आकार पटेल का लेख: टिक-टिक करते वह प्रावधान जिन्हें राष्ट्रवाद की चाश्नी में लपेटकर थोपा जा सकता है आम लोगों पर

संविधान का अनुच्छेद 15 जिसमें बुनियादी अधिकारों की व्याख्या है। इन्हें पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि मुझे लगता है कि इसे कानून बनाने की दिशा में इस्तेमाल किया जाने वाला है, या मुझे डर है कि शायद ऐसा होना शुरु भी हो चुका है।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

हमारे संविधान में एक ऐसा बम टिक-टिक कर रहा है जिसे लेकर मैं बहुत चिंतित हूं। ये संविधान के चौथे भाग में हैं, जिनके बारे में हमें संविधान निर्माताओं ने आश्वासन दिया है कि "इस भाग में निहित प्रावधान किसी भी अदालत द्वारा लागू नहीं किए जा सकते हैं, लेकिन जिन सिद्धांतों को इसमें रखा गया है, वे देश के शासन में फिर भी मौलिक हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना सरकार का कर्तव्य होगा।”

इस तरह ये सिर्फ सिद्धांत हैं। लेकिन हमारा अनुभव यह रहा है कि ये सुसमाचार के समान हैं। कितने साक्षर भारतीय यह मानेंगे कि सरकार गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है (भाग 4 का अनुच्छेद 48)? मैं कहूंगा कि बहुमत ऐसा ही सोचेगा।

वह आग्रह जिसके साथ प्रतिबंध को सामने रखा गया है, उससे किसी को भी भ्रम हो सकता है कि एक सिद्धांत के बीच अंतर यह है कि इसे लागू नहीं किया जा सकता और सरकार का दायित्व है जिसे कानून के तहत लागू किया जाना चाहिए ("यह संविधान में है!")

बहुत कम भारतीयों को अनुच्छेद 47 के बारे में पता है, कि कोई सरकार अपने नागरिकों को टीटोटलर्स (नशा न करने वाला) बनाने के लिए प्रेरित करे ("सरकार औषधीय उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल को छोड़कर उन सभी मादक पेयों और दवाओं को प्रतिबंधित करे जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती हैं")

बिहार, केरल और तमिलनाडु में जैसा कि देखा गया है कि सरकार का आग्रह नागरिकों को निषेध के जरिएबेहतर नैतिक भारतीय बनाने पर है, जबकि इसे विधायकों पर समान संवैधानिक दायित्व के रूप में देखा जाता है।


संविधान का जो टाइम बम मुझे परेशान करता है वह थोड़ा और गहरा है, और वह है अनुच्छेद 15 जिसमें बुनियादी अधिकारों की व्याख्या है। इन्हें पूर्ण रूप में पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि मुझे लगता है कि इसे कानून बनाने की दिशा में इस्तेमाल किया जाने वाला है, या मुझे डर है कि शायद ऐसा होना शुरु भी हो चुका है। इसमें कहा गया है:

बुनियादी कर्तव्य ...यह हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य है कि:

  • वह संविधान का पालन करे और इसके विचारों और संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे

  • उन आदर्श विचारों को जीवन में उतारे और उनका पालन करे जिनसे हमारा स्वतंत्रता आंदोलन प्रेरित था

  • भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को कायम करे और इसकी रक्षा करे

  • देश की रक्षा करे और जब जरूरत हो तो खुद को राष्ट्र सेवा में समर्पित करे

  • भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने के लिए, धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या अनुभागीय विविधताओं को पार करे, महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक व्यवहार को त्यागे

  • हमारी साझा संस्कृति का आदर करे और उसकी रक्षा करे

  • हमारे वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीव-जंतुओं सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और सभी जीवों के प्रति दयालुता रखे

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और अन्वेषण और सुधार को विकसित करे

  • सार्वजनिक संपत्तियों की रक्षा करे और हिंसा को रोके

  • व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करे ताकि राष्ट्र लगातार प्रयास और उपलब्धि के उच्च स्तर तक बढ़े

लेकिन मुझे यहां सबकुछ डराता है। मसलन: यह कहना कि भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखना और उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। क्या कश्मीर और उत्तर-पूर्व में सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम यानी आर्म्ड फोर्सेस स्पशल पॉवर्स एक्ट के इस्तेमाल के खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग इस कर्तव्य का उल्लंघन कर रहे हैं? यदि हां, तो क्या उन्हें दंडित किया जाना चाहिए? कोई कह सकता है, नहीं, यह तो केवल दूसरे अधिकारों के साथ निहित एक आम सिद्धांत है। लेकिन फिर तो गोहत्या पर प्रतिबंध और शराब पर प्रतिबंध भी इसी श्रेणी में आया।

फिर उस सिद्धांत का क्या जो हमें राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गान का सम्मान करने को कहता है? इसका उल्लंघन करना पहले ही आपराधिक कृत्य किया जा चुका है, और यह मोदी के सत्ता में आने से पहले हुआ था। लेकिन हम आज ऐसे समय में रह रहे हैं जब राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रवाद का टकराव हुआ है। क्या आप इस बात से चिंतित हैं कि अगर कुछ न करना भी इसका अपमान माना जाने लगेगा? लेकिन मैं हूं। ऐसी चर्ता है कि अगर भारतीय मानचित्र में कोई गलती करेगा तो उस पर ₹100 करोड़ का जुर्माना लगाया जा सकता है।


हमारी अदालतों द्वारा अकसर बहुसंख्यक भावनाओं को ही ध्यान में रखने (जैसा कि गोहत्या के मामले में देखा गया) की परंपरा ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया है कि वहां बचाव का कोई उपाय उपलब्ध नहीं है।

संविधान एक जबरदस्त दस्तावेज है, लेकिन यह ऐसा दस्तावेज भी है जिसने हिंदू बहुसंख्यक भावना को दबाया है। हम ऐसे समय से दो-चार हैं जब इस दमन को लोकप्रिय रूप से खारिज किया जा रहा है। सभी को एक तरह से सुधर जाने का रास्ता दिखाया जा रहा है, और ऐसा उन प्रावधानों के माध्यम से हो रहा है जो हमने देखे हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि ये केवल निर्देशक सिद्धांत या कुछ और हैं क्योंकि हमारा अनुभव बताता है कि यह कोई बचाव नहीं है। अगर कुछ “संविधान” में है, तो फिर इसके आगे बात खत्म है।

सूची को देखें तो कुछ प्रावधान तो काफी डराने वाल हैं, जैसे कि 38(1)। यह कहता है, “सरकार लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने और सुरक्षित रूप से संरक्षित करने का प्रयास करेगी क्योंकि यह एक सामाजिक व्यवस्था हो सकती है जिसमें न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, राष्ट्रीय जीवन के सभी संस्थानों को सूचित करेगा।”

डराने वाला, मैं मानता हूं कि वर्तमान माहौल जो कुछ भी है वह डराने वाले के अलावा और कुछ नहीं।

बहुत सारे प्रावधान हैं (महिलाओं के लिए समान वेतन-अनुच्छेद 39 डी) जिन्हें लेकर मुझे संदेह है कि उन्हें गंभीरता के साथ नहीं लिया जाएगा। यह वे प्रावधान हैं जो हमारे वर्तमान आक्रामक राष्ट्रवाद से जुड़े हैं और यही मुझे चिंतित करते हैं। इन्हीं को मैंने टाइम बम कहा है।

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