पर्यावरण को रौंद रहे हैं दुनिया के अमीर, बोझ गरीब जनता को उठाना पड़ रहा है
पूंजीवादी व्यवस्था की बढ़ती ताकत ने पूंजीपतियों को दुनिया पर हुकूमत की आजादी दे दी है, इसमें अमीर पहले से अधिक अमीर हो रहे हैं और गरीबों को बस जिंदा रखा जा रहा है। पूंजीपतियों ने तकनीक, प्रोद्योगिकी और विज्ञान को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है।

एक नए अध्ययन के अनुसार वैश्विक स्तर पर संसाधनों, विशेष तौर पर ऊर्जा और खाद्य पदार्थों, के उपभोग के संदर्भ में सबसे बड़े 10 प्रतिशत उपभोक्ता हरेक वर्ष पर्यावरण का जो विनाश करते हैं उसकी वार्षिक कीमत 5.7 खरब डॉलर है। यह राशि चीन और अमेरिका को छोड़कर किसी भी अन्य देश की अर्थव्यवस्था से अधिक है और पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर हरेक वर्ष जो धनराशि की जरूरत है– उससे भी अधिक है। इस अध्ययन को यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड और यूनिवर्सिटी ऑफ लेइडेन के वैज्ञानिकों ने संयुक्त तौर पर किया है और इसे कम्यूनिकेशन्स सस्टैनबिलिटी नामक जर्नल में प्रकाशित किया है।
संसाधनों का सबसे अधिक उपभोग करने वाली 10 प्रतिशत आबादी ही दुनिया की सबसे अमीर आबादी है– यही आबादी समाज में हरेक स्तर पर असमानता का विस्तार करने के साथ ही पर्यावरण विनाश के माध्यम से पूरी दुनिया को तबाह कर रही है। इस आबादी में सबसे अधिक लोग अमेरिका और समृद्ध यूरोपीय देशों के हैं पर अब तेजी से चीन, भारत, ब्राजील जैसी बढ़ती अर्थव्यवस्था की आबादी भी इसमें शामिल हो रही है। खाद्य पदार्थों के संदर्भ में सबसे अधिक विनाशकारी “रेड मीट” है जिसके लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को काटा जाता है। ऊर्जा के संदर्भ में पूंजीपतियों की लगातार बढ़ती ऊर्जा की खपत से जीवाश्म इंधनों का उपयोग बढ़ रहा है जिससे तापमान वृद्धि में तेजी आ रही है।
केवल 10 प्रतिशत आबादी के कारण हरेक वर्ष 5.7 खरब डॉलर से अधिक का पर्यावरण विनाश हो रहा है, प्रति व्यक्ति के संदर्भ में इसका मूल्य 2300 से 7500 डॉलर प्रतिवर्ष है। इसका सीधा सा मतलब है कि केवल पूंजीपतियों द्वारा पर्यावरण विनाश किया जा रहा है उसके कारण गरीब आदमी पर हरेक वर्ष औसतन 2300 से 7500 डॉलर तक का बोझ बढ़ जाता है। यह राशि देशों की अर्थव्यवस्था पर निर्भर करती है। अमेरिका के पूंजीपतियों की उपभोक्ता आदतों के कारण जो पर्यावरण विनाश होता है वह उनके मुनाफे का 6 से 20 प्रतिशत तक और कुल संपत्ति का 0.8 से 3 प्रतिशत तक होता है और इससे वहां के शेष नागरिकों पर हरेक वर्ष 19000 से 63000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
दूसरी तरफ भारत में जो सबसे समृद्ध उपभोक्ता हैं, वे हरेक वर्ष पर्यावरण का जो विनाश करते हैं वह उनके कुल वार्षिक मुनाफे का 0.8 से 2.8 प्रतिशत और कुल संपत्ति का 0.2 से 0.5 प्रतिशत तक है और यहां की जनता पर इस उपभोग के कारण हरेक वर्ष 410 से 1400 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। एक तथ्य यह भी है कि अब बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देश परंपरागत पूंजीवादी देशों को उपभोग के संदर्भ में पीछे छोड़ते जा रहे हैं, इसका उदाहरण चीन का जर्मनी से आगे निकलना है।
पूंजीपतियों द्वारा संसाधनों की खपत के कारण जो पर्यावरण विनाश हो रहा है उसका 47 से 56 प्रतिशत असर जैव-विविधता के विनाश पर पड़ रहा है जबकि तापमान वृद्धि पर यह असर 36 से 45 प्रतिशत तक है। इस अध्ययन में बताया गया है कि पूंजीपतियों के अंधाधुंध उपभोग के कारण पर्यावरण का विनाश इस राशि से बहुत अधिक है क्योंकि इस अध्ययन में केवल उनके खाद्य और ऊर्जा की खपत का ही आकलन किया गया है। पूंजीपति केवल अपनी जीवन शैली से ही नहीं बल्कि इनवेस्टमेंट जैसी आर्थिक नीतियों से भी पर्यावरण का विनाश करते हैं, यह आकलन इस अध्ययन में शामिल नहीं है।
पूरी दुनिया इतिहास के किसी भी मोड़ पर आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संदर्भों में एकाकार नहीं रही है, पर अब यह स्थिति सामने आ गई है। चरम पूंजीवाद का विस्तार वैश्विक स्तर पर हो गया है और यही पूंजीवाद आज पूरी दुनिया को चला रहा है– इसका प्रभाव भी स्पष्ट है। पूरी दुनिया में कट्टर दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता में विराजमान हो रही हैं या फिर जल्दी ही होने वाली हैं, सामाजिक ध्रुवीकरण हरेक देश में चरम पर है, गरीबों और अमीरों के बीच खाई बढ़ती जा रही है और पर्यावरण विनाश हरेक देश में किया जा रहा है।
दुनिया के हरेक देश में बिल्कुल एक जैसी स्थिति पहले कभी नहीं रही है। लोकलुभानवादी और निरंकुश तानाशाही का विस्तार हरेक जगह है और हरेक देश की जनता ऐसी शक्तियों का समर्थन कर रही है। वैश्विक राजनीति में परंपरागत तौर पर हाशिये पर रहने वाले ये देश अब राजनैतिक मुख्यधारा में हैं। इन सभी समस्याओं की जड़ में वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती हरेक प्रकार की असमानता है– यह अब इतना विकराल स्वरूप ले चुकी है कि अब इसे वैश्विक आपातस्थिति कहा जाने लगा है।
जी20 समूह के एक स्वतंत्र पैनल ने आर्थिक असमानता की वैश्विक स्थिति पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस पैनल के अध्यक्ष नोबेल प्राइज से सम्मानित अमेरिका के अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज थे और भारत की अर्थशास्त्री जयति घोष भी इसकी सदस्य थीं। इस रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक असमानता पूरे विश्व में लगातार गहरी हो रही है। वैश्विक स्तर पर सबसे धनी 1 प्रतिशत आबादी के पास वर्ष 2000 से 2024 के बीच वैश्विक संपदा में वृद्धि का 41 प्रतिशत से भी अधिक है, जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी के हिस्से महज 1 प्रतिशत संसाधन हैं। इतनी गहरी असमानता में किसी भी समाज का विकास असंभव है। संख्या की दृष्टि में बहुतायत में गरीब हैं पर राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था में उनकी कोई भागीदारी नहीं है। दूसरी तरफ दुनिया के सबसे धनी 1 प्रतिशत आबादी देश की अंदरूनी और बहुराष्ट्रीय दशा और दिशा का निर्णय लेती है। दुनिया की बड़ी आबादी का राजनैतिक और आर्थिक संदर्भ में हाशिये पर धकेले जाने के कारण प्रजातंत्र खतरे में है, यह पूरी तरीके से समाप्त होने के कगार पर है।
पूंजीवादी व्यवस्था की बढ़ती ताकत ने पूंजीपतियों को दुनिया पर हुकूमत की आजादी दे दी है, इसमें अमीर पहले से अधिक अमीर हो रहे हैं और गरीबों को बस जिंदा रखा जा रहा है। पूंजीपतियों ने तकनीक, प्रोद्योगिकी और विज्ञान को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है। पैसे और ताकत का इस्तेमाल कर कट्टरपंथी ताकतों के लिए समर्थन बढ़ाया जा रहा है। मीडिया और सभी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर पूंजीवादियों का वर्चस्व है और खबरें जनता तक वही पहुंचतीं है जिनसे पूंजीवाद का भला होता है।
हमारे देश में मीडिया, सत्ता और पूंजीवाद का तालमेल बिल्कुल स्पष्ट है। जनता पूरी तरह उपेक्षित है, उसे बस जिंदा रखा जा रहा है। हमारे देश में आर्थिक असमानता जितनी है उतनी दुनिया में कहीं भी नहीं है। वैश्विक स्तर पर सबसे अमीर 1 प्रतिशत आबादी के पास 41 प्रतिशत संपदा है पर हमारे देश में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का जिक्र करते हैं। गरीब इसे सुनकर जोर से तालियां बजाते हैं पर उन्हें शायद मालूम नहीं है कि अर्थव्यवस्था के बढ़ते आकार के साथ ही अरबपतियों का मुनाफा और बढ़ता है। गरीब पहले से अधिक गरीब होते जाते हैं। गरीबी के साथ ही एक बड़ी आबादी समाज और अर्थव्यवस्था के ढांचे से बाहर पहुंच जाती है। गरीब आबादी के हिस्से का संसाधन अमीरों की जेब में पहुंचता है और गरीबों की कीमत बस 5 किलो अनाज रह जाती है।
गरीबी का कोई स्वाभाविक स्वरूप नहीं रहता है, यह सरकारी योजनाओं की देन है। सरकारी योजनाएं पूंजीवादी व्यवस्था की देन है। इस असमानता के कारण राजनीति, समाज और पर्यावरण सभी नष्ट हो रहे हैं, पर पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ता जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर दुनिया की 90 प्रतिशत आबादी भारी आर्थिक असमानता से जूझ रही है। जी7 समूह के देशों में सबसे अधिक असमान देश अमेरिका है इसके बाद यूनाइटेड किंगडम का स्थान है। जी20 समूह के देशों के साथ ही वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक असमान देश भारत है। वर्ष 2000 से 2024 के बीच दुनिया की सबसे धनी 1 प्रतिशत आबादी की संपत्ति में औसतन 13 लाख डॉलर की वृद्धि हुई है, जबकि सबसे गरीब 50 प्रतिशत के हिस्से में महज 585 डॉलर ही बढ़े हैं।
वैश्विक स्तर पर हरेक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है। समानता और सामाजिक समरसता तो बस भाषणों और विज्ञापनों तक सिमट कर रह गया है। आर्थिक नीतियां, जलवायु परिवर्तन और टेक्नोलॉजी का अभूतपूर्व विकास- सब असमानता बढ़ाते जा रहे हैं और अमीर इसे विकास बता रहे हैं। पूंजीवादी व्यवस्था केवल अपनी संपदा नहीं बढ़ा रही है, बल्कि पूरी दुनिया अपने फायदे के अनुसार चला रही है, गरीबों को पहले से अधिक गरीब बना रही है और हरेक प्राकृतिक संसाधन पर अधिकार कर रही है। संसाधनों पर अधिकार के लिए गरीबों को “विकास” का सब्जबाग दिखाया जाता है, इसके बाद गरीबों के हरेक अधिकार छीनकर उन्हें गुलाम जैसी जिंदगी दी जाती है।
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