खरी-खरीः खिसक रही है जमीन, तो याद आ रहे हैं राम

दो करोड़ नौकरियां, खाते में 15 लाख रुपये, हर घर शौचालय, हर बेटी शिक्षित, हर गरीब जनधन से मालामाल, किसान धनवान, कालेधन से मुक्ति, पाकिस्तान औकात में, दुनिया में भारत का डंका। क्या-क्या सपने मोदीजी ने देश को नहीं दिखाए, लेकिन आज हालत क्या है? कारोबार ठप, छोटे कारखाने बंद, किसान बेहाल और नौजवान हताश।

ज़फ़र आग़ा

पीएम मोदी का करिश्मा अब खत्म हो चुका है। आखिर कब तक झूठ का घड़ा नहीं फूटता! दो करोड़ नौकरियां, हर साल खाते में पंद्रह लाख रुपये, हर घर में शौचालय, हर बेटी शिक्षित, हर गरीब जनधन से मालामाल, हर किसान धनवान, देश कालेधन से मुक्त, पाकिस्तान अपनी औकात में, संसार में भारत का डंका। क्या-क्या सपना मोदीजी ने देश को नहीं दिखाया। आज स्थिति क्या है? कारोबार ठप, छोटे कारखाने बंद, किसान बेहाल, नौजवान हताश।

जब संकट में इंसान, तो बस याद आए भगवान! अरे इंसान तो क्या, बीजेपी जैसी पार्टी भी जब-जब संकट में होती है, तब-तब उसको भगवान राम याद आते हैं। चुनाव सर पर हैं और अब मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर निर्माण का कार्य शुरू करने को जमीन मांग रही है। यह मजाक नहीं तो और क्या है? वह भी ऐसा भौंडा मजाक कि बड़े से बड़े राम भक्त को भी समझ में आ जाए। यह वह पार्टी है जो भगवान राम की कृपा से आज इस स्थिति में है कि जिसके हाथों में देश की बागडोर है।

यह वही बीजेपी है जिसको 1984-85 के लोकसभा चुनाव में केवल दो सीटें प्राप्त हुई थीं। हद तो यह है कि उस चुनाव में पार्टी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी चुनाव हार गए थे। लेकिन यही बीजेपी बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद के बाद देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी थी। भगवान राम बीजेपी को ऐसे भाए कि 2014 में नरेंद्र मोदी अपने दम पर देश के प्रधानमंत्री बने और आज सारा विपक्ष उनसे एकजुट होकर टक्कर ले रहा है।

लेकिन जब 2019 लोकसभा चुनाव सर पर आ गए, तो मोदी सरकार को भगवान राम और अयोध्या विवाद याद आ पड़ा। बात केवल इतनी है कि मोदी जी अब संकट में हैं। इसी कारण अब उनको राम मंदिर याद आ रहा है। मोदी जी का संकट कोई छोटा-मोटा संकट नहीं है। नरेंद्र मोदी के पैरों तले जमीन खिसक रही है। गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद से बीजेपी एक भी चुनाव नहीं जीत सकी है।

नरेंद्र मोदी का करिश्मा अब खत्म हो चुका है। आखिर कब तक झूठ का घड़ा नहीं फूटता। दो करोड़ नौकरियां, हर साल खाते में पंद्रह लाख रुपये, हर घर में शौचालय, हर बेटी शिक्षित, हर गरीब जनधन से मालामाल, हर घर में बिजली, हर महिला को गैस ईंधन और चूल्हे से मुक्ति, हर किसान धनवान, देश कालेधन से मुक्त, पाकिस्तान अपनी औकात में, संसार में भारत का डंका।

अरे! क्या-क्या सपना मोदी जी ने देश को नहीं दिखाया। स्थिति क्या है? कारोबार ठप, दुकानें उदास, छोटे कारखाने बंद, जो छोटे रोजगार में लगे भी थे वे बेरोजगार, किसान बेहाल, नौजवान हताश। और किसका-किसका रोना रोएं। लब्बोलुवाब यह कि मोदी राज में भारत वासियों ने वह सब कुछ झेल लिया जिसकी कल्पना भी नहीं थी। चार साल में मोदीजी हीरो से जीरो हो गए, तो अब उनको भगवान राम याद आए। वह भी कब जब प्रयाग में संत सम्मेलन मंदिर निर्माण की तिथियां तय करने जा रहा है।

निःसंदेह यह एक छलावा है, राम भक्ति नहीं है। परंतु मोदी ठहरे मोदी। नरेंद्र मोदी का आगमन दंगों से हुआ था, क्या पता मोदी की विदाई भी दंगों से हो। भला कौन भारतवासी होगा जिसको 2002 का गुजरात भूला हो। कम से कम उन दंगों में दो हजार व्यक्ति मारे गए थे और मोदी सरकार गुजरात में हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। भले ही कोर्ट-कचहरी में मोदी के विरूद्ध कुछ सिद्ध नहीं हुआ हो, पर उनके हाथों पर आज भी गुजरात नरसंहार के छींटे हैं। गुजरात दंगों ने ही नरेंद्र मोदी को हिंदू हृदय सम्राट बना दिया था और उसी छवि को लेकर वह भारत के प्रधानमंत्री बन गए। परंतु देश की सत्ता में हिंदू हृदय सम्राट ऐसे डूबे कि न तो उनको हिंदू याद रहा और न ही भगवान राम।

यह खतरनाक स्थिति है। मोदी के लिए भी और देश के लिए भी। अगर मोदी 2019 में हारे, तो बस मोदी खत्म। जिस ढंग से मोदी ने सत्ता चलाई है उसमें स्वयं उनकी पार्टी हार के बाद उनका बोझ ढोने वाली नहीं है। नितिन गडकरी के बयानों से स्पष्ट है कि मोदी को हार के बाद बीजेपी में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना है। पर मोदी का सपना 2022 तक सत्ता में रहने का है। साथ ही संघ को 2022 तक हिंदू राष्ट्र चाहिए। वोटर तो मोदी से भाग गया। अब दोबारा सत्ता कैसे प्राप्त हो? मोदी फिर हिंदू हृदय सम्राट बन जाएं और सब कुछ भूलकर हिंदू बहुमत उनको ताज पहना दे। केवल यही रास्ता बचा है। इसीलिए अब मोदी जी को भगवान राम याद आ रहे हैं।

परंतु अब हिंदू हृदय सम्राट बनें कैसे? बस वही एक गुजरात दंगों वाला रास्ता है। सारा देश नहीं तो कम से कम हिंदी भाषी राज्यों को 2002 का गुजरात बना दो। फिर वही दंगे और बीजेपी की फिर वही राजनीति, 1990 के दशक की राजनीति, जिसके सहारे बीजेपी सत्ता तक आई थी। मैं यह नहीं कह रहा कि बस यही होने जा रहा है। लेकिन मोदी का इतिहास यह बताता है कि इसकी बहुत कुछ संभावना है।

इस लेख को लिखते समय कुछ समाचार ऐसे मिले हैं कि जिसमें अमेरिकी एजेंसियों ने भी भारत में चुनाव से पूर्व हिंदू-मुस्लिम माहौल गरमाने की संभावना व्यक्त की है। अब देश ऐसी स्थिति का सामना कैसे करे? इस प्रश्न का उत्तर भारत की विपक्ष और खासकर कांग्रेस पार्टी को ढूंढ़ना होगा। एक बात स्पष्ट है कि हिंदुत्व राजनीति का जवाब नरम हिंदू राजनीति नहीं हो सकती है।

क्योंकि यदि देशवासियों को हिंदू राजनीति ही चाहिए होगी तो उसकी पहली पसंद बीजेपी ही होगी। स्पष्ट है कि यह राजनीति बीजेपी से बेहतर और कोई नहीं कर सकता। इसलिए विपक्ष को अभी से यह तय करना होगा कि हिंदुत्व की राजनीति का सामना उसको डटकर एक आधुनिक विकल्प के साथ बगैर किसी संकोच के करना होगा। और भारत कोई पाकिस्तान नहीं है कि यहां धर्म की राजनीति के अतिरिक्त और कोई राजनीति नहीं चल सकती।

भारत एक आधुनिक देश है। यहां की सभ्यता सर्वधर्म संभाव जैसे विचारों की सभ्यता है। फिर हिंदू समाज ने आदिकाल से ही धर्म और राजनीति के बीच एक फासला रखा है। ऐसी परिस्थितियों में मोदी के राम मंदिर कार्ड का जवाब खुलकर यह होना चाहिए कि यह राम भक्ति नहीं सत्ता की खोखली राजनीति है और देशवासियों के हित में ऐसी राजनीति को विफल होना ही चाहिए।

यह रास्ता कठिन हो सकता है, परंतु असंभव नहीं है। आखिर 1947 के बंटवारे की आग को उस समय कांग्रेस पार्टी ने बुझाया भी था और चुनाव भी जीता था। नरेंद्र मोदी या संघ कांग्रेस के इतिहास और भारतीय सभ्यता से महान नहीं हैं। ये बौने थे और बौने ही रहेंगे। आवश्यकता केवल यही है कि अब राम के नाम पर सत्ता के लिए राजनीति होती है तो उसका खुलकर सैद्धांतिक राजनीति से सामना और विरोध होना चाहिए। इस महाभारत में भगवान राम भी बीजेपी का नहीं सत्य और सिद्धांतों के ही साथ होंगे। इसलिए अब मंदिर की राजनीति के खिलाफ सिद्धांत की ही राजनीति चाहिए और विपक्ष को इसमें संकोच नहीं करना चाहिए।

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