1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से ग़द्दारी की कहानी, आरएसएस और सावरकर की ज़ुबानी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने की बात तो दूर, आरएसएस के उस समय के नेताओं- गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, लाल कृष्ण अडवाणी, के आर मलकानी या अन्य किसी ने भी इस महान मुक्ति आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि संघ अंग्रेज सरकार और सावरकर का पिछलग्गू था।

फोटोः सोशल मीडिया
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शम्सुल इस्लाम

अंग्रेजों के खिलाफ कांग्रेस का आह्वान

आज 8 अगस्त 2020 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक अहम मील के पत्थर, ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ जिसे 'अगस्त क्रांति' भी कहा जाता है को 78 साल पूरे हो गए। साल 1942 की 7 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने बम्बई में अपनी बैठक में एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया, जिसमें अंग्रेज शासकों से तुरंत ‘भारत छोड़ने’ की मांग की गयी थी। अंग्रेज शासन से लोहा लेने के लिए स्वयं गांधीजी ने ‘करो या मरो’ ब्रह्म वाक्य सुझाया और सरकार एवं सत्ता से पूर्ण असहयोग करने का आह्वान किया।

कांग्रेस का यह मानना था कि अंग्रेज सरकार को भारत की जनता को विश्वास में लिए बिना किसी भी जंग में भारत को झोंकने का नैतिक और कानूनी अधिकार नहीं है। अंग्रेजों से भारत तुरंत छोड़ने का यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा एक ऐसे नाजुक समय में लाया गया था, जब दूसरे विश्वयुद्ध के चलते जापानी सेना भारत के पूर्वी तट तक पहुंच चुकी थी और कांग्रेस ने अंग्रेज शासकों द्वारा सुझाई गई ‘क्रिप्स योजना’ को खारिज कर दिया था।

‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के साथ-साथ कांग्रेस ने गांधी जी को इस आंदोलन का सर्वेसर्वा नियुक्त किया और देश के आम लोगों से आह्वान किया कि वे हिंदू-मुसलमान का भेद त्याग कर सिर्फ एक हिंदुस्तानी के तौर पर अंग्रेजी साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए एक हो जाएं।

'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान भारतीयों की कुर्बानी

भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के साथ ही पूरे देश में क्रांति की एक लहर दौड़ गई। अगले कुछ महीनों में देश के लगभग हर भाग में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आम लोगों ने जिस तरह लोहा लिया, उससे भारतीय जनता के 1857 के पहले मुक्ति संग्राम की यादें ताजा हो गईं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने इस सच्चाई को एक बार फिर रेखांकित किया कि भारत की आम जनता किसी भी कुर्बानी से पीछे नहीं हटती है।

हालांकि, अंग्रेज शासकों ने भी आंदोलन का दमन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 9 अगस्त की सुबह से ही पूरा देश एक फौजी छावनी में बदल दिया गया। गांधीजी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं को तो गिरफ्तार किया ही गया, दूरदराज के इलाकों में भी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को भयानक यातनाएं दी गईं।

सरकारी दमन और हिंसा का ऐसा तांडव देश के लोगों ने झेला, जिसके उदाहरण कम ही मिलते हैं। स्वयं सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुलिस और सेना द्वारा सात सौ से भी ज्यादा जगह गोलाबारी की गई, जिसमें ग्यारह सौ से भी ज्यादा लोग शहीद हो गए। शहीदों की यह तादाद सफेद झूठ थी। पुलिस और सेना ने आतंक मचाने के लिए बलात्कार और कोड़े लगाने का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया।

भारत में किसी भी सरकार द्वारा इन हथकंडों का इस तरह का संयोजित प्रयोग 1857 के बाद शायद पहली बार ही किया गया था। अंग्रेज सरकार के भयानक, बर्बर और अमानवीय दमन के बावजूद देश के आम हिंदू-मुसलमानों और अन्य धर्म के लोगों ने हौसला नहीं खोया और सरकार को मुंहतोड़ जवाब दिया।

यह आंदोलन ‘अगस्त क्रांति’ क्यों कहलाता है, इसका अंदाजा उन सरकारी आंकड़ों को देखकर लगाया जा सकता है, जो जनता की इस आंदोलन में कार्यवाहियों का ब्योरा देते हैं। इन सरकारी आंकड़ों के अनुसार आंदोलन के दौरान बेकाबू हो चुके लोगों द्वारा देश भर में 208 पुलिस थानों, 1275 सरकारी दफ्तरों, 382 रेलवे स्टेशनों और 945 डाकघरों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।

जनता द्वारा हिंसा बेकाबू होने के पीछे मुख्य कारण यह था कि पूरे देश में कांग्रेसी नेतृत्व को जेलों में डाल दिया गया था और कांग्रेस संगठन को हर स्तर पर गैर कानूनी घोषित कर दिया गया था। कांग्रेसी नेतृत्व के अभाव में अराजकता का होना बहुत गैर स्वाभाविक नहीं था। यह सच है कि नेतृत्व का एक बहुत छोटा हिस्सा गुप्त रूप से काम कर रहा था, परंतु आमतौर पर इस आंदोलन का स्वरूप स्वतः स्फूर्त बना रहा।

जिन्ना, सावरक, आरएसएस का अंग्रेजों के साथ आना

यह जानकर किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इस आंदोलन के दरमियान जिन तत्वों और संगठनों ने दमनकारी अंग्रेज सरकार के प्यादों के तौर पर काम किया, वे हिंदू और इस्लामी राष्ट्र के झंडे उठाए हुए थे। ये भी सच है कि उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भी भारत छोड़ो आंदोलन से अलग रहने का निर्णय लिया था। इस बारे में सबको जानकारी है। लेकिन आज के देशभक्तों के नेताओं ने किस तरह से न केवल इस आंदोलन से अलग रहने का फैसला किया था, बल्कि उसको दबाने में गोरी सरकार की सीधी सहायता की थी, इसके बारे में बहुत कम जानकारी है।

जिन्ना की गद्दारी

मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेसी घोषणा की प्रतिक्रिया में अंग्रेज सरकार को आश्वासन देते हुए कहा था, "कांग्रेस की असहयोग की धमकी दरअसल श्री गांधी और उनकी हिंदू कांग्रेस सरकार द्वारा अंग्रेज सरकार को ब्लैकमेल करने की है। सरकार को इन गीदड़भभकियों में नहीं आना चाहिए।"

मुस्लिम लीग और उनके नेता अंग्रेजी सरकार के बर्बर दमन पर न केवल पूर्णरूप से खामोश रहे बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज सरकार का सहयोग करते रहे। मुस्लिम लीग इससे कुछ भिन्न करे इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि वह सरकार और कांग्रेस के बीच इस भिड़ंत के चलते अपना उल्लू सीध करना चाहती थी। उसे उम्मीद थी कि उसकी सेवाओं के चलते अंग्रेज शासक उसे पाकिस्तान का तोहफा जरूर दिला देंगे।

भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ सावरकर के नेतृत्व में हिन्दू महासभा ने भी खुलेआम दमनकारी अंग्रेज शासकों की मदद की घोषणा की। लेकिन सबसे शर्मनाक भूमिका हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रही, जो भारत माता और हिंदू राष्ट्रवाद का बखान करते नहीं थकते थे। आंदोलन पर अंग्रेजी शासकों के दमन का कहर बरपा था और देशभक्त लोग सरकारी संस्थाओं को छोड़कर बाहर आ रहे थे, जिनमें बड़ी संख्या उन नौजवान छात्र-छात्राओं की थी जो कांग्रेस के आह्वान पर सरकारी शिक्षा संस्थानों को त्याग कर यानी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर बाहर आ गए थे। लेकिन यह हिंदू महासभा ही थी जिसने अंग्रेज सरकार के साथ खुले सहयोग की घोषणा की।

हिंदू महासभा के सर्वेसर्वा वीर सावरकर ने 1942 में कानपुर में अपनी इस नीति का खुलासा करते हुए कहा, "सरकारी प्रतिबंध के तहत जैसे ही कांग्रेस एक खुले संगठन के तौर पर राजनीतिक मैदान से हटा दी गयी है तो अब राष्ट्रीय कार्यवाहियों के संचालन के लिए केवल हिंदू महासभा ही मैदान में रह गयी है...। हिंदू महासभा के मतानुसार व्यावहारिक राजनीति का मुख्य सिद्धांत अंग्रेज सरकार के साथ संवेदनपूर्ण सहयोग की नीति है। जिसके अंतर्गत बिना किसी शर्त के अंग्रेजों के साथ सहयोग, जिसमें हथियार बंद प्रतिरोध भी शामिल है।"

हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने चलाई साझा सरकारें

कांग्रेस का भारत छोड़ो आंदोलन दरअसल सरकार और मुस्लिम लीग के बीच देश के बंटवारे के लिए चल रही बातचीत को भी चेतावनी देना था। इस उद्देश्य से कांग्रेस ने सरकार और मुस्लिम लीग के साथ किसी भी तरह के सहयोग का बहिष्कार किया हुआ था। लेकिन इसी समय हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सरकारें चलाने का निर्णय लिया। ‘वीर‘ सावरकर जो अंग्रेज सरकार की खिदमत में 5 माफीनामे लिखने के बाद दी गयी सजा का केवल एक तिहाई हिस्सा भोगने के बाद हिन्दू महासभा के सर्वोच्च नेता थे, ने इस शर्मनाक रिश्ते के बारे में सफाई देते हुए 1942 में बयान दिया था।

सावरकर ने कहा था, "व्यावहारिक राजनीति में भी हिंदू महासभा जानती है कि बुद्धिसम्मत समझौतों के जरिये आगे बढ़ना चाहिए। यहां सिंध हिंदू महासभा ने निमंत्रण के बाद मुस्लिम लीग के साथ मिलीजुली सरकार चलाने की जिम्मेदारी ली। बंगाल का उदाहरण भी सबको पता है। उद्दंड लीगी, जिन्हें कांग्रेस अपनी तमाम आत्मसमर्पणशीलता के बावजूद खुश नहीं रख सकी, हिंदू महासभा के साथ संपर्क में आने के बाद काफी तर्कसंगत समझौतों और सामाजिक व्यवहार के लिए तैयार हो गए। और वहां की मिली-जुली सरकार मिस्टर फजलुल हक के प्रधानमंत्रित्व और महासभा के काबिल व मान्य नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में दोनों समुदाय के फायदे के लिए एक साल तक सफलतापूर्वक चली।"

यहां यह याद रखना जरूरी है कि बंगाल और सिंध के अलावा नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में भी हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग की गठबंधन सरकार 1942 में सत्तासीन हुई। हिंदू महासभा के नंबर दो श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली सरकार में उपमुख्यमंत्री और गृहमंत्री रहते हुए 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन' को दबाने के लिए सारी हदें ही पार कर दीं।

आरएसएस के प्यारे इस महान हिन्दू राष्ट्रवादी ने बंगाल में मुस्लिम लीग के मंत्रीमंडल में गृहमंत्री और उप-मुख्यमंत्री हुए अनेक पत्रों में बंगाल के जालिम अंग्रेज गवर्नर को दमन के वे तरीके सुझाए जिनसे बंगाल में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को पूरे तौर पर दबाया जा सकता था। मुखर्जी ने अंग्रेज शासकों को भरोसा दिलाया कि कांग्रेस अंग्रेज शासन को देश के लिया अभिशाप मानती है, लेकिन उनकी मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की मिलीजुली सरकार इसे देश के लिए वरदान मानती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गद्दारी

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रवैया 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रति जानना हो तो इसके दार्शनिक एम.एस. गोलवलकर के इस शर्मनाक वक्तव्य को पढ़ना काफी होगा: "1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था। इस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा। प्रत्यक्ष रूप से संघ ने कुछ न करने का संकल्प लिया।"

इस तरह स्वयं गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी भी कहा जाता है, से हमें यह तो पता चल जाता है कि संघ ने आंदोलन के पक्ष में परोक्ष रूप से किसी भी तरह की हिस्सेदारी नहीं की। लेकिन आरएसएस के किसी भी प्रकाशन या दस्तावेज या स्वयं गुरुजी के किसी दस्तावेज से आज तक यह पता नहीं लग पाया है कि संघ ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन में किस तरह की हिस्सेदारी की थी।

गोलवलकर का यह कहना कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रोजमर्रा का काम ज्यों का त्यों चलता रहा, बहुत अर्थपूर्ण है। यह रोजमर्रा का काम क्या था, इसे समझना जरा भी मुश्किल नहीं है। यह काम था मुस्लिम लीग के कंधे से कंधा मिलाकर हिंदू और मुसलमान के बीच खाई को गहराते जाना। आरएसएस के संस्थापक, डा. के बी हेडगेवार (डाक्टरजी) और उनके उत्तराधिकारी- गोलवलकर (गुरुजी) ने अंग्रेज़ शासकों के विरुद्ध किसी भी आंदोलन अथवा कार्यक्रम में कोई भागीदारी नहीं की।

भारत छोड़ो आंदोलन ही नहीं अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध किसी भी आंदोलन को वे कितना नापसंद करते थे, इसका अंदाजा गुरुजी के इन शब्दों से लगाया जा सकता हैः "नित्यकर्म में सदैव संलग्न रहने के विचार की आवश्यकता का और भी एक कारण है। समय-समय पर देश में उत्पन्न परिस्थिति के कारण मन में बहुत उथल-पुथल होती ही रहती है। सन् 1942 में ऐसी उथल-पुथल हुई थी। उसके पहले सन् 1930-31 में भी आंदोलन हुआ था। उस समय कई लोग डाक्टर जी के पास गये थे। इस ‘शिष्टमंडल’ ने डाक्टर जी से अनुरोध किया कि इस आंदोलन से स्वातंत्रय मिल जाएगा और संघ को पीछे नहीं रहना चाहिए।”

उन्होंने आगे कहा, “उस समय एक सज्जन ने जब डाक्टर जी से कहा कि वे जेल जाने के लिए तैयार हैं, तो डाक्टर जी ने कहा- ‘जरूर जाओ। लेकिन पीछे आपके परिवार को कौन चलाएगा?’ उस पर सज्जन ने बताया कि ‘दो साल तक केवल परिवार चलाने के लिए ही नहीं बल्कि आवश्यकता अनुसार जुर्माना भरने की भी पर्याप्त व्यवस्था उन्होंने कर रखी है।’ तो इस पर डाक्टर जी ने कहा- ‘आपने पूरी व्यवस्था कर रखी है तो अब दो साल के लिए संघ का ही कार्य करने के लिए निकलो’। घर जाने के बाद वह सज्जन न जेल गए, न संघ का कार्य करने के लिए बाहर निकले।"

गोलवलकर द्वारा प्रस्तुत इस ब्यौरे से यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है कि आरएसएस का मकसद आम लोगों को निराश और निरुत्साहित करना था। खासतौर से उन देशभक्त लोगों को जो अंग्रेजी शासन के खिलाफ कुछ करने की इच्छा लेकर घर से आते थे। सच तो यह है कि गोलवलकर ने स्वयं भी कभी यह दावा नहीं किया कि आरएसएस अंग्रेज विरोधी था।

अंग्रेज शासकों के चले जाने के बहुत बाद गोलवलकर ने 1960 में इंदौर (मध्य प्रदेश) में अपने एक भाषण में कहाः "कई लोग पहले इस प्रेरणा से काम करते थे कि अंग्रेज़ों को निकाल कर देश को स्वतंत्र करना है। अंग्रेजों के औपचारिक रीति से चले जाने के पश्चात् यह प्रेरणा ढीली पड़ गयी। वास्तव में इतनी ही प्रेरणा रखने की आवश्यता नहीं थी। हमें स्मरण होगा कि हमने प्रतिज्ञा में धर्म और संस्कृति की रक्षा कर राष्ट्र की स्वतंत्रता का उल्लेख किया है। उसमें अंग्रेजोंं के जाने न जाने का उल्लेख नहीं है।"

आरएसएस ऐसी सभी गतिविधियों से बचता था जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ हों। संघ द्वारा छापी गयी डाक्टर हेडगेवार की जीवनी में भी इस सच्चाई को छुपाया नहीं जा सका है। इसमें स्वतंत्रता संग्राम में डाक्टर साहब की भूमिका का वर्णन करते हुए बताया गया हैः "संघ-स्थापना के बाद डा. साहब अपने भाषणों में हिन्दू संगठन के संबंध में ही बोला करते थे। सरकार पर प्रत्यक्ष टीका नहीं के बराबर रहा करती थी।"

अंग्रेजी राज के खिलाफ संघर्ष में जो भारतीय शहीद हुए उनके बारे में गुरुजी क्या राय रखते थे, वह भी उनके इस वक्तव्य से बहुत स्पष्ट है- ‘हमने बलिदान को महानता का सर्वोच्च बिंदु, जिसकी मनुष्य आकांक्षा करे नहीं माना है, क्योंकि अंततः वह अपना उद्देश्य प्राप्त करने में असफल हुए और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गंभीर त्रुटि थी।’

शायद यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक भी कार्यकर्ता अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए शहीद नहीं हुआ। शहीद होने की बात तो दूर रही, आरएसएस के उस समय के नेताओं जैसे की गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, लाल कृष्ण अडवाणी, के आर मलकानी या अन्य किसी आरएसएस सदस्य ने किसी भी तरह इस महान मुक्ति आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि आरएसएस अंग्रेज सरकार और सावरकर का पिछलग्गू था।

भारत छोड़ो आंदोलन के 78 साल गुजरने के बाद भी कई महत्वपूर्ण सच्चाईयों से पर्दा उठना बाकी है। दमनकारी अंग्रेज शासक और उनके मुस्लिम लीगी प्यादों के बारे में तो सच्चाईयां जगजाहिर हैं, लेकिन अगस्त क्रांति के वे गुनहगार जो अंग्रेजी सरकार द्वारा चलाए गए दमन चक्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थे, अभी भी कठघरे में खड़े नहीं किए जा सके हैं। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि वे भारत पर राज कर रहे हैं। हिंदू राष्ट्रवादियों की इस भूमिका को जानना इसलिए भी जरूरी है ताकि आज उनके द्वारा एक प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष भारत के साथ जो खिलवाड़ किया जा रहा है उसके आने वाले गंभीर परिणामों को समझा जा सके।

(आरएसएस और सावरकर के तमाम उद्धरण उनके दस्तावेजों से लिए गए हैं)

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