इन वजहों से करें विचार, ठीके नहीं हैं नीतीश कुमार...

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू कर नीतीश कुमार ने एक तरह के नवाचार को जन्म दिया है! स्टोर कीपिंग और होम डिलीवरी- जैसे बिल्कुल नए तरह के कुटीर उद्योगों को राज्य में खासा बढ़ावा मिला है। ‘रोजगार’ के नए ‘अवसर’और माफिया की नई प्रजाति विकसित हुई है।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया

नवजीवन डेस्क

बिहार अब पहले जैसा नहीं रहा। राजधानी पटना में नया सचिवालय के आसपास जहां कभी खुला नाला और खाली पड़ी जमीन पर झुग्गी-झोपड़ियां हुआ करती थीं, अब शानदार ईको पार्क है। इसके बनने से एक फायदा यह हुआ कि पटना चिड़ियाघर की भीड़, खासतौर से सुबह-सबेरे टहलने वालों की, साझा हो गई और चिड़ियाघर के बसेरों ने भी राहत की सांस ली। इसमें झील हैं, फव्वारे हैं, बच्चों के लिए सुरक्षित बड़ा क्षेत्र है और एक विशाल वाकिंग-जॉगिंग ट्रैक भी है।

इसी ईको पार्क के इर्द-गिर्द बेली रोड पर पटना वीमेंस काॅलेज के ठीक सामने विशाल और शानदार-अत्याधुनिक परिसर वाला नया पटना संग्रहालय बन गया है। इसके अंदर पुराने और ऐतिहासिक संग्रहालय से उधार ली गई यक्षिणी की मूर्ति के अलावा कोई बहुत कुछ खास दर्शनीय चीज भले न हो लेकिन इसका शिल्प और भव्यता किसी को भी आकर्षित करती है। एएन सिन्हा इंस्टीटयूट से महेन्द्रू या शायद आगे तक भी गंगा किनारे ‘मरीन ड्राइव’ का एक नया आकर्षण आकार ले रहा है।

बाकी सड़कें, पुल, फ्लाई ओवर, बाईपास तो पटना क्या, पूरे बिहार में बन ही रहे हैं। अब बार-बार वायदे के बावजूद अगर विक्रमशिला के ऐतिहासिक अवशेषों के दिन नहीं बहुरे और प्रधान सेवक की इसे उसी स्थान/ इलाके में केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा भी आगे नहीं बढ़ सकी तो किसी का क्या दोष? नालंदा, ऊपर से ‘गृहक्षेत्र’ के सामने सुदूर अंग प्रदेश के इस बियाबान की बिसात ही क्या है? बाकी सब कुछ बहुतअच्छा है। बिहार में ऐसी ही बहार हर जगह है!

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बिहार में हाईकोर्ट के एक जज, जिनकी ईमानदारी और खुद्दारी पर चारा घोटाले की पैदाइश के दौर से आज तक कोई शक नहीं रहा, जब एक पूर्व आईएएस केपी रमैया के मामले की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में बिहार की न्यायपालिका में शीर्ष पर फैले ‘भ्रष्टाचार’ और भ्रष्ट न्यायिक अफसरों को उच्च अदालत के संरक्षण की बात करते हैं, पटना सिविल कोर्ट में हुए एक स्टिंग ऑपरेशन में सामने आए घूसखोरी के सच का हवाला देते हैं और जिसे बिहार की जनता बड़े आश्वस्ति भाव से देखती है, लेकिन अगले ही दिन मुख्य न्यायाधीश सहित 11 सदस्यों की एक बड़ी पीठ उस टिप्पणी को नागवार मानते हुए उलट देती है। उस जज को अगले कई दिन तक कोई बेंच नहीं मिलती है।

यह भी अच्छा है... बिहार में ऐसी भी बहार है!

बिल्कुल यूपी की तरह बिहार में भी अपराध पर काबू पा लिया गया है। अब वहां यूपी की तरह ही ‘जंगल राज’ नहीं है। यह हमें बार-बार सुनाया-पढ़ाया जाता है। बिहार के तो किसी शब्द कोष से ही यह शब्द फिलहाल ‘मुल्तवी’ है। हालांकि सरकारी फाइलों की धूल थोड़ा-सी भी झाड़ें तो सच सामने आ जाता है। यह भी कि बाकी मामले अपनी जगह, महिला अपराध भी कहीं से कम नहीं हुए हैं। 2017-18 के आंकड़ों में तो कोई आनुपातिक बदलाव नहीं ही दिखा, 2019 आते-आते आपराधिक मामले डेढ़ गुना तक बढ़ जरूर गए।

बीते दो महीनों में तो मॉब लिंचिंग की भी कई घटनाएं सामने आईं और एसिड अटैक भी हुए। यह सब जारी रहा लेकिन बालिका गृह की लड़कियों की बड़ी त्रासदी पर अब तक कुछ ठोस सामने नहीं आया। अभी-अभी ‘घूस की बची हुई’ 15 लाख की रकम देने में असमर्थ-असहाय ठेकेदार को चीफ इंजीनियर के दफ्तर में जिंदा जलाने की घटना पर भी फिलहाल रहस्य की चादर खिंचती दिख रही है। यह सब भी हो ही रहा है। लेकिन ठीक ही है... बिहार में ऐसी भी बहार है !

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बिहार में पूर्ण शराबबंदी है, अच्छी बात है। इसने नई तरह की संभावनाओं, एक तरह के नवाचार को जन्म दिया है! स्टोर कीपिंग और होम डिलीवरी- जैसे बिल्कुल नए तरह के कुटीर उद्योग को खासा बढ़ावा मिला है। खास ही नहीं, आम लोगों की भी ‘आमदनी’ बढ़ाई है। ‘रोजगार’ के नए ‘अवसर’ सृजित कर माफिया की नई प्रजाति विकसित की है। नई व्यवस्था में शराब जितनी आसानी से घर बैठे सर्वसुलभ है, वह इस नवाचार-उन्मेषकों के प्रति आश्वस्त करता है।

अब इस नवाचार में निहित रिस्क फैक्टर के चलते ‘प्रोडक्ट’ थोड़ा मंहगा भले ही हो जा रहा हो लेकिन ‘शुष्क प्रदेश’ में आम तौर पर महज दोगुनी और कुछ ब्रांडों की शराब तिगुनी कीमत पर भी अगर घर बैठे आसानी से एक फोन कॉल पर मिले, यानी ‘क्विक होम डिलीवरी’ और ‘कैश ऑन डिलीवरी’ के विकल्प के साथ बिना ज्यादा वक्त गंवाए महज कुछ मिनटों में उपलब्ध है, तो यह तो शायद सबसे अच्छीबात है!

दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिकों की तर्ज पर बिहार के गली-कूचों, मोहल्ले-मोहल्ले में बन गए इसके अदृश्य ‘डिलीवरी पॉइंट’ या वितरण केन्द्र वाकई ‘डिजिटल इंडिया’ क्रांति साकार करते दिखते हैं। अभी-अभी घोषित हुए पान-मसाला पर पूर्ण प्रतिबंध के आदेश ने भी एक नये तरह के कुटीर उद्योग श्रंखला की संभावनाओं भरी राह खोली है, जो घटते रोजगार के माहौल में ‘उम्मीद’ जगाने वाला है।

यानी अब तो कोई शक ही नहीं कि बिहार में बहार है... बिहार में ऐसी ही बहार है...!

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हम तो दिल्ली में चिदंबरम साहब की गिरफ्तारी के सुपर फास्ट तौर-तरीके के ही मुरीद हो चले थे लेकिन असल तो बिहार जाकर पता चला कि ‘दोस्ती तोड़ने’ की सजा कैसे दी जाती है। लोग मानते हैं कि पुराने दोस्त और लंबे समय तक बगलगीर रहे साथी भी जब मन की करने लगें तो उन्हें उनकी जगह दिखाई ही जानी चाहिए। सो, अनंतसिंह के मामले में भी यही हुआ। वैसे ‘राजनीति’ में यह ‘रीति’ नई तो है नहीं। हां, जिस एके-47 पर यह किलेबंदी हुई, वैसी ही एके-47 लहराते कुछ विडियो वायरल हुए तो बहुत कुछ सामने होते हुए भी कुछ भी सामने नहीं आया।

वैसे, बिहार पुलिस भी मानती है कि 2012 से लेकर 2019 तक सौ से ज्यादा एके- 47 बिहार, खासतौर से पटना से मुंगेर तक पहुंची हैं। ऐसे में, एके-47 लहराने-फहराने का वीडियो तो छोटी-मोटी बातहै। अब असलहे होंगे तो लहराए जाएंगे ही। ये शान और रुतबे का मामला भी तो है।

मने, यह नए तरह का बिहार है... बेवजह परेशान न हों... बिहार में बहार ही बहार है!

हां, तीन-चार दिन के बिहार प्रवास में एक बात जरूर अच्छी लगी कि चुनाव के पहले आपने ‘सात निश्चय’ के तौर पर हर घर को बिजली, हर घर को नल का पानी, हर घर को शौचालय (लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान), हर गली में पक्की नाली जैसे जो वायदे किए गए थे, उन पर काम हो रहा है। अब जैसे, कई जगह शौचालय बने और उनमें से किसी में मवेशी का चारा रखा जा रहा है, तो किसी में उपले-कंडे। फिलहाल किसी काम तो आ ही रहा है न!

हां, बिजली जरूर चमकी हैऔर खाली पोल और दिखावे के बिजली तार वाले गांव अब कम ही दिखते हैं। अफसरशाही की अनुकंपा से बोरिंग भी हुई, नल भी लगे लेकिन कितनी गहराई में बोरिंग हुई, कितनी टोटियां लगते ही ‘चोरी’ हो गईं, इनका हिसाब अब भला कोई कैसे और क्यों रखे? सो कहीं-कहीं ये सब भी दिख ही जाता है। और हां, गंगा की तेज धार वाले भागलपुर में 19 सौ करोड़ के एक घोटाले का ‘सृजन’ हुआ था। उसकी धार में कई बड़ी मछलियां दिखी तो थीं लेकिन अब तक फंसी एक भी नहीं। लोग इसपर सवाल पूछते हैं।

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अंत में एक बात और... सुना था गंगोत्री से तमाम नदियां निकलती हैं लेकिन यहां तो सारी नदियां गंगोत्री की तरफ ही आती दिखती हैं, यह दूसरा सच है। मतलब यह कि सारा विकास पटना और नालंदा में सिमट कर रह गया है। यानी लोग पटना आएं, यह तो हुआ। लोग भागलपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा या मधुबनी की ओर भी जाएं, इसके लिए कुछ नहीं हुआ। पटना में भी सब कुछ बेली रोड के इर्द-गिर्द ही हुआ। सच है कि पटना का विकास तो हुआ, लेकिन विस्तार नहीं हुआ। पटना-बिहार की यह भी एक टीस है।

फिलहाल चंद रोज के बिहार प्रवास का यही हासिल हिसाब है।

(नवजीवन के लिए वरिष्ठ पत्रकार नागेंद्र का आलेख)

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