विष्णु नागर का व्यंग्यः इतना रोजगार है कि मनरेगा की जरूरत नहीं, नौकरी की बात मोदी के खिलाफ षड्यंत्र है!

हिंदू धर्म इतने रोजगार पैदा करता गया है कि आज विश्व का कोई धर्म इससे मुकाबला नहीं कर सकता! आज भी वह हिंदुत्व के रूप में नये से नये रोजगारों सृजन कर रहा है। गोरक्षा, लव जिहाद आदि ऐसे ही कुछ नाम हैं! सुना है कि यहां हिंदू राष्ट्र भी जल्दी बनने वाला है।

इतना रोजगार है कि मनरेगा की जरूरत नहीं, नौकरी की बात मोदी के खिलाफ षड्यंत्र है!
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विष्णु नागर

बहुत समय से भक्तों की जबर्दस्त मांग थी कि बुढ़ऊ, तुम नकारात्मक ही क्यों लिखते हो, कभी कुछ सकारात्मक भी लिख दिया करो! भक्तों का स्थान आजकल गैरभक्तों की अपेक्षा महत्वपूर्ण है, इसे ध्यान में रखते हुए आज मैं केवल सकारात्मक लिखूंगा। मुझे आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि भक्त मुझे शाबाशी देकर अनुग्रहित करेंगे और कहीं कोई भूल-चूक रह जाए तो मुझे बांग्लादेशी या पाकिस्तानी समझने की भूल नहीं करेंगे!

इस देश का सौभाग्य है कि यहां हिंदू धर्म पैदा हुआ, पला और बढ़ा! ऐसा नहीं होता तो क्या होता, सोचकर दिल कांप जाता है! सब जो चलायमान है, ठप हो जाता। न नौकरी होती, न धंधा। आजाद भारत की सारी सरकारें फेल हो जातीं। गांधी और भगत सिंह का नाम डूब जाता। अंग्रेजों को फिर से बुलाना पड़ता। अंग्रेजों को अब अक्ल आ चुकी है, तो वे फिर से आने से मना कर देते। उन्हें मालूम है कि 'हिंदू राष्ट्रवादी' तो उनका तन-मन से साथ देंगे मगर सच्चे हिंदुस्तानी उन्हें फिर से भगा देंगे। वे जवाब देते कि तुम मुगलों को बुला लो। मुगलों को ढूंढने जाते तो वे न मिलते मगर इस संकट से हमें हिंदू धर्म ने बचा लिया।

हिंदू धर्म लगातार इतने रोजगार पैदा करता गया है कि आज विश्व का कोई धर्म इस मामले में उसका मुकाबला नहीं कर सकता! सेकुलर कुछ भी कहें, आज भी वह हिंदुत्व के रूप में नये से नये रोजगारों सृजन कर रहा है। गोरक्षा, लव जिहाद आदि ऐसे ही कुछ नाम हैं! सुना है कि यहां हिंदू राष्ट्र भी जल्दी बनने वाला है, साथ ही भारत विश्वगुरु भी बनने वाला है! फिर तो रोजगार ही रोजगार होंगे। मोदी जी कहेंगे, आओ हिंदुओं, तुम रोजगार ले लो तो हिंदू कहेंगे, क्षमा कीजिए महाराज, हमारे पास आलरेडी हिंदू राष्ट्र के निर्माण का इतना काम है कि सांस लेने की फुर्सत नहीं है। आप अमेरिका से हिंदुओं का आयात कर लो! ट्रंप वहां सबकी बारह बजा रहा है!

हिंदू धर्म में रोजगार और व्यवसाय की जितनी विस्तृत और सुचिंतित व्यवस्था है‌ और कहीं नहीं हैं। भारत में मंदिर ही मंदिर हैं। इतनी दुनिया में न चर्चें हैं, न मस्जिदें हैं! लगभग हर हिन्दू का घर, घर कम, मंदिर अधिक है। मोहल्ले में भी चार नहीं तो कम से कम दो मंदिर हैं। हर हाउसिंग सोसाइटी में न्यूनतम एक मंदिर है। आप जहां रहते हैं, उसके दांये और बाएं हर बीस कदम पर एक मंदिर होगा। घर के ऊपर और नीचे भी मंदिर होने की प्रबल संभावना हैं।


यहां तो मस्जिद के नीचे भी मंदिर दबे पड़े हैं। उधर पुरी से लेकर अयोध्या तक, खाटूश्यामजी से लेकर कन्याकुमारी तक मंदिर ही मंदिर हैं। नये-नये मंदिर हैं और मंदिर कारिडोर हैं। पर्व हैं, त्योहार हैं। होली-दिवाली, दशहरा, रामनवमी, जन्माष्टमी, करवाचौथ है। जीवन-मरण से जुड़े तमाम कर्मकांड हैं। गिनते जाइए। गिनते-गिनते थक जाएंगे मगर आकाश में तारों की तरह इन्हें भी गिन नहीं पाएंगे! बाजार ही बाजार है। रोजगार ही रोजगार है!

मंदिर हैं तो मूर्तियां हैं। मूर्तियां हैं तो पूजा है। पूजा है तो उसे संपन्न कराने के लिए पंडित हैं, चढ़ावा है। उसके लिए बाजार है। बाजार में मिठाइयां हैं, फल हैं, फूल हैं, हार हैं, पान है, नारियल है, अगरबत्ती है, रूई है, गुड़ है, चने हैं, इत्र है। चंदन की लकड़ी है, उपले हैं, हवन सामग्री है। पुण्य है, पाप है। स्वर्ग है, नरक है। तीर्थयात्रा है। मृत्युभोज है। पिंडदान है। पंचांग है, मुहूर्त है।

भांति-भांति के ज्योतिष हैं। फलित ज्योतिष है, अंक ज्योतिष है। लाल किताब है, 'हस्तरेखा विज्ञान' है। ज्योतिष है तो ज्योतिषी हैं। कुछ पहुंचे हुए हैं तो कुछ पहुंचने में व्यस्त हैं। जन्मपत्री है, दैनिक, साप्ताहिक, वार्षिक भविष्यफल है। दान है, दक्षिणा है। जगराता है। फिल्मी भजनों की बाढ़ और सुनामी है। डीजे है। आरती है, महाआरती है। भोजन-परसादी है! धर्म की तमाम जरूरतों का भरापूरा भौतिक संसार है। व्यवसाय ही व्यवसाय है, रोजगार ही रोजगार है!

दिशाएं हैं तो दिशा-शूल है। उनसे बचने के उपाय बताने वाले पंडित जी हैं। नया घर है तो गृहप्रवेश है। उसकी पूरी रस्म है। अपना घर है मगर उसमें सुख-शांति नहीं है, ग्रहदोष है तो ग्रह शांति के तमाम उपाय हैं। उसके लिए विभिन्न पदार्थो की जरूरत है। घर से निकलते ही बाजार है बल्कि दरवाजे की घंटी बजाता बाजार है! भौतिक ही आधिभौतिक है।

हिंदू धर्म है तो सगाई है, शादी है। भोज है तो हलवाई है। तरह-तरह के अन्न, मेवे, दूध, दही, घी, बेसन, शक्कर आदि की बहार है। खाने की प्लेटें हैं, धोने वाले हैं। 101 कुंडीय यज्ञ और महायज्ञ है। पवित्र धुएं से जलती आंखें हैं। पर्यावरण 'शुद्धि' का आनंद है!

हिंदू धर्म है तो नदियां कैसी भी हों, पवित्र हैं। गंदी हों तो भी पवित्र हैं। उन्हें साफ करने से मोदी जी और योगी जी को उनकी पवित्रता नष्ट होने का डर है। इनकी पवित्रता नष्ट हुई तो स्नान-ध्यान बंद। पुण्य लाभ बंद। पर्यटन बंद! नदी जल को शुद्ध और पवित्र करने के लिए दूध बहाने के वैदिक उपक्रम है। इन्हें संपन्न करने के लिए मंत्री-मुख्यमंत्री आदि की सहज उपलब्धता है।


गंगा मैया है तो उसका आधुनिक गंगा पुत्र है, जो मैया के बुलावे पर ऐन चुनाव से पहले गुजरात से दौड़ा चला आता है। प्रधानमंत्री बनकर फिर दिल्ली फुर्र हो जाता है। वहां से वह विकास करना आरंभ कर देता है। यहां रहने पर विकास बाधित होने लगता है तो वह विदेश चला जाता है। वहां से विकास करने लगता है!

हिंदू धर्म है तो साधु-संत हैं। कोई नागा है तो कोई घर से भागा है। कोई रोटी-दाल का आसानी से प्रबंध करके खुश है। किसी का आश्रम है, किसी का मठ है, किसी का डेरा है। वहां सेवक -सेविकाएं हैं। वाद हैं, विवाद हैं। मुकदमेबाजियां हैं, हिंसा है। धर्म रक्षा के लिए वकील की फीस है। अदालतें हैं। मुकदमे हैं। जज हैं। न्याय की जीत है। जेल है, बेल है। सरकार से अच्छा हेल- मेल है। धर्म में पद का खेल है। कोई जगद्गुरु है तो कोई महामंडलेश्वर। परमहंस है तो कोई परमाचार्य!

तरह-तरह के बाबा हैं। भांग है, गांजा है। भभूत है। लंगोटी है। सोटा है। कंठी है। रुद्राक्ष की माला है। मोह-माया के बंधन को तोड़ने के प्रवचनदाता देकर लाखों-करोड़ों की आमदनी के हर्ता हैं। हर जगह, हर तरह की ऐश है। तरह-तरह के वेश हैं। कभी-कभी  भंडाफोड़ भी है और भंडाफोड़ से कुछ नहीं होने का खेल भी है। कभी राम रहीम और आसाराम बापू के लिए तफरीहन जेल भी है।

हिंदू धर्म की गोद में बैठी राजनीति है। उसका वोट बैंक है तो कुछ रामजादे हैं तो कुछ हरामजादे हैं। कोई बाबर की औलाद है तो कोई ईश्वर का अवतार है। लिंचिंग है, बुलडोजर है, योगियों-भोगियों के बिगड़े बोल हैं। हिंदू राष्ट्र का आह्वान है। चंदे का धंधा है। धर्म परिवर्तन का तूर्य नाद है। बुर्का है। बुर्का खींचने वाले पुराने सोशलिस्ट मुख्यमंत्री हैं। गली-गली में जयश्री राम बुलवाने के लिए केसरिया पटका पहने शोहदे हैं। मतलब काम ही काम है। रोजगार ही रोजगार है। विकास ही विकास है। आंंकड़े रतजगा है। वैष्णो देवी की यात्रा है। धार्मिक पर्यटन है। जेबकतरे हैं।

मतलब इतना रोजगार है, इतना रोजगार है कि मनरेगा की जरूरत नहीं है। स्कूल-कॉलेज फिजूल हैं। सरकारी अस्पताल धन की बर्बादी है। धर्म जब सेवा और मेवा के इतने सुअवसर दे रहा है तो फिर नौकरी की जरूरत क्या है। नौकरी की बात मोदी के खिलाफ षड्यंत्र है, जिसके संचालक नेहरू हैं।

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