विष्णु नागर का व्यंग्यः दो बिछड़े भाइयों की कहानी, छोटे ने बड़े को दिखाई घटियापन के शिखर की राह!

दोनों भाइयों को पता था कि उनका एक भाई बचपन में बिछड़ चुका है, मगर वह कहां, कैसा है, ये नहीं पता था। इसका तो अनुमान भी नहीं था कि एक भारत में तो दूसरा अमेरिका में है। इसका पता दोनों को तब चला, जब उनकी राजनीतिक फिल्म क्लाइमेक्स पर पहुंच कर खत्म होने वाली थी!

फोटोः getty images
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विष्णु नागर

आपने दो बिछड़े भाइयों की कहानियों पर बनी हिंदी फिल्में देखी होंगी। ऐसे ही दो भाइयों की यह कहानी है। वे कैसे बिछड़े, कब बिछड़े, क्यों बिछड़े, एक का रंग सांवला और दूसरा झक गोरा क्यों था और बिछड़ कर बड़ा भाई अमेरिका में और छोटा भाई भारत में क्यों और कैसे पाया गया, इस सब पर लिखने के लिए मुझे उपन्यास लिखना पड़ेगा, जबकि न मैं उपन्यास लिखने के मूड में हूं, न प्रकाशक छापने के मूड में हैं। संक्षेप में ये समझ लीजिए कि ये भाई बिछड़े तो मगर ऐसा नहीं हुआ कि एक सफल हो गया और दूसरा टापता रह गया। एक चाय बेचते-बेचते देश बेचने लगा, दूसरा जमीन-मकान के पिता के धंधे से मालामाल हो कर राष्ट्रपति पद को प्राप्त हुआ!

भारतीय छोटा भाई कुछ ज्यादा ही स्मार्ट निकला। उसे बहुत पहले समझ में आ चुका था कि राजनीति ही धन का अकूत और अविरल स्रोत है, बस आप कामयाबी के शिखर पर बने रहें। फिर पैसा आपके चरणों में लोट लगाएगा। बड़े भाई को यह बात देर से समझ में आई, मगर जब आई तो उसने कई झंडे गाड़ दिए!

दोनों भाइयों को यह पता था कि उनका एक भाई बचपन में बिछुड़ चुका है, मगर वह कहां है, कैसा है, इसका उन्हें पता नहीं था। इसका तो अनुमान भी नहीं था कि एक भारत में तो दूसरा अमेरिका में है। इसका पता दोनों को तब चला, जब उनकी राजनीतिक फिल्म क्लाइमेक्स पर पहुंच कर खत्म होने वाली थी! छोटा भाई प्रधानमंत्री बना तो उसे चरणोदक ग्रहण करने बार-बार अमेरिका जाना पड़ता था। वही उसका तीर्थस्थल भी था, पर्यटनस्थली भी और पाप प्रक्षालन केंद्र भी!

हां तो एक बार छोटा भाई जब वाशिंगटन गया हुआ था, तब बड़े भैया भी वहां के राष्ट्रपति बन चुके थे। दोनोंं मिले तो भारत-अमेरिका संबंध तो गए भाड़ में, वे एक-दूसरे को चुटकुले सुनाने लगे। दोनों चकित थे कि पहली ही बार में दोनों में ऐसी बेतकल्लुफी कैसे पैदा हो गई। बातों-बातों में रहस्य खुला कि इसका कारण दोनों का बचपन का बिछड़ा भाई होना है। बस फिर क्या था। पहला रोये तो दूसरा उसके आंसू पोंछे, दूसरा रोए तो पहला। पहले की नाक बहे तो दूसरा अपने रूमाल से पोंछे और दूसरे की नाक बहे तो पहला!

तो यह सब बहुत देर तक चलता रहा। अधिकारी समझे कि द्विपक्षीय संबंधों पर विस्तृत वार्ता हो रही है। खैर, चूंकि छोटा राजनीति में पहले ही सफलता के शिखर छू चुका था तो बड़े ने उससे कहा- छोटू तू ये बता कि मैं राष्ट्रपति तो बन गया, मगर आगे क्या करूं कि यह मुल्क हमेशा-हमेशा के लिए मुझे याद रखे! छोटू ने कहा- 'सिंपल है। न मैं काबिल हूं, न आप हैं। न मैं नेहरू, शास्त्री, इंदिरा हूं, न आप अब्राहम लिंकन हो। ये रास्ता कठिन है और युगानुकूल भी नहीं है!

छोटे ने आगे कहा- तो भैया घटियापन की शिखरों को छूना ही मुझे सफलता का सुमार्ग लगता है। मैंने उसके ऐसे-ऐसे अछूते शिखरों को छुआ है, जिनकी कल्पना बड़ा से बड़ा कालजयी कवि भी नहीं कर सकता! यही इतिहास में जाने का शार्टकट है। प्रेम से झूठ बोलो, जनता को बेवकूफ बनाओ, धोखा दो। उसे कभी अच्छे दिन का, कभी न्यू इंडिया, कभी आत्मनिर्भर भारत का ख्वाब दिखाओ!

छोटे भाई ने और आगे कहा- मैं भारत को जगद्गुरु बना रहा हूं, तुम अमेरिका को ग्रेट बनाओ। करना कुछ नहीं है, सपने दिखाना है। लोगों को जितना बांट सकते हो, बांटो। जितना तोड़ और कुचल सकते हो, तोड़ो और कुचलो। चुनाव मशीनरी को 365×24 चालू रखो। चुनाव से पहले जनता-जनता, चुनाव के बाद अडानी-अंबानी की सेवा करो। याद रखो, जनता बेवकूफ तो है मगर वक्त आने पर तुम्हारी-हमारी दुश्मन भी है। वह आंख दिखाए तो उसकी आंखें निकाल लो। जुबान खोले तो जुबान खींच लो। विरोध करे तो जेल में ठूंस कर सड़ा दो। जो सवाल उठाए, उसके मुंह में गोबर ठूंस दो। जो भक्त बने, उसे गुंडागर्दी की छूट, पीड़ित को जेल!

छोटे ने सलाह जारी रखते हुए कहा- अन्याय ही न्याय है। सारी संस्थाओं पर कब्जा कर लो। मीडिया को सरकारी लाठी से हांको या खदेड़ दो। जो नहीं माने, उसकी पीठ पर ऐसी लात जमाओ कि वह कभी उठ न पाए। जो मरे, जितने मरें, मरने दो। बेशर्मी की बार्डर पर तैनात रहो। जो करो, बेहद आत्मविश्वास से करो। लोकतंत्र, संविधान की माला तो जपो और इनकी निर्मम हत्या करो। बाकी पाठ ऑनलाइन और ऑफलाइन पढ़ाता रहूंगा। मेरे रास्ते पर चलोगे तो इहलोक ही नहीं, परलोक भी सुधार लोगे!

छोटे भाई के चरणचिह्नों पर बड़ा भाई चलने लगा। उसने तीन लाख से अधिक अमेरिकियों को कोरोना से मर जाने दिया। अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठाया। लाखों को बेरोजगार होने दिया। छोटा भाई अंत तक कहता रहा, भैया आप सही रास्ते पर हो। ठीक मेरी दिशा में हो। बड़े भाई के रूप में तुम्हें पाकर मैं गौरवान्वित हूं।

अंत में बड़े भाई का जो हश्र हुआ, सो आपके सामने है, मगर फिर भी बड़ा भाई, छोटे का ऋणी है कि उसने जो राह दिखाई थी, उस पर अंत तक चलते हुए उसने केवल चार साल राष्ट्रपति रहने का घाटा तो सहा मगर घटियापन की पराकाष्ठाएं छूकर अपना नाम इतिहास में दर्ज तो करवा ही लिया।थैंक्स छोटे, थैंक्स अगेन। बड़े को अब एक ही चिंता है कि कहीं छोटा इतिहास में नाम दर्ज करवाने में उससे बाजी न मार ले जाए!

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