उन्नाव, उत्तराखंड और एमपी में महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के साथ खड़ी सत्ता और उठते सवाल
उत्तराखंड, उन्नाव के बाद मध्यप्रदेश की घटना जिसमें सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल के जनप्रतिनिधियों पर आरोप है। बेशक आरोप सिद्ध नहीं हुआ है, लेकिन सत्तारूढ़ दल ने विगत समय में दोषियों के प्रति जो रुख अपनाया है, वह अपने आप में कई सवाल खड़े करता है

एक तरफ स्त्री मुक्ति आंदोलन का पचासवां वर्ष मनाया जा रहा है, दूसरी तरफ एक के बाद एक वीभत्स घटनाएं सामने आ रही हैं। उत्तराखंड, उन्नाव के बाद मध्यप्रदेश की घटना जिसमें सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल के जनप्रतिनिधियों पर आरोप है। बेशक आरोप सिद्ध नहीं हुआ है, लेकिन सत्तारूढ़ दल ने विगत समय में दोषियों के प्रति जो रुख अपनाया है, वह अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
हाथरस में दलित महिला के साथ हुई ह्रदय विदारक घटना के बाद दबंग वर्ग के आरोपी को बचाने की खुली कोशिश हुई। बिलकिस बानो के दोषी रिहा किए गए और उनका भव्य स्वागत आयोजन हुआ। सालों पहले भंवरी देवी के साथ सामूहिक बलात्कार को अंजाम देने वालों का इसी दल के द्वारा मंच सजाकर स्वागत किया गया। विनेश फोगाट को अब भी न्याय नहीं मिला। गोया कि दोषी को नवाजा गया और अब वह खुलकर पुनः उसी खेल संघ में भी लौट आए हैं।
सत्तारूढ़ दल के विभिन्न मोर्चा संगठन और दल जिन्हें घटना के बाद फ्रिंज कह दिया जाता है, अनेक बार अपनी मानसिकता का प्रदर्शन कर चुके हैं। ईसाई मतावलंबियों पर हमले तेज हुए हैं, तो सर्वाधिक हमले ननों पर हुए हैं। यौनिक शोषण के इन हमलों पर कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। इसी मानसिकता ने अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के चित्र को अश्लील बनाकर नेट में बुल्ली सुल्ली डील के नाम पर बोली लगाई। सत्तारूढ़ दल के जिम्मेदार नेताओं की कोई सार्वजनिक फटकार कभी सुनाई नही पड़ी। तो क्या इसे शीर्ष नेतृत्व की मौन स्वीकृति माना जाए या मौन प्रोत्साहन। कश्मीर की लड़कियां 370 समाप्ति के बाद सहज उपलब्ध हो जाएंगी की अशोभनीय टिप्पणी भी अब तक गूंज रही है।
आखिर यह सब जब हो रहा है, तो कहीं कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं हो रही? क्या महिलाओं को एक दूसरे के लिए खड़े होने में गुरेज है? निर्भया के बाद जिस तरह एक व्यापक जन आंदोलन बना, उसी के कारण सेवानिवृत्त न्यायाधीश जैन की अध्यक्षता में समिति बनी और बलात्कार पर पहले से मौजूद कानून को और कड़ा किया गया। मगर आज कोई ऐसी हलचल दिखाई नहीं पड़ती जबकि हाल की घटना से तो सीधे तौर पर वर्तमान में सत्तासीन जनप्रतिनिधि जुड़े हैं।
ऐसे में कुछ ऐतिहासिक संदर्भ भी याद आते हैं। जब 1978 में मथुरा नाम की नाबालिग आदिवासी बच्ची के साथ पुलिस थाने में पुलिसकर्मियों द्वारा दुष्कर्म हुआ, तब पूरे देश के प्रगतिगामी महिला जनसंगठन सड़क पर उतर आए। “नारी निर्यातना प्रतिरोध मंच”, कोलकाता, “प्रोग्रेसिव आर्गेनाईजेशन आफ वुमन”, हैदराबाद, स्त्री संघर्ष समिति, “फोरम अगेंस्ट ऑप्रे शन ऑफ वुमन” मुंबई के अथक संघर्ष ने 1983 में कानूनी संशोधन को अंजाम दिया। उत्तर पूर्व में थंगजम मनोरमा के साथ सैन्य अधिकारियों ने जब सामूहिक बलात्कार किया, तब महिला संगठनों ने सशक्त आवाज उठाई। पूरे उत्तर पूर्व के महिला संगठन अत्यंत जागरूक रहे हैं। दहेज के खिलाफ सख्त कानून तरविंदर कौर की पीड़ादायक मृत्यु के बाद ऐसे ही हुए जनसंघर्ष से बना। भ्रूण हत्या निषेध, भ्रूण परीक्षण निषेध, कार्यस्थल में सुरक्षा हेतु विशाखा निर्णय अनुसार प्रयास, देवराला के रूपकुंवर सती की घटना के बाद 1988 में पुनः सती प्रथा पूर्ण बंदी कानून में और संशोधन लाया जाना जारी रहा।
इसी माहौल में शाहबानो के हक की भी पुख्ता लड़ाई जनसंगठनों ने लड़ी। तत्कालीन सरकार ने भले ही उच्चतम न्यायालय के फैसले को सदन में बदला, पर फिर सदन ने नागरिक दायरे में नया प्रावधान भी पारित किया, नागरिक मामले को आपराधिक नहीं होने दिया, हालांकि स्त्रीगामी संगठन इसके खिलाफ खुलकर विरोध दर्ज करते रहे।
प्रतिरोध कभी एकांकी नहीं होता। उसकी नींव में सामूहिक चेतना होती है। यह चेतना एक सदी के अभ्यास से परिपक्व हुई थी। आजादी के संग्राम में जब जाति, निजी मालिकी और अधिनायकत्व पर संघर्ष चला तो सदियों की पितृसत्ता को भी चुनौती मिली। पंडिता रमाबाई ने तमाम पुरुष रचित धर्म शास्त्रों के विकल्प के बतौर स्त्री धर्म नीति की रचना कर डाली, तो रुकमा बाई राऊत ने अपने पति से विच्छेद लेने के लिए जेल जाना कुबूल किया। इस माहौल ने संविधान निर्माण में हिन्दू स्त्री को पुनर्विवाह, तलाक और जायदाद के हक की बुनियाद रखी। इन सब नारीवादी प्रयासों के खिलाफ अनेक पूर्वगामी खड़े रहे। पर महिलाएं भी डटी रहीं। यह एक विचार पर्यावास में हुआ।
इस पर्यावास की आधारशिला में हक था। महिला खुद को हकदार मानती रही। उसकी आजादी निसर्ग ने तय की थी। सो उसने कृतिम गुलामी के खिलाफ कमान संभाली। उसे जो मिल रहा था, वह मेहरबानी नही थी, कोई खैरात नहीं थी जिसके लिए किसी के आगे झुकना मजबूरी हो जाए। यह हकदार का अपना देश था जहां उसे अपने लिए खड़े होने की भरपूर आजादी थी।
विगत दशक में ठीक इसका उलट हुआ है। बहना लाडली, लाड़की है। उसे बख्शीश मिलेगी। कहीं दो हजार, कही दस हजार, पर वह हकदार नहीं रहेगी। उसे हुक्मरानों के आगे शीश झुकाना पड़ेगा। आज्ञाकारी होना होगा। उसे सवाल पूछने नहीं दिया जाएगा। पूछने वाले देशद्रोही कहलाएंगे, विनेश की तरह सड़क पर घसीटे जाएंगे। जब बार-बार अपने ही देश में अपने हक के लिए खड़े होने पर द्रोही करार किया जाता रहे, तो थोड़े समय में प्रतिरोध हताशा में बदल सकता है। फिर एक तबका बख्शीश की मजबूरी से खामोश हो जाता है क्योंकि उसके पास नोटबंदी के बाद कोई जमा राशि नहीं बची। अधिकांश बचत स्त्रियों की खत्म हुई। खैरात के माहौल में हुकूमत की जी हुजूरी करना लाजमी हो जाता है। हक की आजादी गुलामी के आज्ञापालन में बदल जाती है।
यह भी सही है कि महिला अत्याचार को समाज मात्र महिला मुद्दा मान चुका है। पुरुष उसके लिए सड़क पर नहीं उतरते जबकि सबसे ज्यादा सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता उनके पास है। राजधानी में हुई महिला शून्य विदेश मंत्रालय की प्रेस वार्ता तक में बिना प्रतिरोध भाग लिया। आज के सत्तासीन दल की शुरुआत जिस संगठन से हुई है, उसने हाल ही में शतक पूरा किया है। उस संगठन में इस बात का गौरव मनाया जाता है कि कोई स्त्री सदस्य तक नहीं है। फासीवादी संगठन की छांव में केवल गुलामी पनप सकती है। उसमें हक की कोई बात नहीं हो सकती। उनसे कुछ नहीं सीखा जा सकता है। भले ही कोई उनकी संगठन क्षमता से कितना ही प्रभावित हो, गुलामी के माहौल में कभी चेतना नहीं पल्लवित हो सकेगी।
खासकर जबकि तीन हजार साल की संस्थागत पितृसत्ता समाज में गहरे तक पैठ चुकी, दुष्कर्म पीड़िता में ही आचार-पहनावे की कमी ढूंढने की मानसिकता बरकरार है। स्त्री भी वही दोहराती है। सबरीमाला और हाजी अली में प्रवेश हेतु लड़ने वाली स्त्रियां विरली ही हैं। एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और सत्तारूढ़ दल की पूर्व मंत्री ने भी प्रवेश निषेध को सही ठहराया। बख्शीश देने वाले ही एजेंडा भी तय कर देते हैं। अल्पसंख्यक महिला के तीन तलाक पर सब आंदोलित हुए। कानून बना, मगर यह मेंटेनेन्स का हक हिन्दू स्त्री को क्यों नही, किसी ने नहीं पूछा। इतना बवाल हिजाब पर, मगर घूंघट पर चुप्पी क्यों? किसी ने नहीं पूछा। इतनी लाडली बहना को वैवाहिक बलात्कार से मुक्ति क्यों नहीं? किसी ने नहीं पूछा। किसी भी राजनीतिक दल में कार्यस्थल सुरक्षा लागू क्यों नहीं? किसी ने नहीं पूछा।
मेहरबानी किसी को नागरिक नहीं रहने देती। किसी को नहीं लगता कि देश उसका अपना है। बावजूद इसके महिलाएं आगे आईं। खिलाड़ी बहनें धरने पर बैठीं, नागरिकता कानून के खिलाफ और किसान आंदोलन में महिलाएं खूब आगे आईं। केरल फिल्म उद्योग में शोषण के विरुद्ध हेमा कमिटी इसी चेतना के कारण बनी। मगर जब प्रचार के सब माध्यम, सभी संस्थाओं में स्त्री लघुतम संख्य्यक हो, तो उसकी पुकार नहीं पहुंचती।
न्यायपालिका, विधानपालिका, प्रशासन में निश्चित प्रतिनिधित्व के बगैर खैरात को बेधना मुश्किल होगा। महिला मंत्री, सर्वोच्च पद आदि प्रतीकों से बाहर निकलकर देखना मुमकिन नहीं होगा। महिला संगठनों को भी चाहिए कि वे अराजनीतिकता से उबरें और राजनीतिक चैतन्य की कोशिश करें। पंचायत में निश्चित प्रतिनिधित्व से बहुत अंतर हुआ। वह अब भी कम है। मगर वहीं से शुरुआत हो सकती है।
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