उत्तराखंड में शुद्धिकरण की घटना द्विज राष्ट्रवाद का आइना
अभी शतक पूर्ण किए संगठन का लक्ष्य द्विज राष्ट्र बनाना है। वह संगठन जो हिसाब देना शान के खिलाफ समझता है।

उत्तराखंड में हाल में एक शुद्धिकरण की घटना घटी। एक राष्ट्रीय नेता के कार्यक्रम के बाद अतिदक्षिणपंथी संगठन ने उसको अंजाम दिया। राज्यसभा के सभापति सी पी राधाकृष्णन और सत्तारूढ़ दल के पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जांच का आश्वासन जरूर दिया। यह भी कहा कि वह और उनकी पार्टी छुआछूत और भेदभाव को नहीं मानते। शुद्धिकरण करने वाले संगठन का उनसे कोई संबंध नहीं है। यहां तक सब दुरुस्त लगता है ‘सो फार, सो गुड’, पर बात इतनी सीधी भी नहीं।
सवाल यह है कि पिछले दो दशकों में ऐसे अनेक संगठन तैयार हुए हैं जो खुलेआम मानवतावादी और संवैधानिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाते हैं। स्वाभाविक तौर पर उग्र घटनाओं के पैरोकार हैं। वे इससे पीछे नहीं हटते। घटना पर कभी शर्मिंदा नहीं होते, उल्टे सीना ठोककर जिम्मेदारी लेते हैं। इन घटनाओं में हत्या, हत्या की धमकी, निम्न स्तर की भाषा का इस्तेमाल शामिल है। भले आज हुक्मरानों को जंतर-मंतर की भाषा भद्दी लगी, पर मुड़ कर देखें तो यह उन्हीं के कथित फ्रिंज द्वारा बरसों पहले इजाद किया गया शब्दकोश है।
इन फ्रिंज संगठनों का संचालन कौन करता है? किस विचार वातावरण में यह संगठन पनपते हैं? कौन इनको प्रोत्साहित करता है। क्या इन संगठनों को तब प्रोत्साहन नहीं मिलता जब किसी हिंसक घटना के बाद किसी पर कभी कार्रवाई नहीं होती।
दाभोलकर, पंसारे, गौरी लंकेश की हत्या में शामिल संगठनात्मक संस्थागत सोच की कभी छानबीन नहीं हुई। किसी को सजा नहीं हुई, बल्कि सत्तारूढ़ों की चुप्पी, उदासीनता और संरक्षण से अतिवादी संगठनों को पल्लवित होने की उर्वर भूमि मिली। इसी का परिणाम है कि फ्रिंज को मुख्यधारा होने में वक्त नहीं लगा। फ्रिंज बाकायदा मंत्री के ओहदे तक पा गए। मंत्री होने के बाद भी अश्लील टिप्पणियां छूटीं नहीं। जब कश्मीर का विशेष संविधान प्रदत्त दर्जा छूटा तो कश्मीरी महिलाओं की वैवाहिक उपलब्धता का शर्मनाक बखान सामने आया।
बहुत संभव है कि उत्तराखंड की घटना किसी स्वयंभू अतिवादी संगठन के द्वारा ही हुई हो। मगर जब गुजरात के ऊना में दलितों पर कोड़े बरसाए गए और उस पर आज तक कार्रवाई नहीं हुई। रोहित वेमुला की दुखद मृत्यु के बाद केंद्र में सत्तारूढ़ दल का आनुषंगिक संगठन उसकी जाति पर सवाल करता है। उसके दलित होने पर प्रश्न खड़े करता है, उसकी बुद्धिमत्ता पर अपमानजनक भाषा का उपयोग होता है। ख्याल रहे कि यह तो फ्रिंज नहीं उनके आधिकारिक संगठन हैं। दलित समुदाय की भंवरी देवी का सामूहिक बलात्कार करने वाले दबंग जाति के लोगों को मंच पर बैठाकर स्वागत किया जाता है। यह स्वागत किसी भी फ्रिंज ने नहीं किया। खुद मुख्य संगठन ने किया।
तब पूछना पड़ेगा कि दलित के साथ हुए अत्याचार को सही करार करने का संस्थागत उपक्रम कौन चला रहा है? किसके प्रश्रय से ऐसी घटनाएं घटती है कि बाद में अपनी छवि चमकाने के लिए उन्हें फ्रिंज कहकर पल्ला झाड़ना पड़े। “सबका साथ” जब स्याह दिखने लगे तब केवल सतही चेतना लौटती है, जो मात्र ढकोसला है। यह उस फ्रिंज को भी पता है। असल में यह दुत्कार नही, शाबाशी है।
ऐसा ही कुछ 2 अप्रैल 2017 को भिंड के जातिगत दंगों में हुआ। दंगे के दौरान जो नारे लगे, वे सत्तारूढ़ दल के ही बनाए नारे हैं, जिससे भगवान राम तो कोसों दूर हैं।
यह कतई नहीं कहा जा रहा है कि सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल ने इन घटनाओं को संचालित किया, मगर ऐसा वातावरण निर्माण किया कि खुलकर कोई समूह ऐसा करके गौरवान्वित महसूस करे। परोक्ष रूप से सत्तारूढ़ की ही कारस्तानी लगने लगती है।
स्मृति को थोड़ा पलटकर पीछे ले जाएं तो और भी कुछ परतें खुलती हैं। शतक पूरा कर चुके संगठन की विचार व्यवस्था में इन फ्रिंज की साफ परछाई दिखाई पड़ती है। गुरु गोलवलकर अपनी किताब (मूल संस्करण) ‘वी ओर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ के पृष्ठ 115 में कहते हैं कि हिन्दू राष्ट्र की बुनियाद में वर्णाश्रम व्यवस्था होगी। वह मनु को महान विधिवेत्ता कहते हैं। यह भी कहते हैं कि जाति, छुआछूत भेद के बावजूद महाभारत काल, पुलकेशी और हर्षवर्धन जैसे शासकों का काल कितना स्वर्णिम था।
जो संगठन इस पुरानी वर्ण व्यवस्था को नष्ट करना चाहते हैं, उन पर गोलवलकर सवाल खड़े करते है। यानी उनको लगता है कि महाभारत काल महान था। भले राजमहिषी को राजसभा में राजा की मौजूदगी में निर्वस्त्र करने की कोशिश हुई। एक तरह से रेप को संस्थागत प्रश्रय मिला। एकलव्य का अंगूठा कटा, किसी कामगारी कौम के बेटे को राजपुत्रों के साथ पढ़ने की इजाजत नहीं मिली। महाभारत कहानी भले है, पर रचयिता के समाज का दर्पण है। उसमें कई मिलेजुले मूल्य हैं। पर किताब में वर्णाश्रम का विशेष जिक्र है।
क्या जाति आधारित भेद किसी मुल्क को महान बना सकता है? या महान होने में सबसे बड़ा बाधक है। नहीं, तो क्या कारण है कि खगोल, गणित, आयुर्वेद में कई पायदान ऊपर जाने के बाद भी हम वैज्ञानिक तरक्की कर नहीं सके। भले आज कुछ मंत्री पुष्पक विमान पर रोमांचित हो जाएं, मगर सच्चाई सब जानते हैं। जातिगत भेद के न होने से साइकिल मैकेनिक राईट बंधु विमान बना सके। हम खगोल शास्त्र में इतना आगे बढ़कर भी पीछे रहे। ज्ञान को सीमित करके प्रभुत्व जमाकर खुद ही सिमटकर रह गए।
हजारों बरस तक बहुजन समाज कैसे-कैसे अत्याचार का सामना करता रहा। आज भी अधिकांश बहुजन समुदाय गांव के दक्षिणी छोर पर रहने को विवश हैं। आज भी बारात नहीं निकाल सकते, घोड़ी नहीं चढ़ सकते। अंतर्जातीय विवाह का प्रतिकार 'ऑनर किलिंग' से होता है। ऐसे में शतक लगाए संगठन ने कब खुलकर इस वर्णाधारित भेद का विरोध किया। इसी संगठन ने आरक्षण पर पुनर्विचार की भी पहल की थी।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि स्वराज आंदोलन के शीर्ष नेताओं द्वारा अंग्रेजी राज के साथ-साथ जमींदारी और वर्णाधारित भेद को चुनौती देना शतक लगाए संगठन को बिल्कुल नहीं भाया। आम धारणा यह है कि बंटवारे में पाकिस्तान को उसके हिस्से की दोनों पक्षों द्वारा रजामंद राशि दिए जाने के पक्षधर होने से प्रतिक्रिया स्वरूप उन पर गोलियां चलाई गई। गांधी जी की हत्या को अंजाम भले ही 1948 में दिया पर यह पूरी सच्चाई नहीं है। उन पर हत्या के छह प्रयास हुए। 1934 के पहले प्रयास के वक्त पाकिस्तान की कोई कल्पना भी नहीं थी। तो 1934 में उनको मारने की कोशिश क्यों हुई?
दरअसल, जाति आधारित पृथक मतदाता मंडल की मांग बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा उठाई गई। गांधी मानते थे कि पृथक मतदाता मंडल से जातिगत भेद सदा के लिए स्थाई हो जाएगा। हिन्दू कभी छुआछूत के कोढ़ से रिहा नहीं हो पाएंगे। पृथक सांप्रदायिक मंडल के विभाजनकारी दुष्परिणाम सामने थे जो अंग्रेजों की फूट डालो नीति की परिणति थी। तब उन्होंने यरवडा जेल में हजारों बरस के छुआछूत के लिए प्रायश्चित स्वरूप अनशन किया। वह चाहते थे कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र तय किया जाए, ताकि प्रभुत्व संपन्न को भी उस क्षेत्र में आरक्षित दलित अथवा आदिवासी प्रतिनिधि को ही चुनना पड़े। यह पृथक मतदाता मंडल से अलग था। पृथक मतदाता मंडल में प्रभुत्व संपन्न व्यक्ति अपने समुदाय का प्रतिनिधि चुनता और दलित अपना प्रतिनिधि चुनते। पर आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में हर तबके को अपना मत उसी समुदाय के व्यक्ति को देना होता है। यानी सदियों से परित्यक्त समुदाय के व्यक्ति को चुनना पड़ता जिसके प्रति प्रभुत्व संपन्न वर्ग ने हमेशा हिकारत रखी।
यही पद्धति आज के राजनीतिक आरक्षण की बुनियाद है। इस पर भी कई दक्षिणपंथियों को आक्षेप था। उपवास के दौरान देश में सामाजिक परिवर्तन का आगाज हुआ। मंदिरों के द्वार बहुजन के लिए खुले। अंततः मदन मोहन मालवीय और डॉ. आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ। गांधी की पहल पर जितनी सीटें मांगी गईं थीं, उससे बढ़कर आरक्षण में दी गईं। यह अन्य मुद्दा है कि इस तरह के आरक्षण में भी कई खामियां हैं। बहरहाल, ऐसी स्थिति बनी कि पहली बार प्रभुत्व संपन्न समाज का निर्वाचित प्रतिनिधि कोई दलित हो सकता है। इसके बाद गांधी देश भर में सामाजिक समता के लिए यात्रा पर निकले।
इस पृष्ठभूमि को समझना बेहद जरूरी है। द्वि राष्ट्रवाद की मुखर पैरवी इसके बाद शुरू हुई। गांधी का जातिगत प्रभुसत्ता, जमींदारी के खिलाफ खुलकर आह्वान कुछ ताकतों को बिल्कुल नागवार गुजरा। तब से उनकी हत्या का षडयंत्र शुरू हुआ। पहला हमला पूना में हुआ। वह जातिगत भेद के खिलाफ सभा को संबोधित करके बाहर निकले और जिस गाड़ी में बैठने वाले थे, उस पर बम फेंका गया। वह बच गए, क्योंकि उन्होंने वह गाड़ी नहीं ली। घटना को अंजाम फ्रिंज ने दिया। पर फ्रिंज को वैचारिक प्रोत्साहन किस विचारवान संस्था से मिल रहा था। यह कहना जरूरी नहीं।
असल में इस शतक पूर्ण किए संगठन का लक्ष्य मजहब आधारित द्वि राष्ट्र नहीं था। स्पष्ट तौर से वर्णाश्रम आधारित द्विज राष्ट्र बनाना है। द्विज माने जनेऊ धारण करके पुनः जन्म लेना जो कि केवल प्रभुत्व संपन्न का जन्म प्रदत अधिकार है। बहुजन समाज को चाहिए कि वे समझें कि इस द्विज राष्ट्र की क्या मान्यताएं होंगी। बहुजन को उनकी तहजीब के साथ स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्हें आज्ञाकारी, सेवक धर्म के लिए तैयार किया जाएगा। उनकी अपनी भोजन की पसंद या चयन के साथ स्वीकारा नहीं जाएगा, बल्कि उनको प्रभुत्व संपन्न जीवन शैली में ढलने को विवश किया जाएगा। उसे सभ्य होने का मानदंड माना जाएगा। उनके हाथ से कोई उद्घाटन नहीं होगा। वे जरूर मूर्तिवत रखे जाएंगे।
गांधी ने प्रभुत्व संपन्न को उन सब काम को करने के लिए तैयार किया जिसे अछूत कहा करते थे। शतक पूरा किए संगठन के द्विज राष्ट्रवाद में सबको प्रभुत्व संपन्न मूल्य व्यवस्था अपनाने की बाध्यता होगी।
इस संदर्भ में उत्तराखंड की घटना को देखा जाना चाहिए। वह द्विज राष्ट्र का आईना है, जो वक्त से पहले साफ दिखाई दे गया। उसको अंजाम किसी ने दिया हो। वह इस वैचारिक पार्श्वभूमि में पनपा और उसकी जिम्मेदारी सत्तारूढ़ दल और शतक पूर्ण किए संगठन की है। वह संगठन जो अपना हिसाब देना अपनी शान के खिलाफ समझता है।
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