खरी-खरी: दीवार पे लिखी इबारत साफ है, विपक्ष के लिए खत्म नहीं हुआ है सबकुछ

गुरुवार को जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आने शुरु हुए तो हरियाणा में बीजेपी हांफती नजर आई और महाराष्ट्र में भौंचक। बुनियादी तौर पर देखें तो देश की आर्थिक हालत लोगों ने दिलो-दिमाग पर हावी है और महाराष्ट्र-हरियाणा के नतीजे इसकी बानगी भर हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

पुराने दोस्त शाहिद समी ने अलीगढ़ से फोन कर पूछा, ‘हरियाणा-महाराष्ट्र से कोई अच्छी खबर…’मैंने तपाक से जवाब दिया था कोई उम्मीद न बांधो। आखिर दिल्ली में बैठकर लोगों के मन को कोई कैसे समझ सकता था, खासतौर से तब जबकि सिर्फ 4 महीने पहले ही नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनावों में दोबारा जबरदस्त जीत हासिल की थी।

लेकिन भारत का वोटर, बहुत काइंया (यह ऐसी संज्ञा है जो उस शख्स के लिए इस्तेमाल होती है, जो अपने मन की बात आखिर तक सामने नहीं आने देता) है। वोटर मन की बात सामने नहीं देता और चुनावी पंडित सिर्फ कयास ही लगाते रह जाते हैं। इसी आधार पर तकरीबन हर अखबार और न्यूज चैनल ने हरियाणा में बीजेपी के लिए आसान जीत का अनुमान लगाया था। ऐसा ही महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के लिए कहा गया।

लेकिन गुरुवार को जब नतीजों के रुझान आने शुरु हुए तो हरियाणा में हांफती नजर आई बीजेपी और महाराष्ट्र में भौंचक। हरियाणा के रुझान से उदारवादी खेमे के चेहरे पर मुस्कान दिखने लगी। महाराष्ट्र से उम्मीदों भरे संदेश आने लगे। उम्मीद यह कि शरद पवार की तरह कोई भी विपक्षी नेता लड़ने को तैयार हो तो 2019 लोकसभा चुनाव की करारी हार के बावजूद सबकुछ खत्म नहीं हो गया है।

इस सबके बीच एक और खास बात यह कि आखिर नरेंद्र मोदी से देश का वोटर इतनी जल्द नाराज कैसे हो गया। बुनियादी तौर पर देखें तो देश की आर्थिक हालत लोगों ने दिलो-दिमाग पर हावी है और महाराष्ट्र-हरियाणा के नतीजे इसकी बानगी भर हैं। इस समय अर्थव्यवस्था की जो हालत है, वह बीते कम से कम चार दशक में तो नहीं रही है। सरकार के आंकड़े ही बताते हैं कि बेरोजगारी 45 साल के निचले स्तर पर है। नई नौकरियां तो दूर, मौजूदा नौकरियां भी छूट रही हैं। मुंबई की बिस्कुट फैक्टरी पार्ले ने ही करीब 10 हजार लोगों को काम से हटा दिया। मारुती और टाटा जैसी ऑटो कंपनियों ने उत्पादन बंद कर दिया क्योंकि कार-ट्रक बिक नहीं रहे। नतीजतन ऑटो सेक्टर में बेरोजगारी बढ़ने लगी। रियल एस्टेट का भी यही हाल है, जो बीते पांच साल के सबसे बुरे दौर में है।

कुल मिलाकर किसी भी उद्योग या कारोबार के लिए बीते 4-5 महीनों से कोई अच्छी खबर नहीं आई है। अच्छी खबर तो दूर की बात, यहां तक की गोदी मीडिया तक को जीडीपी के गिरते स्तर और आर्थिक मंदी की खबरें दिखानी पड़ीं। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूं, लेकिन जो हालात आज दिख रहे हैं वह बीते कुछेक दशकों में नहीं दिखे।

सरकार जब रिजर्व बैंक से 74,000 करोड़ रुपए निकाल ले तो समझ लीजिए कि देश का खजाना खाली हो चुका है। मंदिया पहले भी आईं, लेकिन भारतीय जनमानस का विश्वास बैंकों से नहीं डिगा, लेकिन अब वह भरोसी भी टूट रहा है। बीते दिनों में पंजाब एंड नेशनल बैंक और अब पीएमसी बैंक के घोटालों से लोगों का विश्वास बैंकिंग सिस्टम से भी उठता जा रहा है।

हर तरफ निराशा का माहौल, बेरोजगारी और मंदी मुंह बाय आपके सामने खड़ी हो तो आखिर वोटर कैसे सत्ताधारी पार्टी पर भरोसा जताएगा। इस आर्थिक मुसीबत से हर कोई प्रभावित है, और जिम्मेदार तो बीजेपी ही है तो लोकसभा में प्रचंड बहुमत के साथ ही कई राज्यों में सत्तासीन है। आम वोटर सिर्फ बीजेपी से ही नाराज नहीं है, नरेंद्र मोदी पर भी उसका भरोसा डिग रहा है। वोटर अब नरेंद्र मोदी की लच्छेदार बातों में नहीं आने वाला। हद तो यह है कि नरेंद्र मोदी अब विधानसभा चुनाव तक में पाकिस्तान कार्ड खेल रहे हैं। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के फैसले को पाकिस्तान से जोड़ा। मोदी को लगा था कि एक बार फिर पाकिस्तान का कार्ड चलेगा, लेकिन वोटर झांसे में नहीं आया। उसके लिए मौजूदा आर्थिक मंदी सबसे बड़ा मुद्दा है, पाकिस्तान नहीं।

वोटरों ने हरियाणा में बीजेपी को करीब-करीब हरा ही दिया। महाराष्ट्र में भी बीजेपी-शिवसेना गठबंधन पर पूरी मुहर नहीं लगाई। और गुजरात समेत दूसरे राज्यों के उपचुनावों में बीजेपी को आईना दिखा दिया।

दीवार पे लिखी इबारत इस चुनाव से साफ नजर आने लगी है, और वह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में विपक्ष के लिए सबकुछ खत्म नहीं हुआ है। मोदी लहर उतार पर है, वक्त है विपक्ष को एकजुट होकर मैदान में उतरने का। हरियाणा में जिस तरह भूपिंदर हुड्डा और महाराष्ट्र में वरिष्ठ नेता शरद पवार ने लड़ाई लड़ी, उससे साफ संकेत हैं कि अगर विकल्प सामने हो तो लोग भी साथ देने को तैयार हैं। क्षेत्रीय चेहरों के साथ राष्ट्रीय गठबंधन का विकल्प अगर सामने रखा जाए तो 2024 में लड़ाई मुश्किल नहीं होगी।

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