घर में नमाज पर आदेश देकर न्याय में विश्वास बहाल करने की कोशिश करने वाले जस्टिस अतुल श्रीधरन का रोस्टर बदला
इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों का नया रोस्टर लागू हो गया। अब जस्टिस अतुल श्रीधरन 2021 से आगे की फैमिली कोर्ट की अपीलें और माता-पिता और सीनियर सिटीजन के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम से संबंधित मामले सुनेंगे। निम्नलिखित लेख नए रोस्टर से पहले लिखा गया है।

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से शासन व्यवस्था 'बुलडोजर के बल पर न्याय', फर्जी मुठभेड़ों, मनमानी गिरफ्तारियों और कानून के शासन की घोर अवहेलना की संस्कृति का पर्याय रही है। संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करने के बजाय, न्याय की नौकरशाही व्याख्या अक्सर राजनीतिक लाभ के लिए झुक जाती थी। हाल ही में, और उल्लेखनीय रूप से, न्यायिक हस्तक्षेप - विशेष रूप से इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन के नेतृत्व में - अदालतों में विश्वास बहाल करना शुरू कर रहा है।
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने राज्य के उन अनेक कामों को चुनौती दी है जिनसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों, खास तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन हुआ है, और उन्होंने संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन किए बिना कानून-व्यवस्था बनाए रखने के अपने प्राथमिक कर्तव्य में विफल रहने के लिए अफसरों की खुलेआम निंदा की है। उनके साहसिक निर्णय और स्पष्ट टिप्पणियां न केवल विशिष्ट अन्यायों का समाधान पेश करती हैं, बल्कि ये व्यवस्थागत बदलाव के लिए सशक्त आह्वान भी हैं।
अब जैसे, संभल का उदाहरण लें। जिला प्रशासन ने रमज़ान के दौरान मस्जिद में नमाज अदा करने वालों की संख्या सीमित करने का आदेश जारी किया, तो अदालत ने अतिरिक्त महाधिवक्ता से सीधे पूछा, 'क्या मंदिरों में भी ऐसे प्रतिबंध लगाए जाते हैं? (पिछले साल प्रयागराज में) महाकुंभ मेले में भगदड़ मच गई थी, तो क्या आपने वहां तीन वर्ग फुट में दो व्यक्तियों की सीमा तय की थी? अगर हिन्दू अपने घरों में पूजा कर रहे हैं, तो क्या उन्हें ऐसा करने से रोका जा सकता है?'
जब राज्य सरकार ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के आधार पर प्रतिबंध का बचाव किया, तो अदालत की टिप्पणी तीखी थी। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा, 'अगर एसपी और डीएम को लगता है कि परिसर के अंदर बड़ी संख्या में लोगों के प्रार्थना करने से कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, तो उन्हें या तो अपने पदों से इस्तीफा दे देना चाहिए या संभल से बाहर अपने तबादले की मांग करनी चाहिए।' उन्होंने अधिकारियों को याद दिलाया कि सभी परिस्थितियों में कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करना प्रशासन का कर्तव्य है।
जनवरी 2026 में एक अलग मामले में, अदालत ने अधिकारियों को इस बात पर जोर देने के लिए फटकार लगाई कि ईसाई श्रद्धालुओं को निजी घरों में प्रार्थना सभाओं के लिए इकट्ठा होने के लिए पूर्व अनुमति की जरूरत है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कानून का उल्लेख किया कि निजी संपत्ति पर पूजा या प्रार्थना करने के लिए सरकार या पुलिस की पूर्व अनुमति की कोई जरूरत नहीं है। अदालत ने पूछा कि क्या अपने घरों में प्रार्थना करने या भजन गाने वाले हिन्दुओं पर भी इसी तरह की बंदिश लगाई जा सकती है? यह टिप्पणी भी की कि शासन को सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए।
इन सब पर जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष महमूद मदानी ने सही ही कहा कि 'पिछले कुछ वर्षों में - खासकर यूपी में - ऐसे कई मामले सामने आए जहां नमाज अदा करने या धार्मिक सभाएं आयोजित करने मात्र पर एफआईआर दर्ज की गई और गिरफ्तारियां की गईं। शांतिपूर्ण ढंग से इबादत को गलत तरीके से कानून-व्यवस्था का मुद्दा बना दिया गया, जिससे नागरिकों में अनावश्यक भय और परेशानी पैदा हुई। हाईकोर्ट के हाल के इन फैसलों से अब बहुत जरूरी स्पष्टता मिल गई है।'
अखिल भारतीय ईसाई परिषद के सदस्य जॉन दयाल ने भी कहा कि 'आप अपने घर के अंदर क्या करते हैं, क्या खाते हैं, कैसे कपड़े पहनते हैं, यह निजी मामला है। इसके लिए किसी अनुमति की जरूरत ही क्यों होनी चाहिए? अदालत को इस बुनियादी स्वतंत्रता को बहाल करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा, यह इस बात का प्रमाण है कि एक राष्ट्र के रूप में हमारा क्या हाल हो गया है।'
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और सिद्धार्थ नंदन की उसी पीठ ने बरेली के डीएम और एसएसपी को भी अवमानना का नोटिस जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने (याचिकाकर्ता तारिक खान सहित) कुछ लोगों को एक निजी घर के अंदर नमाज अदा करने से रोका था। रेशमा खान के स्वामित्व वाले एक खाली घर में 'बिना अनुमति' नमाज अदा करने के आरोप में तारिक खान को सबसे पहले 16 जनवरी 2026 को अन्य लोगों के साथ हिरासत में लिया गया था। पीठ ने कहा कि कानून के तहत किसी भी नागरिक को धार्मिक प्रार्थना करने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं है क्योंकि अनुच्छेद 25 के तहत यह नागरिक का मौलिक अधिकार है।
न्यायमूर्ति श्रीधरन की सबसे कम चर्चित टिप्पणियों में से एक मध्य प्रदेश न्यायपालिका में व्याप्त 'जाति व्यवस्था' और 'सामंती मानसिकता' की तीखी निंदा करना है। उन्होंने कहा कि हईकोर्ट के न्यायाधीशों को 'सवर्ण' और जिला न्यायाधीशों को 'शूद्र' समझा जाता है। उन्होंने कहा कि 'जिला न्यायपालिका के न्यायाधीश जब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का अभिवादन करते हैं तो उनकी शारीरिक मुद्रा लगभग गिड़गिड़ाहट जैसी होती है, जिससे जिला न्यायपालिका के न्यायाधीश अकशेरुकी (इनवर्टिब्रेट) स्तनधारियों की एकमात्र पहचान योग्य प्रजाति बन जाते हैं।'
उन्होंने यह भी कहा कि 'जिला न्यायपालिका के न्यायाधीश न केवल रेलवे प्लेटफॉर्म पर हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की इच्छानुसार व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होते हैं और उनकी सेवा करते हैं, बल्कि उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में प्रतिनियुक्ति पर तैनात जिला न्यायपालिका के न्यायाधीशों को हाईकोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा लगभग कभी भी बैठने की जगह तक नहीं दी जाती है।'
यह टिप्पणी पूर्व जिला न्यायाधीश जगत मोहन चतुर्वेदी की अपील पर सुनवाई करते हुए की गई, जिन्हें 2015 में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के विशेष न्यायाधीश के पद से बर्खास्त कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि 'उनके परिवार हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, माता-पिता का इलाज चल रहा है, घर बनाना है, बचत करनी है, और जब हईकोर्ट उनके द्वारा पारित न्यायिक आदेश के आधार पर उनकी सेवा अचानक समाप्त कर देता है, तो वे और उनका पूरा परिवार बेघर हो जाता है, उन्हें पेंशन नहीं मिलती और समाज में उनकी ईमानदारी पर संदेह होने का कलंक झेलना पड़ता है।' अदालत ने चतुर्वेदी का वेतन और पेंशन बहाल करने के साथ-साथ उन्हें मुआवजे के रूप में एकमुश्त राशि देने का आदेश दिया।
न्यायमूर्ति श्रीधरन उन गिने-चुने उच्च न्यायालय न्यायाधीशों में हैं जिन्होंने 2023 में मध्य प्रदेश से स्वैच्छिक तबादला मांगा था, क्योंकि उनकी बेटी इंदौर में वकालत शुरू करने वाली थी। उनका तबादला जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में हुआ, जहां उन्होंने 'द कश्मीरवाला' के संपादक फहद शाह को 2022 से जेल में रखने के लिए पुलिस को फटकार लगाते हुए उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया। न्यायालय ने शाह पर लगाए गए 'नैरेटिव टेररिज्म' के आरोप को भी खारिज कर दिया। आदेश में यह सवाल भी उठाया गया कि आखिर, शाह को 2011 में प्रकाशित एक लेख के लिए यूएपीए के तहत क्यों हिरासत में लिया गया।
2025 में, श्रीधरन को मध्य प्रदेश वापस भेज दिया गया और उसी साल अगस्त में उनका तबादला छत्तीसगढ़ कर दिया गया, जहां वे वरिष्ठता क्रम में दूसरे स्थान पर होने के कारण कॉलेजियम का हिस्सा होते। हालांकि, केन्द्र सरकार ने हस्तक्षेप किया और अक्तूबर 2025 में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति श्रीधरन का तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट में कर दिया, जहां वे वरिष्ठता क्रम में सातवें स्थान पर हैं और इसलिए तीन सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों वाले कॉलेजियम का हिस्सा नहीं हैं।
श्रीधरन मामले का जिक्र किए बिना, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने पुणे में एक भाषण में कहा कि 'न्यायाधीशों के तबादलों और तैनाती में केन्द्र सरकार का कोई दखल नहीं हो सकता। वह यह नहीं कह सकती कि अमुक न्यायाधीश का तबादला होना चाहिए या नहीं, या यदि तबादला होता है तो उसे अमुक उच्च न्यायालय में भेजा जाए।' उन्होंने कहा कि ’जब कॉलेजियम खुद अपने मिनट्स में यह दर्ज करता है कि हाईकोर्ट के किसी न्यायाधीश का तबादला केन्द्र सरकार के इशारे पर किया जा रहा है, तो यह कार्यपालिका के प्रभाव का स्पष्ट अतिक्रमण है।'
न्यायमूर्ति श्रीधरन उन ईमानदार न्यायाधीशों की सूची में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने हाल के वर्षों में न्यायमूर्ति अखिल कुरैशी, न्यायमूर्ति मुरलीधरन और न्यायमूर्ति जयंत पटेल जैसे कई दबावों का सामना किया है। यूपी में उनका कार्यकाल कितना लंबा चलेगा, यह गहन अटकलों का विषय है।
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