‘काले सोने’ की लूट और तटीय जिंदगी के खतरे

'सरकारें खनिज देखती हैं, कंपनियां मुनाफा। हम अपना भविष्य मिटते देखते हैं। खनिज रेत को तट से दूर ले जाने वाला हर ट्रक, हमारे घरों और समुद्र के बीच खड़ी सुरक्षा की एक परत अपने साथ ले जाता है। इसका फायदा कहीं और जाता है, जोखिम यहीं रह जाता है…”

फोटो: सोशल मीडिया
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के ए शाजी

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कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (सीएमआरएल) और केरल के दो बार मुख्यमंत्री रहे, मौजूदा विधानसभा में विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन की बेटी टी. वीणा की आईटी कंपनी एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस के बीच कथित वित्तीय लेन-देन की प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की जा रही जांच से एक अपेक्षाकृत कम चर्चित उद्योग फिर सुर्खियों में है।

विवाद मुख्य रूप से राजनीतिक-कानूनी मुद्दे के तौर पर देखा गया है, लेकिन आरोपों-अदालती लड़ाइयों से परे इसमें एक और बड़ी कहानी छिपी है, जो भारत के सबसे रणनीतिक प्राकृतिक संसाधनों में से एक और उसके खनन को लेकर चल रही लड़ाइयों से जुड़ी है। सीएमआरएल ऐसे क्षेत्र में काम करती है जिसकी धुरी ही भू-राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, औद्योगिक नीति, पर्यावरणीय संघर्ष और कॉरपोरेट सत्ता का मिलन बिंदु है।

इसने जिस तरह ध्यान खींचा, उससे केरल और तमिलनाडु के समुद्र तटों के नीचे दबी भारी खनिज रेत के विशाल भंडारों से जुड़े सवाल फिर उठ खड़े हुए हैं; ये ऐसे संसाधन हैं जो इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस निर्माण और रक्षा प्रौद्योगिकियों से संचालित आज की दुनिया में बेहद मूल्यवान हो चुके हैं।

सरकारों-निगमों के लिए, यह काली रेत अपार धन और रणनीतिक अवसरों का संकेत हैं। लेकिन तटीय समुदायों के लिए, यह अलग हकीकत पेश करती हैं- तटरेखाओं का कटाव, आजीविका सिमटते जाना और खनन परियोजनाओं के खिलाफ एक लंबी लड़ाई।


सत्ता की रेत

केरला के समुद्र तट के बड़े हिस्से में फैली काली रेत दुनिया के कुछ सबसे कीमती खनिज भंडार अपने में समेटे है। समुद्र तट की आम रेत के साथ इल्मेनाइट, रूटाइल, जिरकॉन, गार्नेट, सिलिमेनाइट और मोनाजाइट जैसे खनिज भी मिले होते हैं, जो आधुनिक उद्योग के लिए अपरिहार्य बन चुके हैं।

इल्मेनाइट और रूटाइल, टाइटेनियम के मुख्य अयस्क हैं। टाइटेनियम की अहमियत उसकी मजबूती, जंग-रोधी क्षमता और हल्के वजन के लिए है। इसका इस्तेमाल हवाई जहाज, अंतरिक्ष यान, मिसाइलों, नौसैनिक जहाजों और मेडिकल इंप्लांट्स में बड़े पैमाने पर होता है। जिरकॉन, सिरेमिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और खास औद्योगिक कामों के लिए जरूरी है। इन भंडारों में पाए जाने वाले संभवतः सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व वाले खनिज मोनाजाइट में थोरियम और दुर्लभ मृदातत्व मिलते हैं। भारत के तीन-चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम में थोरियम की लंबे समय से केन्द्रीय भूमिका रही है, जबकि दुर्लभ मृदा तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों, सेमीकंडक्टरों, मिसाइल प्रणालियों और कई ऐसी आधुनिक तकनीकों के लिए जरूरी हैं, जो आज के समय में आर्थिक और सैन्य शक्ति को तेजी से परिभाषित कर रही हैं।

भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े मोनाजाइट भंडारों में से एक है। कोल्लम की चावरा बेल्ट और उससे सटा तमिलनाडु का समुद्री तट, दुनिया के सबसे समृद्ध भारी खनिज रेत क्षेत्रों में हैं। इनका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि आज सभी देश स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों और उन्नत विनिर्माण के लिए जरूरी महत्वपूर्ण खनिज हासिल करने की होड़ में हैं।

चीन दुनिया भर में ‘रेयर अर्थ’ की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग पर हावी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पर उसकी जबरदस्त पकड़ है। अमेरिका, यूरोप, जापान और भारत की सरकारें इसके लिए अन्य स्रोत तलाशते हुए नया सप्लाई नेटवर्क बना रही हैं। होड़ के इस नए दौर ने भारत के तटीय इलाकों में मौजूद खनिज संपदा का रणनीतिक महत्व पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दिया है। केरला और तमिलनाडु के समुद्र तटों के नीचे छिपी खनिज संपदा का सीधा जुड़ाव अब यूरोप की इलेक्ट्रिक वाहन फैक्ट्रियों, पूर्वी एशिया के सेमीकंडक्टर उद्योगों, दुनिया भर के महाद्वीपों में चल रही नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं और दुनिया भर के रक्षा प्रतिष्ठानों से है।


संसाधनों का ऐसा महत्व स्वाभाविक रूप से राजनीतिक-व्यावसायिक हितों को आकर्षित करता है। खनन पट्टों, प्रसंस्करण सुविधाओं, परिवहन नेटवर्क और निर्यात माध्यमों पर नियंत्रण आर्थिक प्रभाव में बदल जाता है। यही कारण है कि खनिज रेत क्षेत्र भी विवादों में है। पिछले कुछ वर्षों में नियामक निगरानी, ​​राजनीतिक संरक्षण और कॉरपोरेट प्रभाव से जुड़े सवाल बार-बार उभरे हैं। सीएमआरएल से जुड़ा मौजूदा विवाद ताजा प्रमाण है कि खनिज संपदा और राजनीतिक सत्ता आपस में किस गहराई से जुड़े हैं।

कीमत चुकाने को अभिशप्त तट

जहां एक ओर सरकारें रणनीतिक खनिजों और औद्योगिक विकास की बातें करती हैं, तटीय समुदायों की अलग कहानी है। मछुआरा परिवारों के लिए, समुद्र तट महज कीमती खनिजों का भंडार नहीं; वे उनके कार्यस्थल, सामुदायिक मिलन स्थल और समुद्र से सुरक्षा देने वाली ढाल भी हैं।

वहां मछली पकड़ने वाली नावें लंगर डाले रहती हैं। जाल की मरम्मत वहीं होती है। मछलियां वहीं किनारे लाई जाती हैं, छांटी और बेची जाती हैं। तट कोई बंजर इलाका नहीं; रोजमर्रा जिंदगी का ही विस्तार है। इसके स्वरूप में कैसा भी बदलाव लोगों की आजीविका, उनके अस्तित्व को प्रभावित करता है।

अलाप्पुझा स्थित ‘एंटी मिनरल सैंड माइनिंग एक्शन कमेटी’ (जिसे ‘समिति’ भी कहा जाता है) के नेता बी. भद्रन कहते हैं, ‘विकास’ से जुड़ी चर्चाओं में तटीय समुदाय हमेशा नजरअंदाज होते हैं: “सरकारें खनिज देखती हैं, कंपनियां मुनाफा। हम अपना भविष्य मिटते देखते हैं। खनिज रेत को तट से दूर ले जाने वाला हर ट्रक, हमारे घरों और समुद्र के बीच खड़ी सुरक्षा की एक परत अपने साथ ले जाता है। इसका फायदा कहीं और जाता है; जोखिम यहीं रह जाता है। मछली पकड़ने वाले समुदायों से उम्मीद रहती है कि वे उस दौलत को बनाने के लिए पर्यावरण से जुड़ी कीमत चुकाएं, जिसका आनंद वे कभी नहीं ले पाएंगे।”


भद्रन के अनुसार, स्थानीय निवासियों ने बार-बार स्वतंत्र पर्यावरणीय आकलन, पारदर्शी जन-परामर्श और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी चाही है, लेकिन उनका सामना कहीं ज्यादा शक्तिशाली लोगों हैं।

केरला का समुद्र तट पहले से ही गंभीर पर्यावरणीय संकट का शिकार है। राज्य के 590 किलोमीटर लंबे तट का बड़ा हिस्सा कटाव पीड़ित है। पिछले दो दशकों में, गांवों ने समुद्र को अपने और करीब आते देखा है। घर ढहे, सड़कें गायब हुईं और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त है। हजारों परिवार बार-बार विस्थापन को अभिशप्त हैं।

जलवायु परिवर्तन और समुद्री जलस्तर में वृद्धि संकट के मुख्य कारण हैं। लेकिन वैज्ञानिक तटों के किनारे मानवीय हस्तक्षेपों के संचयी प्रभाव की ओर भी इशारा करते हैं। बंदरगाहों, ब्रेकवाटर्स, समुद्री दीवारों, ड्रेजिंग परियोजनाओं और रेत के निष्कर्षण ने प्राकृतिक तलछट की गति बदल दी है, जिससे समुद्र तटों और तटीय पारिस्थितिक तंत्र बनाए रखने वाला नाजुक संतुलन प्रभावित हुआ है।

संघर्ष का इतिहास

खनिज रेत को लेकर संघर्ष नई बात नहीं। इसने दशकों से केरला और तमिलनाडु में राजनीति, पर्यावरण आंदोलनों और सामुदायिक संघर्षों को आकार दिया है। केरला के कोल्लम जिला स्थित चावरा, लगभग एक सदी से खनिज निकालने के काम से जुड़ा है। सीमा पार तमिलनाडु में, खनिज समृद्ध यह पट्टी कन्याकुमारी, तिरुनेलवेली और थूथुकुडी तक फैली हुई है। ये सभी क्षेत्र मिलकर दुनिया के सबसे कीमती तटीय खनिज क्षेत्रों में से एक बनाते हैं।


फिर भी, ये भारत के कुछ सबसे विवादित खनन संघर्षों का केन्द्र भी रहे हैं। खनिज रेत खनन का पर्यावरण पर असर गरमागरम बहस का मुद्दा है। खनन में तटीय तलछट की भारी मात्रा की खुदाई, उसे अलगाना और प्रोसेसिंग शामिल होता है। इस प्रक्रिया से रेत के टीलों की बनावट बदल जाती है, पेड़-पौधे नष्ट हो जाते हैं, जमीन के नीचे के पानी का बहाव प्रभावित होता है, पक्षियों, समुद्री जीवों और अंडे देने वाले कछुओं की रिहाइश में खलल पड़ता है, और खनन वाले इलाकों के पास रहने वाले कमजोर समुदाय खतरे में आ जाते हैं।

मोनाजाइट इस सबको और पेचीदा बनाता है, क्योंकि इसमें थोरियम नाम का रेडियोएक्टिव तत्व होता है। अधिकारी भले दावा करें कि खनन पूरी तरह नियम अनुकूल और निगरानी में होता है, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता रेडियोएक्टिव खनिजों को संभालने और उन्हें एक से दूसरी जगह ले जाने के काम में और ज्यादा पारदर्शिता चाहते हैं।

आगामी दशकों में, जरूरी खनिजों की मांग में तेजी की उम्मीद है। रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग की ओर बढ़ते कदम, इन खनिजों को निकालने का दबाव और बढ़ाएंगे, जिसके साथ-साथ इसके सारे संभावित बुरे नतीजे भी सामने आएंगे।

संभव है कि टी. वीणा से जुड़ी ईडी जांच अभी सुर्खियों में हो, लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या नाज़ुक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना खनिजों को निकाला जा सकता है? क्या समुदाय अपने भविष्य से जुड़े फैसलों में सही मायने में हिस्सा ले सकते हैं? क्या सरकारें, ताकतवर व्यावसायिक हितों पर असरदार तरीके से लगाम लगा सकती हैं?