अफगानिस्तान को लेकर पूरी दुनिया फिक्रमंद, लेकिन भारत में इसे सत्ता पक्ष के राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिशें जारी

न्यूज चैनलों ने तो पहले दिन से ही इसे देश और अपने नुकसान की चर्चा की जगह आगे की राजनीति में लाभ के मसले में बदल दिया। उन्हें तो सिर्फ कोरोना की तीसरी लहर के डर की जगह तालिबान का डर दिखाना और उसके बहाने अल्पसंख्यकों और पाकिस्तान के खिलाफ तोप तानना था।

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अरविंद मोहन

अमेरिका, नए राष्ट्रपति के आने के साथ ही अफगानिस्तान से निकलने की तैयारी करने लगा था और अपने लोगों के वहां से निकलने की बातचीत में उसने तालिबान को भी बाजाप्ता बैठाया। इतिहास बताता है कि अफगानिस्तान के अंदर किसी भी तरह के बदलाव का हम पर और हमारे बाद पाकिस्तान पर असर पड़ता है। अब साफ लग रहा है कि पाकिस्तान अपनी बहुत खस्ताहाल स्थिति और अमेरिका वगैरह से सहायता काफी कम होने के बावजूद तालिबान को आधार और समर्थन दे रहा था और अफगानिस्तान में अभी जो बदलाव दिख रहा है, उससे लाभ की स्थिति में आ गया है। उसके दसेक हजार पश्तून लड़ाके जिनमें फौजी भी हों तो हैरानी नहीं, तालिबान के साथ अफगानिस्तान गए हैं और हर कोई उनके द्वारा बोली जाने वाली पश्तो भाषा के आधार पर यह समझ सकता है। आईएसआई के प्रमुख तालिबानी नेताओं के साथ घूमते भी देखे गए हैं।

पर हम सब कुछ जानकर भी क्यों हाथ-पर-हाथ धरे रहे, यह समझना मुश्किल है जबकि हमारी गुडविल आम अफगानियों में ही नहीं बल्कि तालिबान के बीच भी बेहतर है और हमारा निवेश वहां तीसेक हजार करोड़ रुपये का है। हमारे पैसे, तकनीक और लोगों की मदद से चलने वाली परियोजनाएं अफगानियों के कितने लाभ की हैं, यह समझ उनको भी है।

पर हमने कुछ नहीं किया। और पंद्रह अगस्त को जब प्रधानमंत्री भारी और अपूर्व सुरक्षा के बीच अपनी रंगीन पगड़ी के साथ चमकते हुए अपनी सरकार की आन, बान और शान का बखा नतथा सौ लाख करोड़ रुपये की योजनाओं की- लाल किले से ही तीसरी बार घोषणा कर रहे थे और हमारे टीवी चैनल उनके पहनावे, सुरक्षा इंतजाम और ओलंपिक की अपूर्व उपलब्धियों की (क्योंकि उसके खिलाड़ी पहली बार सामने बैठाए गए थे) चर्चा कर रहे थे, तब तालिबान काबुल पर कब्जा कर चुका था और राष्ट्रपति गनी भाग चुके थे। अब दुनिया के लिए हमारी स्वतंत्रता का उत्सव उतना बड़ा मसला न था जितना अफगानिस्तान पर तालिबानी कब्जा। और तालिबानों के लिए भी समझौता वार्ता में दिए वचन को तोड़ना कोई बड़ा मसला न था, सो खबरों की बाढ़ उसी समय से शुरू हो गई जब मोदी जी का भाषण चल रहा था।

पर हर मामले को अपने राजनीतिक लाभ में बदलने में उस्ताद मोदी जी और उनके भोंपू बने चैनलों ने उसी दिन इस खबर को देश और अपने नुकसान की चर्चा की जगह आगे की राजनीति में लाभ के मसले में बदल दिया। मीडिया को तो सिर्फ कोरोना के तीसरी लहर का डर दिखाने की जगह तालिबान का डर दिखाना और उसके बहाने मुसलमानों और पाकिस्तान के खिलाफ तोप तानना था, सत्ता के सूत्रधार भी दन से इसी काम में जुट गए।


सबसे पहला ‘निशाना’ सेकुलर बिरादरी को बनाया गया और उनसे पूछा जाने लगा कि आप चुप क्यों हैं, मानो तालिबान को रोकना या अफगानिस्तान के घटनाक्रम में दखल देना उनका ही जिम्मा हो। इस बीच बहुत खामोशी से काबुल स्थित दूतावास में ताला जड़ा गया और राजदूत सहित सारे लोग खिसक कर वापस आ गए। फिर विभिन्न परियोजनाओं में फंसे भारतीयों और हिंदू या सिख अफगान नागरिकों को लाने का पराक्रम शुरू हुआ और उसे टीवी पर दिखाना भी। पर यह खबर कम चली कि तालिबान भी हिंदुस्तानियों और हिंदू या सिख अफगान नागरिकों को रोकते रहे। इसी में कई मंत्री और भाजपा नेता सीएए की सार्थकता भी बताने में जुट गए।

फिर हिंदुस्तानी सेकुलर बिरादरी की जगह वे मुसलमान निशाने पर आए जिन्होंने किसी भी तरह दाएं-बाएं से तालिबानी जीत को ‘अमेरिकी कब्जे’ से आजादी बताया। इसमें कितना कमिटमेंट था और कितना मोदी सरकार की मुसलमान विरोधी नीतियों से पैदा गुस्से का इजहार, इसका हिसाब लिए बगैर चैनलों को गरमागरम चर्चा का मुद्दा मिल गया। उन्हें अब पाकिस्ता नकी जगह अफगानिस्तान भेजा जाने लगा। उनके घर पर प्रदर्शन किया गया और सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया। इनमें ओवैसी और पीस पार्टी ही नहीं बल्कि विभिन्न नामधारी इस्लामी संगठनों के प्रवक्ताओं को अपनी राजनीति चमकाने का मौका भी मिल गया। और हैरानी नहीं कि ओवैसी जैसे नेताओं ने एक योजना के तहत ही बयानबाजी शुरू की हो क्योंकि ऐसा पहली बार नहीं है कि भाजपा/संघ परिवार और ओवैसी-जैसे लोग आमने-सामने डटे हों।

इस बहस में पाकिस्तान से भी भाड़े के लोग मिल जाते हैं और इस बार भी खूब आए। शुरू में कुछेक महिला पत्रकार और कार्यकर्ता तालिबान द्वारा महिलाओं और बच्चों पर किए जाने वाले जुल्मों के मसले को बहुत अच्छी तरह उठाते हुए पाकिस्तान की भी खराब स्थिति की चर्चा करती रहीं। पर यह मसाला बहस को हिंदू बनाम मुसलमान या भारत बनाम पाकिस्तान बनाता नहीं दिखा तो उनको बुलाना बंद कर दिया गया।

जब तालिबानी आतंक का फुटेज बासी पड़ा या वहां की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की तस्वीरें कम हुईं तो मुनव्वर राणा और शफीकुर्रहमान बर्क-जैसे लोगों के खिलाफ प्रदर्शन और मुकदमे की चर्चा हुई। राणा ने तो मोदी को अपना नेता घोषित किया, तब भी माफी नहीं। और जब बात इतने पर नहीं रुकी या बनती नहीं दिखी तो मुहर्रम पर कई जगह तनाव और हंगामे की खबर को इससे जोड़ा गया। भोपाल में ऐसे एक जुलूस में भीड़ से कुछ लोगों द्वारा पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने की चर्चा सोशल मीडिया पर खूब चली। पहले जेएनयू और शाहीन बाग के धरने वगैरह में यह प्रयोग किया जा चुका था। और इस पर उदार माने जाने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जिस तरह सक्रिय लगे, उससे साफ होने में दिक्कत नहीं हुई कि यह सब एक योजना का हिस्सा है, वरना प्रदेश का मुखिया कानून व्यवस्था के सवाल पर मुस्तैद रहता। और इसी मामले में क्यों, किसी भी चर्चा में भारत सरकार की चूक और चुप्पी या उसके दूतावास बंद करने जैसे फैसलों पर कभी कोई चर्चा सुनाई नहीं पड़ी।


लेकिन इन सबमें हमारे टीवी चैनलों और अखबारों की भी कल्पनाशीलता और समझ के जो दर्शन हुए हैं, उसे शर्मनाक कहना ही ज्यादा बढ़िया होगा। स्क्रिप्ट लिखने वालों ने तालिबानी जुल्म, महिलाओं के प्रति सहानुभूति और बच्चों के लिए प्रेम में किस तरह कलम तोड़ी, यह देखना चाहिए। उनके यहां प्लेन से भागने की दुर्गति खूब दिखी, पर अपने यहां करोड़ों प्रवासियों के रेल, बस और पैदल भी न भाग सकने का दुख दिखाना किसी को जरूरी नहीं लगा था। ऐसी स्क्रिप्ट इस लेखक ने शायद पहले नहीं देखी थी। तब तो एकदम नहीं जब अपने यहां किसी अखलाक को फ्रिज में मांस रखने के आधार पर मार दिया गया या किसी दलित लड़की का शव बीच रात में पुलिस ने उसके घरवालों को दिखाए बगैर जला दिया। या अपने धर्म के ‘तालिबानी’ जब जुर्म करते हैं या इस पर टीवी पर भी अभी हफ्ते-दस दिन पहले तक बहस करते थे (एक समुदाय के लोगों को काटने का खुला आह्वान जंतर-मंतर से करने पर) या इस तरह का नारा लगवाने वालों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रमोशन दिया गया था। सांसदों, विधायकों, पार्टी नेताओं के तालिबानी आचरण के किस्से तो बहुत हैं। पर हैरानी इस बात में है कि अपनी करतूतों को भुलाने और तालिबान के नाम पर उसी व्यवहार को आगे बढ़ाने की मुहिम भी चला ली गई और इतने बड़े मामले में जिसकी कीमत आगे क्या कुछ चुकानी होगी, यह अंदाजा भी नहीं है, अपने जिम्मेवार लोगों की भूमिका और फैसलों पर एक भी ढंग की चर्चा नहीं हुई।

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