लोकतंत्र नहीं, यह मोदीतंत्र है!

मोदी जी के राज में लोकतंत्र महज मोदीतंत्र रह गया है। देश का संविधान, अर्थव्यवस्था, क़ानून व्यवस्था और सारा सामाजिक तानाबाना– सब बस मोदी जी के इशारे पर चल रहे हैं, और इस मोदीतंत्र का मेनस्ट्रीम मीडिया खुला समर्थन कर रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

राहुल गांधी ने मोदी सरकार और शेयर मार्किट के गठबंधन पर गंभीर सवाल उठाये हैं और इसे सबसे बड़ा घोटाला करार दिया है। आज तक मोदीतंत्र में जैसा सवाल उठाने पर होता है, वैसा ही इस बार भी हुआ। मोदीतंत्र में किसी भी गंभीर सवाल का जवाब नहीं मिलता, उल्टा कोई बीजेपी प्रवक्ता या फिर केन्द्रीय मंत्री निहायत ही बेवकूफी भरे लहजे में इस सम्बन्ध में एक लम्बी प्रेस कांफ्रेंस करता है, जिसमें उठाये गए किसी प्रश्न का जवाब नहीं मिलता और किसी तरह राहुल गांधी की छवि को बिगाड़ने का प्रयास किया जाता है। अब तो इसमें भी आश्चर्य नहीं होता कि मेनस्ट्रीम दरबारी मीडिया का भी यही प्रयास होता है कि मोदी सरकार से प्रश्न पूछने वाले की छवि धूमिल की जाए।

राहुल गांधी के प्रश्नों का जवाब देने आनन्-फानन में पीयूष गोयल पहुंचे। मोदी मंत्रिमंडल में गोयल को भले ही प्रबुद्ध माना जाता हो, पर उनका बौद्धिक स्तर एक चाटुकार दरबारी से अधिक नहीं है। राहुल गाँधी के प्रश्न गंभीर थे और तथ्यों से भरपूर भी। बिना किसी तैयारी के और सत्ता की अकड़ के साथ बैठे गोयल लम्बे-लम्बे वाक्य बोलते चले गए, पर अंत तक राहुल गांधी के प्रश्नों का उत्तर के आस-पास भी नहीं पहुंचे। जब आप झूठ बोलने का प्रयास करते हैं, तब निश्चित तौर पर बेवकूफ नजर आते हैं और धाराप्रवाह बोल भी नहीं पाते। पीयूष गोयल बार-बार अपने ही शब्द जाल में फंसते रहे, जब शब्दों को संभालने की कोशिश करते, बुनियादी तथ्यों की गलती करते। शेयर मार्केट पर बात करते गोयल को यह भी स्पष्ट नहीं था कि शेयर किसने खरीदे और किसने बेचे। इतना ही नहीं, मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था की दुनिया प्रशंसा करती है यह बार-बार बताने वाले पीयूष गोयल ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय स्टॉक मार्केट में विदेशियों की हिस्सेदारी और विदेशी निवेशकों का विश्वास भी कम हो रहा है।

मोदी जी और बड़बोले अमित शाह, दोनों ने चुनावी संबोधनों में 4 जून को शेयर बाजार में खरीदारी का आह्वान किया था। पीयूष गोयल ने बताया कि शेयर बाजार चढ़ता-उतरता रहता है, यहाँ तक तो सब ठीक लगता है पर पीयूष गोयल को यह भी बताना चाहिए कि इस बाजार के चढ़ने का ऐलान कई दिन पहले ही यदि किया जा सकता है तो फिर स्टॉक मार्किट और स्टॉक एक्सचेंज की जरूरत ही क्या है?

हाल में ही न्यूयॉर्क टाइम्स में भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि बहुत सारे विदेशी निवेशक भारत में अपना कारोबार बढ़ाना चाहते है और भारतीय स्टॉक मार्किट से जुड़ना चाहते है पर देश में व्याप्त आर्थिक असमानता से उन्हें डर लगता है। इसमें यह भी बताया गया है कि देश की मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था की जमीनी हकीकत पता ही नहीं है और इनलोगों का सारा ज्ञान और आंकड़े स्टॉक मार्किट से और देश की कुल अर्थव्यवस्था से पनपते हैं। जाहिर है ऐसे में सरकार को गरीब और मध्यम वर्ग के आर्थिक हालात का पता ही नहीं है, और आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है।


इन आम चुनावों के नतीजों से केवल शेयर मार्किट ही नहीं बल्कि राम भी प्रभावित हुए हैं। चुनावों के दौरान राम और अयोध्या का महिमा मंडन करने वाले प्रधानमंत्री, बीजेपी अध्यक्ष, बीजेपी प्रवक्ताओं के लिए अब राम और अयोध्या इतिहास बन गए हैं। फैजाबाद में बीजेपी के पिछड़ने के बाद प्रधानमंत्री, बीजेपी अध्यक्ष या फिर दिन भर तमाम चैनलों पर डेरा जमाये बीजेपी प्रवक्ताओं ने राम, अयोध्या और जय श्री राम के नारे से दूरी बनाई रखी। बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी या बीजेपी अध्यक्ष नड्डा ने एक बार भी राम या अयोध्या का जिक्र नहीं किया। जाहिर है, राम अब बीजेपी के काम के नहीं रहे। ये वही राम हैं जिनका जयकारा बीजेपी सांसद बेशर्मी के साथ संसद में करते थे।

बीजेपी द्वारा बहुमत नहीं हासिल करने और एनडीए द्वारा किसी तरह बहुमत के आंकड़े तक पहुँचने के बाद भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मोदी भक्ति में कोई कमी नहीं आई, जाहिर है अगले पांच वर्षों तक मीडिया जन-मीडिया नहीं बल्कि दरबारी मीडिया ही बना रहेगा। 4 जून की शाम को मोदी के बीजेपी मुख्यालय पहुँचने से ठीक पहले एक समाचार चैनल के संवाददाता ने रिपोर्टिंग करते हुए विशुद्ध दरबारी स्टाइल में बताया की मोदी जी के चेहरे की चमक, नूर और तेज पहले जैसे ही हैं – यह एक राष्ट्रीय चैनल की रिपोर्टिंग थी। दूसरी तरफ, बीजेपी मुख्यालय में भाषण देते प्रधानमंत्री मोदी पूरी तरह से थके और प्रभावहीन नजर आ रहे थे।

हमारे देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विदेशों में खूब मजाक उड़ाया जाता है। हाल में ही ब्रिटिश कॉमेडियन जॉन ओलिवर द्वारा प्रस्तुत एक टीवी कार्यक्रम को हमारे देश में प्रतिबंधित किया गया है। इसके ऑफिसियल स्टेमिंग पार्टनर जियोसिनेमा हैं, जाहिर है अम्बानी का चैनल मोदी की आलोचना देश में प्रतिबंधित करेगा, तो दूसरी तरफ यूट्यूब ने भी इसे भारत में नहीं दिखाने का फैसला लिया है। इस कार्यक्रम में जॉन ओलिवर का यह कार्यक्रम देश में आम चुनाव, आर्थिक असमानता, अल्पसंख्यक विरोधी रवैय्या, सत्ता द्वारा किया जाने वाला अतिवाद और मीडिया सेंसरशिप पर था। जाहिर है, मोदी राज में ऐसे कार्यक्रम प्रतिबंधित ही होंगें। इसमें बताया गया है की भुखमरी और कुपोषण के वैश्विक इंडेक्स में मोदी जी का भारत सबसे निचले पायदान के देशों में शामिल है, फिर भी सरकार लगातार गरीबी हटाने की बात कर रहे हैं। दरअसल मोदी सरकार गरीबी नहीं कम कर रही है, बल्कि बार-बार गरीबी की परिभाषा बदलकर गरीबों की संख्या कम कर रही है। जॉन ओलिवर ने कहा कि देश का मीडिया मोदी आधारित है और इसे केवल मोदी के गुणगान से ही मतलब है। सरकार के किसी भी नीति की क्रिटिकल आलोचना मीडिया में कभी नहीं की जाती है। आलोचना वाले मीडिया बहुत कम हैं, और ऐसी हरेक आलोचना के बाद सरकार ऐसे मीडिया संस्थानों पर और पत्रकारों पर आतंकवादियों की तरह टूट पड़ती है। यहाँ का मीडिया यह बताता है की प्रधानमंत्री मोदी आम किस तरह खाते हैं।


अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए शुरुआत में मोदी जी ने बहुत धैर्य दिखाया था, अपनी आदत से विपरीत अपने नाम “मोदी” से शुरू में पहरेज रखा और बीजेपी, एनडीए को अपने भाषणों में शामिल रखा। पर, भाषण के अंतिम चरण में अपनी छाती पर अपनी ही उंगली रखकर मोदी की गारंटी, मोदी ये करेगा, मोदी वो करेगा – जैसे जुमले सामने आ ही गए। शुरू में लोकतंत्र और संविधान की भी चर्चा की, पर मोदी जी का लोकतंत्र जनता का कुछ नहीं है बल्कि यह मोदीतंत्र है, व्यक्तिवादी है। इसका संविधान मोदी जी की जुबान है। इस देश में कोई लोकतांत्रिक सरकार नहीं है। बीजेपी भले ही दुनिया में सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी का दावा करती हो, पर यहाँ तो ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा तक के हरेक चुनाव केवल नरेंद्र मोदी के चहरे पर लड़े जाते हैं और हरेक केन्द्रीय मंत्री या राज्यों के मुख्यमंत्री का केवल एक काम है – मोदी जी की स्तुति करना। लगभग सभी समाचार चैनल ओडिशा में बीजेपी की जीत को मोदी जी की ऐतिहासिक जीत बता रहे हैं।

मोदी जी के राज में लोकतंत्र महज मोदीतंत्र रह गया है। देश का संविधान, अर्थव्यवस्था, क़ानून व्यवस्था और सारा सामाजिक तानाबाना – सब बस मोदी जी के इशारे पर चल रहे हैं, और इस मोदीतंत्र का मेनस्ट्रीम मीडिया खुला समर्थन कर रहा है। मोदीतंत्र में मोदी जी को ऐतिहासिक बताकर देश के इतिहास को बदनाम करने और बदलने का प्रयास तेजी से किया जा रहा है।

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