समय आ गया है जब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खत्म कर उस पर ताला जड़ दिया जाए

एक ऐसे शख्स ने महिला पर हाथ उठाया है जिसके नाम में मुफ्ती लगा है, कासमी लगा है और वह पर्सनल लॉ बोर्ड का सदस्य भी है। इस शख्स को खुद ही माफी मांग लेनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसे में अब वह वक्त आ गया है जब बोर्ड को खत्म कर उसपर ताला जड़ देना चाहिए।

मेरा मानना है कि अब वह वक्त आ गया है जब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि जिस मकसद के लिए इस बोर्ड की स्थापना की गई थी, बोर्ड उस मकसद में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। इतना ही नहीं अब बोर्ड के हर क्रियाकलाप से मुसलमानों को नुकसान पहुंच रहा है।

अभी मंगलवार (17 जुलाई) को ही एक न्यूज चैनल ज़ी हिंदुस्तान पर जो कुछ दिखा या दिखाया गया उसके बाद अब इस बोर्ड के अस्तित्व में रहने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। एक शख्स, जिसके नाम के साथ मुफ्ती लगा हो, कासमी लगा हो, पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य होने का तमगा लगा हो और वेशभूषा से वह पूरी तरह मुसलमान भी लगता हो, वह शख्स किसी महिला से बातचीत के दौरान इस हद तक बिफर जाए कि मारपीट की नौबत आ जाए।

इस शर्मनाक हरकत पर सबसे पहले पर्सनल लॉ बोर्ड को चाहिए था कि इस शख्स की सदस्यता खत्म कर देता। लेकिन सूत्रों के मुताबिक बोर्ड ने स मामले की लीपापोती करतेहुए जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बना दी है। देश का हर नागरिक जानता है कि कमेटी बनाकर जांच कराने का क्या अर्थ होता है। वैसे यह भी खबर है कि इस शख्स की पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी से काफी नजदीकिया हैं।

इस पूरे मामले में खुद यह शख्स, जिसका नाम मुफ्ती एजाज़ अरशद कासमी है, या उनके साथी अपने बचाव में यह बात जरूर कहेंगे कि पहले तो महिला वकील ने हाथ उठाया था या बदतमीजी या अभद्रता की थी। लेकिन यह कहकर कोई आम शख्स भी अपना बचाव करे तो भी उसकी बात नहीं सुननी चाहिए। और ऐसी हरकत ऐसा शख्स करे जिसके नाम के साथ मुफ्ती, कासमी और बोर्ड के सदस्य की उपाधियां लगी हों, तो ऐसे शख्स को तो खुद ही सार्वजनिक जीवन से दूर होकर न सिर्फ इस सबक लिए माफी मांगना चाहिए, बल्कि कानून के तहत सजा के लिए खुद को पेश कर देना चाहिए।

शर्म आ रही है ऐसे शख्स के बारे में लिखते हुए, यह वह शख्स है जिसने हर सियासी पार्टी का दरवाजा खटखटाया है, यह महज कोई एक आम शख्स होता तो कोई बात नहीं थी, यह शख्स मुफ्ती है, जिसके पास ऐसी डिग्री है जिसके हासिल करने पर उसे फतवा जारी करने का हक मिल जाता है, इस शख्स ने देश के सबसे बड़े धार्मिक संस्थान दारुल उलूम देवबंद से शिक्षा हासिल की है, और देश की उस संस्था का सदस्य है जिस पर मुसलमानों के शरई मामले हल करने की जिम्मेदारी है। वह शख्स इस तरह की हरकत करता है तो पूरी कौम की बदनामी होती है।

इस सारे मामले में पर्सनल लॉ बोर्ड भी जिम्मेदार है। जिस मुद्दे पर यह शख्स चैनल पर बहस करने गया था, वह तीन तलाक और मुसलमान महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा था। तीन तलाक वह मुद्दा है, जिस पर पर्सनल लॉ बोर्ड की वजह से भारतीय मुसलमानों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। बोर्ड ने वक्त रहते इस मामले में जरूरी राय-मश्विरा नहीं किया और अदालत में बाकायदा इस बात को मान लिया कि इसमें खामियां हैं।

1973 में अस्तित्व में आए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हमेशा देश के मुसलमानों को नुकसान ही पहुंचाया है। चाहे शाह बानों का केस हो, चाहे बाबरी मस्जिद का मामला हो या तीन तलाक का मामला हो। बोर्ड के हर क्रियाकलाप से सांप्रदायिक ताकतों को मजबूती मिली है। और अभी हाल में बोर्ड की कार्यसमिति की बैठक से पहले देश में और ज्यादा दारुल कज़ा खोलने का ऐलान करके भी सांप्रदायिक शक्तियों को मुद्दा मिला। और इस दौरान दारुल कज़ा और शरई अदालत के फर्क को समझाने में भी बोर्ज नाकाम साबित हुआ। नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में यह गलतफहमी फैली कि मुसलमान अपनी अलग अदालतें कायम करना चाहते हैं।

इस शख्स की हरकत ने इस बात से भी पर्दा उठा दिया है कि बोर्ड के सदस्य बनना कितना आसान है। बोर्ड में तीन तरह के सदस्य होते हैं। कार्यसमिति सदस्य, स्थाई सदस्य और अस्थाई सदस्य जिन्हें आमंत्रित सदस्य भी कह सकते हैं। बोर्ड में 200 से ज्यादा आमंत्रित या अस्थाई सदस्य हैं। इसी सबके चलते इस शख्स को बोर्ड की सदस्यता मिली है। अगर किसी संस्था में ऐसे शख्स का प्रवेश आसान हो जाए तो उस संस्था के वरिष्ठ और गंभीर सदस्यों को समझ लेना चाहिए कि अब संस्था पर ताला लगाने का समय आ गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से काफी नुकसान हो चुका है, लिहाज़ा सको फौरन बंद करने की जरूरत है।

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