किशोरों और युवाओं में गांधी के प्रति जबर्दस्त आकर्षण, लेकिन इस जुड़ाव को टिकाऊ बनाना सबसे बड़ी चुनौती

गांधी जी ने जीवन के हर स्तर पर हिंसा से बचने और अहिंसक सोच अपनाने का संदेश दिया। आजादी की लड़ाई या बड़े संघर्षों में अहिंसा पर चलने का उनका संदेश तो चर्चित हो गया, पर आसपास के जीवन में अहिंसा अपनाने के उनके अधिक व्यापक संदेश पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया।

फोटोः सोशल मीडिया
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भारत डोगरा

यह उत्साहवर्धक है कि नई पीढ़ी में महात्मा गांधी केे प्रति सहज आकर्षण है और युवा ही नहीं अनेक छोटे बच्चे भी गांधी जी के बारे में जानना-समझना चाहते हैं। पर कभी-कभी यह जिज्ञासा किसी क्विज या डिबेट या डे ईवेंट तक ही सीमित रह जाती है या इसका असर मात्र सतही स्तर पर ही सिमट जाता है। जबकि जरूरत तो इस बात की है कि एक बेहतर देश और दुनिया बनाने के लिए गांधी जी की सोच से किशोरों और युवा वर्ग का जुड़ाव अधिक गहराई से और अधिक टिकाऊ स्तर पर हो।

गांधी जी ने जीवन के हर स्तर पर हिंसा से बचने और अहिंसक सोच अपनाने का संदेश दिया। आजादी की लड़ाई या बड़े संघर्षों में अहिंसा अपनाने का उनका संदेश तो चर्चित हो गया, पर आसपास के जीवन में अहिंसा अपनाने के उनके अधिक व्यापक संदेश पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया, जबकि दैनिक जीवन में हमारे आसपास की हिंसा या हिंसक सोच ही हमारे जीवन में दुख-दर्द का एक बड़ा कारण है।

स्कूल और कालेज में, शिक्षा संस्थान के होस्टल में भी हिंसा गंभीर रूप में मौजूद है, हालांकि यह काफी हद तक छिपी हुई है। जो छात्रों के जीवन को नजदीकी से देखते हैं, वे जानते हैं कि उनके जीवन में कई बार सीनियर छात्रों की हिंसा का ही कितना डर होता है। गली-मोहल्ले की हिंसा भी कई बार बहुत डरावना रूप ले लेती है, विशेषकर कमजोर वर्ग के किशोरों के लिए। छात्राओं और अन्य लड़कियों के लिए तो हिंसा व हिंसक सोच (विशेषकर यौन हिंसा के संदर्भ में) और भी खौफनाक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की हिंसा और स्वास्थ्य पर वैश्विक रिपोर्ट में इस बारे में चौंका देने वाले आंकड़े दिए गए हैं कि बचपन से यौवन तक हिंसा कितना गंभीर रूप ले सकती है। 13 वर्षों के आसपास की आयु के छात्रों के 27 देशों के सर्वेक्षण से पता चला है कि अधिकांश देशों में 50 प्रतिशत से अधिक छात्रों ने अन्य छात्रों को ‘बुलिंग’ करने या प्रताड़ित करने की बात स्वीकार की है। कनाडा में 23 प्रतिशत स्कूली छात्राओं ने यौन उत्पीड़न के अनुभव से गुजरने की बात की।

मिस्र में 26 प्रतिशत बच्चों ने घर में पीटे जाने पर गंभीर चोट चोट लगने की शिकायत की। संयुक्त राज्य अमेरिका में 44 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि पिछले वर्ष में उनके पीटने या पिटने वाले झगड़े हुए। उत्तरी कोरिया में 45 प्रतिशत अभिभावकों ने अपने बच्चों को पीटने की बात स्वीकार की, जबकि रुमानिया में यह प्रतिशत 50 पाया गया। बाल और किशोर मजदूरों को तो सबसे अधिक हिंसा कार्यस्थल पर सहनी पड़ती है।

अतः यदि अहिंसा की सोच को बचपन से यौवन तक की हिंसा को हर स्तर पर कम करने के प्रयासों से जोड़कर आगे बढ़ा जाए तो कम उम्र से ही शिक्षा-संस्थान या गली-मोहल्ले के स्तर पर अहिंसा के प्रति गहरी निष्ठा उत्पन्न हो सकती है। हिंसा केवल मारपीट या धमकी, छेड़छाड़ या अपशब्द तक ही सीमित नहीं है। अत्यधिक और अंतहीन स्पर्धा में भी हिंसा निहित है। ‘मैं सबसे आगे रहूं’ के भाव के साथ ‘कोई मुझसे आगे न निकलने पाए’ जुड़ जाता है, जो आगे ‘किसी भी तरह दूसरे को आगे निकलने से रोकने में परिवर्तित हो जाता है। इस तरह अत्यधिक स्पर्धा से दूसरे के प्रति हिंसा निकलती है।

दूसरी ओर अत्यधिक महत्त्वाकांक्षा पूरा न होने पर निराशा में अपने ही प्रति हिंसा की संभावना उत्पन्न होती है। इस तरह अत्यधिक स्पर्धा कई तरह से हिंसा बढ़ाने वाली है, पर मौजूदा माहौल में इस खतरे से बेखबर होकर अत्यधिक स्पर्धा को बढ़ावा दिया जाता है। इस तरह सेे रचनात्मकता कुंठित होती है, तनाव, हिंसा और अपने प्रति हिंसा की संभावना बढ़ती है। यह अत्यधिक स्पर्धा अध्ययन, खेल के मैदान, आपसी-संबंधों सभी को क्षतिग्रस्त कर सकती है।

ऐसे में अगर गांधी जी की सोच के अनुसार अत्यधिक स्पर्धा के स्थान पर आपसी सहयोग के संबंधों को हर स्तर पर प्रोत्साहित किया जाए तो इससे शिक्षा संस्थानों में हर स्तर पर बेहद रचनात्मक उपलब्धियों का कार्य बहुत सुखद और तनावहीन माहौल में हो सकेगा। इस माहौल में निरंतर छात्र-छात्राओं को एक दूसरे से सीखने के बहुत अवसर मिलेंगे और छिपी प्रतिभाओं को सामने आने के अवसर मिलेंगे।

व्यवहारिक जीवन में अहिंसा के सार्थक प्रयोगों के साथ युवाओं और छात्र-छात्राओं को यह बेहतर समझने के अवसर मिलने चाहिए कि उनका और उनकी पीढ़ी का भविष्य किस हद तक अहिंसा और पर्यावरण की रक्षा से जुड़ा है। युद्ध और जलवायु बदलाव जैसी गंभीर पर्यावरण समस्याओं के समाधान के लिए महात्मा गांधी का अहिंसा और सादगी का संदेश कितना महत्त्वपूर्ण है, इसे विश्व के अनेक विद्वान अपने ढंग से बताते रहे हैं और यह संदेश युवाओं तक उनकी अपनी भाषा और संदर्भ में, सरल व सारगर्भित रूप में अवश्य पंहुचना चाहिए।

यदि समाज में बहुत जरूरी बुनियादी बदलाव लाने हैं तो इनके अनुकूल जीवन-मूल्यों का प्रसार बहुत जरूरी है। हर तरह के भेदभाव को समाप्त करने, विश्व में सभी लोगों की भलाई को आगे बढ़ाने, निर्धन और कमजोर वर्ग पर अधिक ध्यान देने, सभी जीवों के प्रति रक्षा का व्यवहार अपनाने, इसके लिए पर्यावरण की रक्षा करने जैसे जीवन-मूल्य बहुत जरूरी हैं और गांधी जी की सोच और कार्यों से इन जीवन-मूल्यों को बहुत बल मिला है।

जहां युवा ऐसे और कई अन्य कारणों से गांधीजी की ओर आकर्षित होते हैं, वहां यह भी ध्यान में रखना होगा कि युवा सवाल भी बहुत उठाते हैं, प्रमाण भी बहुत मांगते हैं। उनके सवालों का जवाब दिए बिना उन्हें चुप करा दिया जाएगा तो उन्हें अच्छा नहीं लगता है। वे केवल किसी के कह देने से नहीं मान जाते हैं, वे तर्कसंगत संवाद चाहते हैं।

पर कई बार गांधी जी पर हुए कुछ संवादों में जरूरी सवाल उठाने की भी पर्याप्त जगह नहीं रखी जाती है। चाहे कोई कितना ही महान हो या कितना ही सार्थक जीवन जिए, पर मानव-जीवन में हर मोड़ पर कोई सबसे उचित कदम ही उठाएगा या सबसे उचित बात ही कहेगा यह संभव नहीं है। अतः यदि गांधीजी की कुछ बातें युवाओं को ठीक नहीं लगती हैं तो उन्हें इसके लिए जगह देनी चाहिए। इस तरह अधिक युवा उनके विचारों और कार्यों के महत्त्व से जुड़ सकेंगे जो आज बहुत जरूरी भी है।

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