ऊर्जा में अपनी सत्ता होने के मायने: भारत अब अपनी तेल खपत का मात्र 13 प्रतिशत ही उत्पादन करता है!

तेल आयात पर बढ़ती निर्भरता और इनके लिए जिम्मेदार नीतिगत गलतियों पर समय रहते ध्यान न देना नुकसानदेह हो सकता है।

फोटो: सोशल मीडिया
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गुरदीप सिंह सप्पल

1955 में, केशव देव मालवीय नाम के एक युवा मंत्री जवाहरलाल नेहरू के कार्यालय में एक साहसिक प्रस्ताव लेकर पहुंचे कि भारत को अपने कच्चे तेल की खोज, खनन और उत्पादन खुद करना होगा। फिर क्या था, पश्चिमी शक्तियां और वैश्विक तेल कंपनियां मालवीय के इस संप्रभु, राज्य-नेतृत्व वाले तेल खोज और उत्पादन कार्यक्रम के प्रस्ताव के पुरजोर विरोध में खड़ी हो गईं। दरअसल, देश की संपूर्ण पेट्रोलियम चेन का नियंत्रण इन्हीं दिग्गज कंपनियों के हाथ में था और ये पहले से ही भारत पर सस्ता सोवियत तेल (रुपये में भुगतान के बदले उपलब्ध) न खरीदने का दबाव बना रही थीं। उन्होंने अत्यधिक लागत और योग्य तकनीकी कर्मचारियों की कमी का हवाला देते हुए भारत में तेल खोज का खुला विरोध किया।

नेहरू और मालवीय पर इस विरोध का कोई असर नहीं पड़ा। वह एक नव-स्वतंत्र, अविकसित राष्ट्र का नेतृत्व करते हुए अपनी बात पर दृढ़ संकल्पित रहे। जिसका नतीजा 1956 में स्थापित तेल और प्राकृतिक गैस आयोग (ओएनजीसी) के रूप में सामने आया। तीन वर्षों के भीतर, भारत ने अपने पहले बैच के सौ भूवैज्ञानिकों और भू-भौतिकविदों को प्रशिक्षित कर उनकी तैनाती भी कर दी। इसी नई टीम ने 1959 में कैम्बे में तेल की खोज की। 1974 तक, बॉम्बे हाई में भारत का पहला अपतटीय ड्रिलिंग प्लेटफॉर्म चालू हो चुका था, जिसने 1980 के दशक तक देश की दो-तिहाई तेल आवश्यकताओं को पूरा किया। ओएनजीसी भारत की सबसे लाभदायक कंपनी और उसकी ऊर्जा संप्रभुता का मुकुट रत्न बनकर उभरी।

सात दशक बाद, आज वह सपना चकनाचूर हो चुका है। भारत अब अपनी तेल खपत का मात्र 13 प्रतिशत ही उत्पादन करता है। ओएनजीसी, जिसके पास 2014 में 13,000 करोड़ रुपये का नकद अधिशेष था, 2024 तक 78,000 करोड़ रुपये के ऋण में तब्दील हो चुका था, क्योंकि इसका इस्तेमाल नरेन्द्र मोदी सरकार का राजकोषीय घाटा पूरा करने और गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (जीएसपीसी) की विफलता को छुपाने के लिए किया गया था।


ओएनजीसी को मजबूरन जीएसपीसी का अधिग्रहण करना पड़ा, जिसके लिए उसने 7,480 रुपये करोड़ खर्च किए, जबकि उस ब्लॉक में कोई व्यावसायिक उत्पादन नहीं हो रहा था। इसके अलावा, ओएनजीसी को जीएसपीसी का 19,576 करोड़ रुपये कर्ज भी अपने ऊपर लेना पड़ा। 2018 में, उसे एचपीसीएल में 51 प्रतिशत हिस्सेदारी 36,915 करोड़ रुपये में खरीदने के लिए फिर से मजबूर होना पड़ा। इस सौदे में सरकार एक साथ विक्रेता और लाभार्थी दोनों थी, क्योंकि उसने ओएनजीसी का इस्तेमाल अपने विनिवेश लक्ष्यों को पूरा करने के एक साधन के रूप में किया। नतीजा यह हुआ कि कंपनी नकदी की कमी और कर्ज के बोझ तले दब गई, जिसका मतलब था कि भविष्य की खोज के लिए पूंजीगत व्यय में कटौती करनी पड़ी। भारत का तेल उत्पादन 2014 में घरेलू खपत का 26 प्रतिशत था, जो आज घटकर 13 प्रतिशत रह गया है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि 2030 तक यह घटकर मात्र 8 प्रतिशत रह जाएगा।

तेल बॉन्ड का बहाना

घरेलू उत्पादन को व्यवस्थित रूप से कमजोर करते हुए, मोदी सरकार ने यूपीए काल से विरासत में मिले ‘तेल बॉन्ड संकट’ का सहारा लिया। मोदी सरकार के अधिकांश कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें 30-65 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहीं, जो यूपीए काल के 145 डॉलर के उच्चतम स्तर से काफी कम है। फिर भी, खुदरा ईंधन की कीमतें लगातार ऊंची बनी और बढ़ती रहीं, जिसका औचित्य तेल बॉन्ड के पुनर्भुगतान के बोझ को बताया गया।

हालांकि, आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। 2014 में जब मोदी सरकार ने अपना पहला कार्यकाल शुरू किया, तब से लेकर अब तक सरकार ने तेल बॉन्ड के रूप में 3.2 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया है, लेकिन इसी अवधि में पेट्रोलियम कर के रूप में लगभग 44 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है, जो यूपीए सरकार के कार्यकाल में वसूले गए 10.75 लाख करोड़ रुपये से 400 प्रतिशत अधिक है। तेल बॉन्ड का भुगतान पेट्रोलियम कर से प्राप्त कुल राजस्व का मात्र 7.2 प्रतिशत था। जनता को 400 प्रतिशत कर वृद्धि का बोझ उठाना पड़ा; सरकार ने बदले में कर में हेराफेरी का रास्ता अपनाया।


मई 2014 में जब नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभाली, वैश्विक कच्चे तेल की कीमत 107 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन कुछ ही महीनों में कीमतें गिर गईं; जनवरी 2016 तक, ‘इंडियन बास्केट’ {भारतीय रिफाइनरियों द्वारा आयातित ‘खट्टे’ (उच्च-सल्फर) और ‘मीठे’ (कम-सल्फर) कच्चे तेल के विशिष्ट मिश्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों का भारित औसत।} गिरकर 28 डॉलर हो गया- यानी 74 प्रतिशत की गिरावट। अपने तेल का 85 प्रतिशत आयात करने वाले देश के लिए यह एक असाधारण लाभ था। एक दशक तक उच्च कीमतों का सामना करने वाले उपभोक्ताओं को राहत मिलना स्वाभाविक था।

इसके बाद जो हुआ वह राजकोषीय अवसरवादिता का एक उत्कृष्ट उदाहरण था। पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 350 प्रतिशत और डीजल पर 380 प्रतिशत बढ़ा दिया गया। खुदरा कीमतों में कोई कमी नहीं आई। दशकों में तेल की कीमतों में आई सबसे बड़ी गिरावट का पूरा लाभ सरकारी खजाने में चला गया।

कोविड-19 महामारी के दौरान अप्रैल 2020 में जब कच्चे तेल की कीमतें 20 डॉलर से नीचे गिर गईं, तब भी यही रणनीति अपनाई गई थी। मई 2020 में, सरकार ने एक ही दिन में पेट्रोल पर 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 13 रुपये प्रति लीटर की रिकॉर्ड बढ़ोतरी की। उस वर्ष पेट्रोलियम उत्पाद शुल्क राजस्व 3.71 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो एक वर्ष में 69 प्रतिशत की वृद्धि थी। अप्रैल 2025 में, ब्रेंट क्रूड की कीमत फिर से 63 डॉलर पर पहुंचने पर, 2 रुपये प्रति लीटर की और बढ़ोतरी की गई। मोदी के शासनकाल में 2014-15 और 2025-26 के बीच कुल पेट्रोलियम कर संग्रह राज्यों के हिस्से सहित 67 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगा, जिसमें केन्द्र सरकार को लगभग 44 लाख करोड़ रुपये प्राप्त होंगे।


मनमोहन सिंह का शासनकाल…

डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार (2004-2014) ने कच्चे तेल की बेहद कठोर कीमतों के दौर में शासन किया। 2011-12 में भारतीय बास्केट की औसत कीमत 112 डॉलर प्रति बैरल थी, जो इतिहास में अब तक का सबसे उच्च स्तर था। फिर भी, प्रशासित मूल्य तंत्र (एडमिनिस्टर्ड प्राइस मैकेनिज्म) के जरिये खुदरा पेट्रोल की कीमतें 72 रुपये प्रति लीटर से नीचे रखी गईं: यह एक त्रिपक्षीय व्यवस्था थी जिसमें प्रत्यक्ष बजट सब्सिडी, उत्पादन कंपनियों का योगदान और तेल बांड शामिल थे।

यूपीए के दशक में, केन्द्र सरकार ने पेट्रोलियम करों से 10.75 लाख करोड़ रुपये एकत्र किए और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए लगभग 80 प्रतिशत यानी 8.56 लाख करोड़ रुपये सब्सिडी के रूप में वापस दिए। मोदी सरकार ने 44 लाख करोड़ रुपये एकत्र किए और लगभग 4 प्रतिशत यानी 1.7 लाख करोड़ रुपये सब्सिडी के रूप में वापस दिए। अंतर साफ देखा जा सकता है।


उसके बाद की गिरावट

भारत का घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन 2011-12 में 38 मिलियन टन के उच्चतम स्तर पर था। 2023-24 तक यह घटकर 29.4 मिलियन टन रह गया, यानी 23 प्रतिशत की गिरावट। आत्मनिर्भरता, जो 2004 में खपत का 27 प्रतिशत थी, आज घटकर महज 13 प्रतिशत रह गई है।

आईईए का अनुमान है कि बड़े नए निवेशों के बिना, भारत 2030 तक प्रतिदिन केवल 540,000 बैरल तेल का उत्पादन कर पाएगा, जो अनुमानित खपत के 8 प्रतिशत से भी कम होगा। देश को प्रतिदिन 6 मिलियन बैरल से अधिक तेल आयात करना होगा, जिससे यह संभावित रूप से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक बन जाएगा, जिसका वार्षिक तेल बिल 200 अरब डॉलर से अधिक होगा।

विडंबना ही है कि चाहे वह मध्य-पूर्वी संघर्ष से उपजा संकट हो, जलडमरूमध्य की नाकाबंदी से उपजा संकट या ओपेक के उत्पादन संबंधी फैसले से- जो देश अपने तेल का 92 प्रतिशत आयात करता है, उसके पास न तो ऊर्जा सुरक्षा है, न ही ऊर्जा कूटनीति में कोई प्रभाव है, और न ही आपूर्ति में आने वाले झटकों से बचाव का कोई इंतजाम।

1950 के दशक में, भारत एक नवोदित लोकतंत्र था जिसके पास न संसाधन थे, न प्रशिक्षित जनशक्ति और न ही ऊर्जा प्रबंधन का कोई अनुभव। फिर भी, एक दशक के भीतर ही नेहरू ने न केवल स्वदेशी विकास के लिए एक तकनीकी कार्यबल का निर्माण किया, बल्कि विदेशी दबाव का विरोध करने और भारत का मार्ग स्वयं तय करने का संकल्प भी लिया। वह समझते थे कि ऊर्जा संप्रभुता ही अन्य सभी प्रकार की स्वतंत्रता की नींव है।


पश्चिमी तेल कार्टेल की इच्छाओं के विपरीत, वर्षों के अथक परिश्रम के बाद ओएनजीसी ने आकार लिया और इसे भावी सरकारों को रणनीतिक स्वायत्तता के एक साधन के तौर पर सौंप दिया गया। उस संस्था के साथ जो कुछ किया गया है और सस्ते वैश्विक तेल के तीन अलग-अलग स्रोतों का लाभ न मिल पाने से उन उपभोक्ताओं के साथ जैसा अन्याय हुआ है, वह वित्तीय उत्तरदायित्व की भाषा में लिपटे संस्थागत विश्वासघात की कहानी है।

और जैसे-जैसे भारत 2030 तक तेल आयात विधेयक की ओर बढ़ रहा है, जो उसका चालू खाता अस्थिर कर सकता है, सार्वजनिक निवेश कम कर सकता है और उसकी अर्थव्यवस्था को पश्चिम एशियाई राजनीति का हमेशा के लिए बंधक बना सकता है, सवाल अब यह नहीं है कि यह एक गलती थी या नहीं। सवाल यह है कि क्या इसे सुधारने के लिए अब भी समय और इच्छाशक्ति शेष है।

(गुरदीप सिंह सप्पल कांग्रेस की कार्यकारी समिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य हैं)

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