां लेने, प्यार जताने का प्रदर्शन, मेहमानों के सम्मान में भव्य आयोजनों और इसी किस्म के विचारों के इर्द-गिर्द केंद्रित है कि इन सबसे बनी 'मित्रता' मुद्दों को सुलझाने में मदद करेगी।
सवाल है कि आखिर आज हम इस पर चर्चा क्यों कर रहे हैं? कारण साफ है कि भारत सरकार आज दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रही है। जिन देशों को वह सहयोगी नहीं तो, मित्र ज़रूर मानती थी, उन्होंने उसे बेवजह परेशान किया है, और उसे उन देशों की ओर रुख़ करने पर मजबूर होना पड़ा है, जिन्हें वह कुछ दिन पहले तक अगर दुश्मन नहीं, तो कम से कम प्रतिद्वंद्वी तो मानती थी।
यही समस्या है। इसका समाधान करने के लिए, हमें सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि यह मौजूद है। इस सरकार के लिए यह आसान नहीं होगा क्योंकि इसने अपना पूरा कामकाज एक व्यक्ति की प्रतिभा पर टिका दिया है। यह स्वीकार करना कि कोई समस्या है, यह स्वीकार करना है कि प्रतिभा ने वैसा काम नहीं किया जैसा कि उससे उम्मीद थी। लेकिन इस स्तंभकार का एक काम बिना मांगे राय देना है और संकट के समय में, विशेष रूप से हमें इस बाबत अपनी बात कहनी होगी।
इस सबकी जड़ में एक साधारण तथ्य है जो अब साफ हो गया है। वह यह है कि हमारे प्रधानमंत्री व्यक्तिगत कूटनीति में कुशल नहीं हैं। जैसा कि हम देखेंगे, वे इसमें बेहद कमजोर हैं। ध्यान रखें कि यह इस बात से अलग है कि व्यक्तिगत कूटनीति अपने आप में कारगर है या नहीं। हो सकता है कि यह कारगर हो। रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने इसका इस्तेमाल चीन को अमेरिका के साथ लाने और माओ को सोवियत संघ के साथ गठबंधन करने से रोकने के लिए किया था।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो जब विदेशी मेहमानों की मेज़बानी कर रहे होते थे, तो कभी-कभी हवाई अड्डे पर किसी व्यक्ति का स्वागत ख़ुद करते थे। उनके सहयोगियों, इक़बाल अखुंद और रफ़ी रज़ा, ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि इससे कभी-कभी नतीजे भी मिलते थे। हालांकि, हम यहां उस बारे में बात नहीं कर रहे हैं।
जब गलवान में झड़प हुई, तो प्रधानमंत्री द्वारा प्रचारित सौहार्द की भावना ध्वस्त हो गई। सितंबर 2014 में, उन्होंने अपने प्रसिद्ध संक्षिप्ताक्षरों में से एक गढ़ा, जिसमें उन्होंने चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को 'इंच' (इंडिया और चाइना) से आगे बढ़कर 'माइल्स' (मिलेनियम ऑफ एक्सेपश्नल सिनर्जी) की ओर बढ़ने की बात कही थी।
इसं खबर को प्रकाशित करने वाली रिपोर्ट इस पैराग्राफ के साथ समाप्त हुई, और याद रहे कि यह 2014 की बात है: "मोदी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब लेह के स्थानीय अधिकारी दावा कर रहे हैं कि सरकारी वाहनों में सवार चीनी नागरिक लद्दाख के डेमचोक में भारतीय क्षेत्र में घुस आए हैं और स्थानीय लोगों को वहां एक सिंचाई परियोजना पर काम करने से रोक रहे हैं। मोदी और शी जिनपिंग के बीच विवादास्पद सीमा विवाद पर भी चर्चा होगी।"
2020 में गलवान में हुई झड़प से पहले मोदी और शी जिनपिंग की बीच कुल 18 बार मुलाकातें हुई थीं। जगजाहिर है कि अरेंज मैरिज में युवा भारतीय जोड़े भी 18 बार नहीं मिलते हैं, लेकिन वे यह तय कर लेते हैं कि सामने वाला जीवनसाथी के तौर पर सही है या नहीं। हमारे प्रधानमंत्री तमाम गले मिलने और झूला झूलने के बावजूद ऐसा नहीं कर पाए। शी जिनपिंग एक ऐसे व्यक्ति हैं जिनका जोड़-घटाना बहुत सख्त है और वे इशारों में उनके साथ घुलने-मिलने को लेकर उपहास करते हैं।
हमें पता ही नहीं था कि यह हमारी नाकामी थी। उनके इस कदम पर हमारी तरफ से भी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया हुई: गलवान के बाद से मोदी अब तक शी जिनपिंग से मिलने से बचते रहे हैं। असल व्यक्तिगत कूटनीति के लिए उन्हें फोन उठाकर पूछना चाहिए था कि शी जिनपिंग ऐसा क्यों कर रहे हैं, बजाय इसके कि वे रूठ जाएं, लेकिन जैसा कि देखा गया है, वे असल में वह उसी काम में कमजोर हैं, जिसमें उन्हें अच्छा माना जाता
हमारे राजनयिक आज इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि ट्रंप भारत के साथ इतना बुरा बरताव क्यों कर रहे हैं, लेकिन इसकी एक मिसाल मौजूद है। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने मोदी को तेहरान से तेल खरीद बंद करने पर मजबूर किया था। हमने शिकायत की थी कि हमारी रिफ़ाइनरियां ईरानी कच्चे तेल के लिए तैयार हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की कोई पाबंदी लागू न होने के बावजूद, हमने उस समय ट्रंप की बात मान ली थी।
ट्रम्प टैरिफ़ के मामले में हमारे साथ सख़्त क्यों रहे हैं, इसकी सबसे आसान व्याख्या इस सिद्धांत में नहीं मिलती कि वे इस बात से नाराज़ हैं कि भारत ने पाकिस्तान के साथ उनके युद्ध को समाप्त करने की बात स्वीकार नहीं की (उन्हें इस बात की परवाह नहीं कि हम क्या सोचते हैं)। इसकी व्याख्या दुनिया भर में मिल जाएगी। धमकाने वाला हर समय हर किसी से लड़ना नहीं चाहता। धमकाने वाला सार्वजनिक रूप से एक व्यक्ति को उदाहरण के तौर पर पेश करना चाहता है ताकि बाकी लोग बिना लड़े उसकी बात मान लें। दुनिया की नज़रों के सामने यहाँ यही हुआ है।
ह्यूस्टन और अहमदाबाद में ट्रंप के लिए हमारी विशाल रैलियां हमें बचा नहीं पाईं क्योंकि ट्रंप एक ऐसे स्वार्थी दबंग व्यक्ति हैं जो सबसे पहले और आखिर तक अपने हितों की परवाह करते हैं। यही उनका चरित्र है। यह हमारी गलती है कि उनके साथ अपनी कथित निकटता के बावजूद, हम वह बात नहीं समझ पाए जो शी और सत्ता में बैठे बाकी सभी लोगों को साफ समझ आ रही थी।
अगर हम यह मान लें कि हम आज जहां हैं, उसकी वजह यही है, तो शायद हम इसे सुधार पाएं। लेकिन, रिकॉर्ड को देखते हुए, यह ज़्यादा संभावना है कि हम 2014 से जिस राह पर चल रहे हैं, उसी पर चलते रहेंगे, क्योंकि इस मोड़ पर यह कहना नामुमकिन है कि हमारे महान नेता कभी भी पूरी तरह से सक्षम से कम कुछ भी हो सकते हैं।
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