मोदी सरकार का भ्रम है कि किसान भ्रम में हैं, हर पैंतरे और हथकंडे के जवाब लेकर आए हैं

पहले देश भर से आए किसानों को दिल्ली के अलग-अलग सीमाओं पर रोकर और फिर आंदोलन के बुराड़ी मैदान का विकल्प देकर और अब एक समिति बनाने की बात कर सरकार किसी तरह किसानों को तोड़ना चाहती है। लेकिन किसानों के तेवर से साफ है कि सरकार और प्रधानमंत्री भ्रम में हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

प्रधानमंत्री, सभी मंत्री, बीजेपी के नेता और अपना अस्तित्व खोकर सरकार का हिस्सा बन चुकी मेनस्ट्रीम मीडिया लगातार यह भ्रम पाले बैठे हैं कि किसान भ्रम में हैंI इसी गिरोह ने पिछले साल शाहीन बाग के आन्दोलन को भी इसी नजरिये से देखा था, पर इस आन्दोलन को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार को अचानक कोरोना के नाम पर देशव्यापी लॉकडाउन लगाना पड़ा थाI

अपने पूरे वजूद को मिटाकर सरकार के तलवे चाटने वाली ऐसी मीडिया तो पूरी दुनिया में भारत को छोड़कर कहीं नहीं है, यहां तक कि चीन और हांगकांग में भी नहींI अब तो सभी गंभीर आन्दोलनों से इन्हें खदेड़ कर भगाया जा रहा है, शाहीन बाग में यही किया गया था और अब किसान भी इन्हें भगा रहे हैंI भ्रम पर सबसे सटीक जवाब एक किसान ने ही दिया, जिसके अनुसार, “प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्री और बीजेपी के सभी नेता प्रचारित करते हैं कि वे किसान पुत्र हैं, तो फिर ये लोग बताएं कि जब पुत्र को भ्रम नहीं है तो उनके बाप को भ्रम कैसे हो गया?”

पंजाब विधानसभा के चुनावों के दौर में प्रधानमंत्री जी जब पंजाब गए थे, तब हाथ हवा में लहराकर जनता को बताया था कि गुरु नानक के पंज प्यारों में एक गुजराती भी थे और मैं भी गुजराती हूं, इसलिए गुरु नानक देव जी का पक्का भक्त हूंI चुनावों के दौर में प्रधानमंत्री जी गुरु नानक देव जी के भक्त हो गए थे। लेकिन इस वर्ष सिखों के सबसे बड़े पर्व- प्रकाश पर्व यानि गुरु नानक देव जी के जन्मदिन के दिन जब लाखों सिख पुरुष और महिला किसान अपने बच्चों समेत दिल्ली के आसपास घरों से दूर अपनी मांगों के लिए आन्दोलन कर रहे थे, तब प्रधानमंत्री जी बाबा विश्वनाथ का जयकारा लगा रहे थे, गंगा में क्रूज का आनंद ले रहे थे और लेसर की किरणों पर थिरक रहे थेI किसानों को भ्रम में होने की बात कर रहे थे और बता रहे थे कि किसानों को बरगलाया जा रहा हैI इसके बाद से दिल्ली पहुंचकर किसानों के सन्दर्भ में प्रधानमंत्री जी ने एक अजीब सी खामोशी का लबादा ओढ़ लिया हैI दूसरी तरफ किसान आन्दोलनकारी लगातार साबित कर रहे हैं कि वे ना तो भ्रम में हैं और ना ही उन्हें कोई बहका रहा हैI

वैसे यह मोदी जी का कोई नया व्यवहार नहीं है, हरेक राज्य के चुनाव के दौरान वे उस राज्य के संबंधी होते हैं और चुनाव खत्म होते ही उस संबंध को भूल भी जाते हैं और अगले राज्य से संबंध जोड़ लेते हैंI वर्तमान में वे बांगला के कुछ शब्द सीख रहे होंगे, क्योंकि अब पश्चिम बंगाल से संबंध बनाने का समय नजदीक आ गया हैI किसानों के आन्दोलन और उनकी मांगों के बारे में सरकार कितनी लापरवाह है, इसका उदाहरण 3 दिसंबर को सरकार और किसान नेताओं की वार्ता के बाद कृषि मंत्री के वक्तव्य में नजर आता हैI समर्थन मूल्य, प्राईवेट मंडी और सरकारी कृषि मंडी जैसे मुद्दों के बारे में किसान लगातार अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, पर अब लगभग 6 महीने बीतने के बाद पहली बार सरकार इन्हें चर्चा के मुद्दे मान रही हैI जिस अकड़ में सरकार यह वार्ता कर रही है, उससे तो लगता है कि किसानों का आन्दोलन लम्बे समय तक चलता रहेगाI

आन्दोलन में सम्मिलित अधिकतर किसान बताते हैं कि आज तक कोई भी ऐसी सरकार नहीं आई है, जिसने किसानों का भला किया हो, पर पिछले 6 वर्षों से जैसी दुर्दशा में वे खेती कर रहे हैं, वैसी हालत कभी नहीं थी, अंग्रेजों के समय भी नहींI कृषि एक जमीन से जुड़ा मसला है और इसकी बारीकी वही समझ सकता है जो सीधे तौर पर खेती से जुड़ा होI

सरकार भले ही इन आन्दोलनकारी किसानों को अनपढ़ समझ रही हो, पर तथ्य यह है कि इनमें से अधिकतर किसान वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाईजेशन के जनरल अग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ के भारतीय किसानों पर असर पर भी लम्बा व्याख्यान दे सकते हैंI पेटेंट वाले जिस डंकल अंकल को हम भूल चुके हैं, वे भी इन किसानों को याद हैंI इस सरकार की पेट्रोलियम आयात नीति के किसानों पर असर को भी किसान बता रहे हैंI उनके अनुसार 6 वर्ष पहले तक अधिकतर पेट्रोलियम पदार्थों का आयात भारत में खाड़ी के देशों से किया जाता था और उसके बदले सरकार उन्हें अनाज भेजती थी, इसलिए अनाज का एक विस्तृत बाजार थाI

पर, अब अमेरिका से दोस्ती निभाते-निभाते भारत सरकार खाड़ी के देशों की उपेक्षा कर रही है, और पेट्रोलियम पदार्थ दूसरे क्षेत्रों से आयात कर रही है, जहां इसके बदले अनाज नहीं बल्कि डॉलर भेजा जाने लगा हैI किसानों से जुड़े तीनों नए कानूनों पर किसानों से कोई राय नहीं ली गई और ना ही बीजेपी ने सहयोगी दलों से कोई सलाह लीI जाहिर है इन कानूनों को बीजेपी और संघ परिवार के शीर्ष नेतृत्व के सुझावों पर नौकरशाहों ने बनाया होगाI कृषि कानून ही नहीं, बल्कि दूसरी समस्याओं की जड़ में भी यही नौकरशाह होते हैंI

सुदर्शन टीवी ने अपनी सरकार भक्ति दर्शाने के लिए और सरकार के आशीर्वाद से बड़े जोर-शोर से आईएएस जेहाद कार्यक्रम शुरू किया था, जिसे बीच में ही सर्वोच्च न्यायालय ने रोकने का आदेश दे दियाI दरअसल गंभीर और निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले कुछ न्यूज़ चैनलों को यह विस्तार से बताना चाहिए कि राजनैतिक आकाओं को खुश करने के चक्कर में और उनका एजेंडा पूरा करने के चक्कर में ये नौकरशाह देश का, उसकी जनता का कितना अहित कर रहे हैं, जनता से जेहाद कर रहे हैंI देश की हरेक असफलता में नेताओं के साथ ही नौकरशाहों की बराबर की भागीदारी हैI नेताओं और नौकरशाहों ने जनता पर बहुत मनमानी कर ली, इस बार किसान और मजदूर एक साथ विरोध में उठ खड़े हुए हैं- शायद अब देश बदल जाएI

दिल्ली और इसकी सीमाओं पर जहां किसान एकत्रित हैं या फिर जहां से और किसान आ सकते हैं, वहां देखते हुए यही लगता है कि सरकार इन्हें दूसरे देशों की सेनाओं और आतंकवादियों से भी अधिक खतरनाक समझ रही हैI पुलिस और सशस्त्र अर्धसैनिक बलों की तादात ही यह बता देती है कि सरकार कितनी डरी हुई हैI जहां अधिक संख्या में किसान हैं, वहां तो पुलिस और अर्धसैनिक बलों की चौकसी ऐसी है, मानो किसी युद्ध का बिगुल बज गया होI

दिल्ली के बुराड़ी ग्राउंड में बहुत कम किसान ठहरे हैं और वहां निश्चित तौर पर पुलिस और सुरक्षाकर्मियों की संख्या किसानों से बहुत अधिक हैI इस ग्राउंड के चारों तरफ बाहर सशत्र बलों का पहरा है, ग्राउंड में जाने के लिए दिल्ली पुलिस हरेक के नाम और मोबाइल नंबर रजिस्टर पर नोट करती है, पार्किंग में सामान्य गाड़ियां तो शायद ही रहती हैं, पर पार्किंग पुलिस की गाड़ियों से भरी रहती हैI जहां भी कुछ किसान आपस में विचार-विमर्श करते हैं, वहां सादी वर्दी में पुलिस वाले खड़े मिलेंगें, यही नहीं ड्रोन भी बीच-बीच में निगरानी के लिए आ जाते हैंI

ऐसा लगता ही नहीं कि सरकार किसानों को अपने ही देश का नागरिक समझ रही हैI किसानों की एकजुटता से परेशान सरकार लगातार इन्हें बांटने की कोशिश कर रही हैI लगभग सारे देश से आए किसानों को लगातार पंजाब का किसान बताने का प्रयास किया जा रहा है। यही नहीं 1 दिसंबर की वार्ता के लिए भी केवल पंजाब के किसान नेताओं को न्योता दिया गयाI यह एक सरकारी साजिश है, जिसके तहत पंजाब के किसान नेताओं के प्रति बाकी राज्यों के किसान नेताओं में नफरत पैदा की जा सकेI किसानों के बंटवारे का काम तो हरेक स्तर पर किया जा रहा हैI

आंसू गैस और वाटर कैनन के साथ ही सड़कों पर तमाम अवरोधों के बाद भी जब किसान दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर पहुंच गए तब उन्हें दिल्ली में प्रवेश करने नहीं दिया गयाI किसान दिल्ली के रामलीला ग्राउंड या फिर जंतर-मंतर तक जाना चाहते थे, पर अगले दिन अचानक उन्हें केवल बुराड़ी ग्राउंड तक जाने की इजाजत दी गईI सरकार भी यह जानती थी कि अधिकांश खुद्दार किसान इस प्रस्ताव को नहीं मानेंगेI सरकार ने सोचा तो यही था कि इससे किसानों में फूट डालना आसान होगा, पर ऐसा हो नहीं पायाI

हालांकि जो किसान बुराड़ी ग्राउंड पर सरकार के इंतजामों का उपयोग कर रहे हैं, वे तो आन्दोलनकारी किसानों से लगभग अलग हो गएI दूसरी तरफ, अलग-अलग बॉर्डर पर जुटे किसान नेता एक दूसरे से आमने-सामने बैठकर विचार-विमर्श नहीं कर पा रहे हैंI सरकार यही चाहती है कि सभी संगठन और सभी राज्यों के किसान एक जगह पर इकट्ठा न हो पाएं, इनके बीच दूरियां बनी रहेंI दूरियां बने रहने पर विचारों में मतभेद की संभावनाएं अधिक हैंI

ऐसी ही सोच एक समिति बनाने की भी है, जिसमें महज तीन-चार किसान नेता ही रहें और उन्हें धमकाना और फिर साधना आसान रहेI खैर, यह सब सरकार और प्रधानमंत्री का भ्रम है, इस बार किसानों को चौतरफा समर्थन मिल रहा है और दूसरे राज्यों के किसान भी अब दिल्ली चलो की तैयारी कर रहे हैंI ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने भी चक्का जाम का ऐलान कर दिया है और खिलाड़ी अपने पुरस्कार वापसी का ऐलान कर रहे हैंI

लगता नहीं कि इस बार किसान किसी बहकावे में आने वाले हैंI जाहिर है सरकार के पास सेना द्वारा दमन या फिर कोविड 19 के आंकड़ों में उछाल लाकर लॉकडाउन का विकल्प ही रह गया है, क्योंकि इस तानाशाह सरकार से किसी भी समस्या के समाधान की उम्मीद बेकार हैI जहां अडानी-अंबानी के भले की बात हो वहां तो सरकार एकतरफा रुख शुरू से अपनाती रही हैI सारे उद्योग, खनन, जंगल, हवाई अड्डे, रेलवे और इंफ्रास्ट्रक्चर तो सरकार अडानी-अंबानी को उपहार में दे ही चुकी है, अब उपजाऊ भूमि और फसल की बारी हैI पर, इस बार किसानों ने सरकार की मंशा को भांप लिया है और अपनी उपज और जमीन बचने के लिए एकजुट हो चुके हैंI

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