युद्ध के समय महफ़ूज़ रहने की समझदारी

जब तक युद्ध जारी रहता है, या युद्ध जैसी स्थितियां बनी रहती हैं, भारत के लिए हालात खराब होते चले जाएंगे। भारत का व्यापार घाटा बढ़ जाएगा, विदेशी मुद्रा बाहर चली जाएगी और ज्यादातर दूसरी मुद्राओं के मुकाबले रुपया कमजोर हो जाएगा।

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पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध कब खत्म होगा, कहना मुश्किल है। यह लेख लिखे जाने के समय, दो हफ्तों के संघर्षविराम पर सहमति बन जाने के बाद भी यही आशंका है कि संबंधित पक्षों के बीच गहरा अविश्वास बना रहेगा और स्थिति तनावपूर्ण ही रहेगी। यहां तक कि युद्ध खत्म हो जाने के बाद भी खाड़ी देश फौरन उत्पादन नहीं बढ़ा पाएंगे क्योंकि हमलों में उनके बुनियादी ढांचे को काफी नुकसान हुआ है। इसलिए, युद्ध रुकने के बाद भी ऊर्जा की किल्लत बनी रहने वाली है।

जहां तक संघर्ष के भारत पर असर की बात है, स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। कीमतें बढ़ रही हैं और कई उद्योगों में उत्पादन प्रभावित हुआ है, जिसका सबसे ज्यादा असर रेस्टोरेंट और होटलों पर दिख रहा है। शहरों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों को एक तो कुकिंग गैस मिल नहीं पा रही और मिल भी रही है तो इतनी महंगी कि खरीदना मुश्किल। ऐसे में वे मजबूर होकर अपने गांव लौट रहे हैं, जैसे उन्हें कोविड महामारी के दौरान करना पड़ा था।

 जब तक युद्ध चलता रहेगा या युद्ध जैसी स्थितियां बनी रहेंगी, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लगने वाला झटका तेज होता जाएगा। चूंकि सभी तरह के उत्पादन, वितरण और उपभोग के लिए ऊर्जा जरूरी है, कच्चे तेल और गैस की कमी का असर उत्पादन पर भी पड़ेगा।

वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति बढ़ने और अन्य उपायों- जैसे खुले समुद्र में रूसी और ईरानी तेल खरीदने की अनुमति, और सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (जिसे पेट्रोलाइन भी कहते हैं) के जरिये लाल सागर के रास्ते तेल भेजने की सुविधा-के बावजूद, फिलहाल दुनिया में कच्चे तेल और गैस में कम-से-कम फीसद की कमी है। 

पाइपलाइन में मौजूद पेट्रोलियम उत्पादों का स्टॉक और रणनीतिक भंडार सीमित समय तक ही चल पाएगा। इसलिए, वैश्विक उत्पादन पर बुरा असर पड़ रहा है और आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हो रही हैं। चूंकि पेट्रोलियम उत्पादों पर दुनिया की निर्भरता अब 1970 के दशक (अरब-इसराइल युद्ध के समय) की तुलना में कहीं अधिक है, इसलिए इसका प्रभाव भी कहीं अधिक है।

चूंकि सभी उत्पादन गतिविधियों के साथ-साथ परिवहन और वितरण के लिए भी ऊर्जा की जरूरत होती है, इसलिए ऊर्जा की कीमत बढ़ने का मतलब है सभी उत्पादों की कीमतों में वृद्धि। इसके अलावा, कच्चा तेल सिर्फ ऊर्जा का ही स्रोत नहीं, बल्कि यह केमिकल्स और गैस वगैरह के लिए कच्चा माल भी है। इससे सल्फर और एलपीजी मिलती है। इसका इस्तेमाल सिंथेटिक फाइबर, खाद, प्लास्टिक, दवाओं, लुब्रिकेंट, सड़कों के लिए बिटुमेन वगैरह बनाने में किया जाता है। इसलिए, कच्चे तेल की कमी से दूसरी चीजों की भी कमी हो जाती है, और कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के कारण सीधे-सीधे दाम तो बढ़ता ही है, इसके अलावा सट्टेबाजी और कालाबाजारी की वजह से कीमतें और बढ़ जाती हैं।


भारत पर असर

खाद की कमी और सिंचाई और परिवहन की बढ़ती लागत से खेती पर असर पड़ेगा। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में होने वाली किसी भी वृद्धि की मार एक बार फिर मजदूरों पर पड़ेगी। डीजल की कमी का असर मछली पकड़ने के काम पर पहले से ही पड़ने लगा है। कपड़ा, पैकेजिंग और सिरेमिक टाइल्स बनाने वाली यूनिट पर भी इसकी मार पड़ी है। कुकिंग गैस की कमी से होटलों और रेस्टोरेंट पर असर पड़ रहा है, और खबरों के मुताबिक, कई तो बंद भी हो रहे हैं। इसका असर मनोरंजन जगत पर भी पड़ रहा है, जो यात्रा में आई गिरावट से भी प्रभावित हो रहा है।

भारत पर इसका खास तौर पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि वह आयात पर बहुत ज्यादा निर्भर है- कच्चे तेल की 85 फीसद और एलएनजी की 50 फीसद आपूर्ति के लिए हमें विदेशों का मुंह ताकना पड़ता है। भारत को न सिर्फ मौजूदा ऊंची कीमतों पर खाड़ी देशों के अलावा दूसरे स्रोतों से ज्यादा महंगा तेल और गैस खरीदना पड़ेगा, बल्कि वैश्विक कमी को देखते हुए उसे अपनी जरूरत के हिसाब से तेल-गैस मिल भी नहीं पाएगा।

सरकार का दावा है कि किसी चीज की कोई कमी नहीं है, लेकिन लंबी कतारें और बहुत ज्यादा कीमतों पर हो रही रिफिलिंग कुछ और ही कहानी बयां करती हैं।

पश्चिम एशिया से होकर जाने वाले हवाई और समुद्री रास्ते बाधित होने से, इस क्षेत्र में व्यापार और यात्रा में कमी आई है। एयरलाइंस और शिपिंग पर इसका असर पड़ा है। लोग फंसे हुए हैं और व्यापार कम हो गया है। शिपिंग इंश्योरेंस की दरें बढ़ गई हैं, और पश्चिम एशिया तक या वहां से होकर जाने वाले रास्तों के लिए ‘वॉर-रिस्क कवरेज’ भी महंगा हो गया है।

कीमतों पर दिखने वाले असर के अलावा, यह संकट मैक्रो इकोनॉमिक स्तर पर भी उत्पादन, विकास, निवेश, रोजगार, निर्यात, आयात, पूंजी प्रवाह और भुगतान संतुलन पर असर डालेगा।

जैसे-जैसे महंगाई की दर बढ़ेगी, समाज के कमजोर तबकों से आने वाली मांग कम हो जाएगी और कारोबारों को अपना उत्पादन घटाना पड़ेगा, जिससे अर्थव्यवस्था की विकास दर धीमी हो जाएगी। कच्चे तेल, एलपीजी वगैरह की कीमतों में वैश्विक बढ़ोतरी से आयात बिल बढ़ जाएगा। खाड़ी देशों को भारत का निर्यात-जैसे चाय, चावल, सब्जियां, मांस, इंजीनियरिंग से जुड़ी चीजें वगैरह- पर बुरा असर पड़ेगा। जिन दूसरे देशों में सप्लाई की दिक्कतें हैं, वहां भी भारत का निर्यात कम हो जाएगा।

नतीजतन, भारत का व्यापार घाटा बढ़ जाएगा, विदेशी मुद्रा बाहर चली जाएगी और ज्यादातर दूसरी मुद्राओं के मुकाबले रुपया कमजोर हो जाएगा। पिछले छह महीनों में, विशुद्ध एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) ऋणात्मक रहा है और पोर्टफोलियो निवेश भी बाहर की ओर गया है। इसलिए, पूंजी का प्रवाह व्यापार घाटे को पूरा करने में मदद नहीं कर पाएगा।


पश्चिम एशिया में एक करोड़ भारतीय रहते हैं। उनमें से कई वापस लौट रहे हैं और/या अपनी नौकरियां खो रहे हैं। उनके द्वारा भेजे जाने वाले पैसे (रेमिटेंस) और एनआरआई खातों में जमा रकम में कमी का अनुमान है, जिससे पूंजी का प्रवाह और भी कमजोर हो जाएगा। वापस लौटने वाले भारतीय भारत में ही काम की तलाश करेंगे, जिससे भारत में पहले से ही नाज़ुक बेरोजगारी की स्थिति और बदतर हो जाएगी।

रुपये की कीमत में गिरावट को लेकर सट्टाबाजारी बढ़ जाएगी। इससे डॉलर का विदेश जाना और भी तेज होगा और रुपया कमजोर होता जाएगा। उदाहरण के लिए, निर्यातक अपनी कमाई वापस लाने में देरी करेंगे, जबकि आयातक अपना आयात बढ़ा देंगे। जैसे-जैसे ज्यादा डॉलर बाहर जाएंगे, बाजार में तरलता की कमी होती जाएगी और ब्याज दरें बढ़ जाएंगी, जिससे निवेश का माहौल और भी खराब हो जाएगा।

टैरिफ और युद्धों ने दुनिया के कई हिस्सों में अर्थव्यवस्था को पहले ही हिलाकर रख दिया है। इस ट्रेंड के और भी खराब होने की आशंका है, जिससे निवेश और विकास की गति और धीमी हो जाएगी। सोने और चांदी में निवेश बढ़ जाएगा जिससे असली अर्थव्यवस्था से लेकर शेयर बाजारों में निवेश में और गिरावट आ सकती है।

दुनिया ‘स्टैगफ्लेशन’ जैसी स्थितियों की ओर बढ़ रही है, जहाँ कीमतें बढ़ रही हैं और विकास रुक गया है। अगर युद्ध जल्द खत्म नहीं होता या और फैलता है, तो दुनिया को मंदी का सामना करना पड़ सकता है।

भारत को अपने रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल करना होगा, जिससे कुछ समय तक उसका काम चल सकता है। जी 7 देश भी अपने रणनीतिक भंडारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत रूस, अमेरिका और वेनेज़ुएला से ज्यादा कच्चा तेल और गैस ले सकता है, लेकिन कीमतें ज्यादा होंगी।

टैरिफ और सप्लाई में रुकावटों को लेकर दुनिया भर के हालात, और देशों द्वारा सप्लाई चेन को छोटा करने और अपनी पूंजी को देश के अंदर ही रखने की कोशिशों को देखते हुए, निर्यात को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। भारत को अपने घरेलू बाजार पर ज्यादा निर्भर रहना होगा। विशाल असंगठित क्षेत्र वह अतिरिक्त बाजार उपलब्ध करा सकता है, बशर्ते उसे ज्यादा रोजगार और आमदनी मिले। उदाहरण के लिए, अगर हम विदेशों में कम कपड़े या खाने-पीने की चीजें बेचते हैं, तो बची हुई चीजों को भारत का असंगठित क्षेत्र खपा सकता है, बशर्ते उनके पास ज्यादा आमदनी हो।

नीतिगत बदलाव जो निजी वाहनों के इस्तेमाल को कम करने में मदद करते हैं और सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं, उनसे ईंधन की बचत होगी। भारत में भंडार को सुरक्षित रखने के लिए पेट्रोलियम उत्पादों के एक्सपोर्ट पर रोक लगाना मददगार होगा। ऐसी अन्य नीतियां जो अर्थव्यवस्था की ऊर्जा-निर्भरता को कम करती हैं और उसे ऊर्जा संकट के प्रति कम संवेदनशील बनाती हैं, आज समय की जरूरत हैं।

  • अरुण कुमार जाने-माने अर्थशास्त्री और लेखक हैं