संविधान को लेकर पहली बार निरक्षर और बेघर गरीब लोग भी बातें कर रहे, यही है इस आंदोलन की खासियत

नरेंद्र मोदी सत्ता में वापस आए लेकिन एक अंतर के साथ। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह बतौर गृह सरकार में शामिल हुए और उन्होंने हिंदुत्व के एजेंडे को पूरा करने के लिए नया अभियान आरंभ किया। विरोध को अनसुना कर एक के बाद एक विभाजित करने वाले खतरनाक ढीठ कदम उठाए गए।

फोटोः सोशल मीडिया
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मृदुला मुखर्जी

नब्बे साल पहले। 26 जनवरी, 1930। लाखों भारतीय महिलाएं, पुरुष और बच्चे शहरों के मैदानों, मुहल्लों और गांवों की चौपालों में बड़ी उम्मीदों के साथ जमा हुए थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आह्वान पर आए थे जिसने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में दिसंबर, 1929 के प्रसिद्ध लाहौर अधिवेशन में अपने लक्ष्य के तौर पर ब्रिटिश गुलामी से पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसने देशव्यापी नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फैसला किया था।

उस दिशा में पहले कदम के तौर पर गांधीजी ने आजादी का संकल्प पत्र तैयार किया था और लोगों से 26 जनवरी को आम सभाएं करने, स्थानीय भाषा में इस संकल्प पत्र को पढ़ने, राष्ट्रीय ध्वज फहराने को कहा गया था, जो उन्होंने उत्साहपूर्वक किया भी। तब से ही 26 जनवरी को हर साल स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा। 1947 में भारत ने 15 अगस्त को साम्राज्यवादी शासन से बहुप्रतीक्षित आजादी पाई और इसलिए 15 अगस्त तब से स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

लेकिन 26 जनवरी भारतीय जनता के दिलों में पवित्र दिन था। इसलिए जब संविधान ‘हम भारत के लोगों’ को ‘अपने को देने’ का मौका आया, तो इसे 26 जनवरी, 1950 को औपचारिक तौर अंगीकार किया गया, हालांकि इसे दो महीने पहले 26 नवंबर, 1950 को ही अंतिम रूप दे दिया गया था और इस पर हस्ताक्षर हो चुके थे। स्वतंत्रता दिवस अब आजादी के आंदोलन के लोकतांत्रिक और गणतंत्रवादी आदर्शों और भारतीय संविधान में उनके प्रतिफलन के संबंधों पर जोर देते हुए गणतंत्र दिवस बन गया।

सही अर्थों में, पूर्ण स्वराज 26 जनवरी, 1950 को ही हासिल किया गया जब संविधान लागू हुआ क्योंकि तब तक हम ब्रिटिश संसद से पारित इंडिपेंडेन्स ऑफ इंडिया एक्ट से शासित थे। हमने जो गणतंत्रवादी संविधान अंगीकार किया, उसने भारत को सार्वभौमिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतंत्र में संघटित किया और इसने न्याय, स्वातंत्र्य, समानता, और भाईचारे का वायदा किया।

पिछले सत्तर साल में कई उतार-चढ़ाव के दौरान अपने त्रुटिपूर्ण तरीकों से सरकारों और भारत के लोगों ने गणतंत्र की आधारशिला रखते समय सिद्धांतों का संदर्भ देते हुए काम किया है। न्यायपालिका ने भी, हालांकि हर वक्त समान रूप से नहीं, इन आधारशिलाओं को मजबूत करने में मदद की है, खास तौर से संविधान की मूल संरचना में छेड़छाड़ करने देने से रोकने को लेकर।

आपातकाल के बावजूद गणतंत्र खतरे में कभी नजर नहीं आया। यह यकीन था कि जन आंदोलन प्रभाव डालेंगे और लोक नीतियां उनके अनुरूप रहेंगे तथा विधायी कार्रवाइयां लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करेंगी। और एक तरह से, यह सच भी लगती थीं। सूचना के अधिकार के जन आंदोलन से काननू बना और यह दुनिया में दूसरी जगहों की तरह ही प्रगतिशील था। काम के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, बच्चों, आदिवासियों और जंगलों में रहने वालों के अधिकारों तथा पर्यावरण के खतरे के आंदोलनों को लेकर भी ऐसा ही हुआ।


गणतंत्र का यह पुच्छल तारा सीधा नहीं, त्रुटिपूर्ण भी रहा और कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन कुल मिलाकर इस शताब्दी के दूसरे दशक के मध्य से इसके गड़बड़ाने की शुरुआत हो गई। ‘अच्छे दिन’ के वायदे के साथ 2014 में सत्ता में आई वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था की सैद्धांतिक मजबूती वह थी जो गणतंत्र के मूलभूत मूल्यों के विपरीत है। हिंदू राष्ट्र की स्थापना के उद्देश्य से 95 साल पहले स्थापित संगठन से प्रेरित बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ने मुसलमानों पर लव-जिहाद का आरोप लगाने, उनकी घर वापसी की मांग करने और इससे भी अधिक, माॅब लिंचिंग का दौर चलाकर संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खुले उल्लंघन करने वालों की तरफ से आंखें मूंद ली।

माॅब लिंचिंग के दौर की गिरफ्त में पूरा देश रहा। विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री गोरक्षा के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगे जबकि डेयरी रखने वाले कई मुस्लिम किसानों की एक जगह से दूसरी जगह पशु ले जाते हुए यह आरोप लगाकर मार डाले जाने लगे कि वे इनकी हत्या करने के लिए ले जा रहे हैं। स्थानीय पुलिस इन हत्याओं के शिकार लोगों के खिलाफ ही मामले दर्ज कर गुपचुप सहयोग देने लगी और अपराधियों के साथ मिलीभगत करने लगी।

नोटबंदी के तौर पर प्रस्तुत विनाशकारी आर्थिक नीतियों, काफी कम सोच-विचार से लादी गई जीएसटी और बढ़ती बेरोजगारी ने आशा पैदा की कि मई, 2019 में होने वाले आम चुनावोॆं के जरिये कुछ राहत मिलेगी। लेकिन कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर हुए आतंकी हमले और बाद में बालाकोट में हुई कथित सर्जिकल स्ट्राइक के नाम पर कट्टर राष्ट्रवाद वाली भावना उभारी गई और बीजेपी की सत्ता में वापसी हो गई, जबकि गणतंत्र को राहत मिलने की सभी आशाएं समाप्त हो गईं।

नरेंद्र मोदी वापस आए लेकिन एक अंतर के साथ। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह गृह मंत्री के तौर पर सरकार में शामिल हुए और उन्होंने हिंदुत्व के एजेंडे को पूरा करने के लिए नया अभियान आरंभ किया। विरोध को अनसुना कर मुस्लिम महिलाओं की रक्षा के नाम पर तीन तलाक को अपराध बनाते हुए काननू पारित हुआ। भारत में कश्मीर को शामिल करने के आधार- अनुच्छेद 370 को 5 अगस्त को रद्द करना और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा कम कर और इससे लद्दाख को अलग कर पूर्ण राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित करने वाला सबसे ढीठ कदम उठाया गया। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, इंटरनेट और मोबाइल फोन बंद कर दिए गए, अधिकतर हिस्सों में कर्फ्यू लगा दिया गया और यह सब आतंकी हमले रोकने के नाम पर किए गए। भारतीय संसद के सदस्यों तक को घाटी जाने की अनुमति नहीं दी गई।


इसके बाद नवंबर के आरंभ में अयोध्या पर बहुप्रतीक्षित फैसला आया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि ध्वस्त कर दी गई बाबरी मस्जिद की जगह हिंदुओं को राममंदिर निर्माण के लिए दे दी जाए। कई लोगों को लगा कि यह हिंदू बहुमत भावना से प्रेरित और बर्बरता को पुरस्कृत करने वाला है। अंतिम धक्का दिसंबर, 2019 में पड़ा। खुद गृहमंत्री ने एक के बाद एक कर संसद के दोनों सदनों से रिकाॅर्ड समय में विवादास्पद नागरिकता संशोधन विधेयक पारित कराने में व्यक्तिगत तौर पर नेतृत्व किया और यह भी घोषणा की कि यह देशव्यापी एनआरसी से पहले का कदम है।

इस काननू ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले अवैध प्रवासियों को नागरिकता देने के लिए धर्म के आधार पर योग्यता को आधार बताया, लेकिन संभावित नागरिकों से मुसलमानों को बाहर कर दिया। एनआरसी में सभी निवासियों को नागरिकता के प्रमाण देने हैं, अन्यथा उन्हें अयोग्य बता दिया जाएगा। यह आखिरी प्रहार साबित हुआ। इसे संविधान पर गंभीर आघात, इसके मूलभूत मूल्यों के उल्लंघन, मुस्लिम अल्पसंख्यक और गरीब पर हमले के तौर पर देखा गया। इसका विरोध शुरू हो गया।

सबसे पहले दिल्ली में जामिया में विद्यार्थियों के बीच, और जब जामिया के विद्यार्थियों पर पुलिस ने बर्बर हमला किया, तो यह एएमयू- जैसे दूसरे परिसरों में तेजी से फैला और जब यहां भी पुलिस ने हमला किया, तो गुस्सा भड़क गया और पूरे देश में हजारों लोग सड़कों पर आ गए। बदले में, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की पिटाई की, उनके घरों में घुस गई और व्यक्तिगत संपत्ति का नुकसान पहुंचाया, और कुछ स्थानों पर गोली भी चलाई। सबसे बड़े राज्य- उत्तर प्रदेश, के मुख्यमंत्री ने तो प्रदर्शनकारियों से बदला लेने तक की बात की। यहां पुलिस की गोलियों से बीस से अधिक लोग मारे गए जिनमें अधिकांशतः गरीब मुस्लिम पुरुष थे।

इन सबसे विचलित हुए बिना, हैदराबाद, मंगलुरु, बेंगलुरु, केरल, मुंबई और महाराष्ट्र के कई छोटे शहरों, कोलकाता, असम और पूर्वोत्तर के अन्य शहरों तथा बिहार एवं अन्य राज्यों के कई शहरों में लोग भारी संख्या में निकल आए। अनिश्चितकालीन धरने शुरू हो गए। दिल्ली के शाहीन बाग में शुरू हुआ धरना एक महीना बाद भी इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है। यहां निम्न आय और कम शिक्षित वर्गाों की वैसी महिलाएं भी धरने में शामिल हैं जो इससे पहले कभी भी विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए अपने घर से बाहर नहीं निकली थीं। इससे ही समझा जा सकता है कि उनमें कितना गुस्सा है।


इन विरोध-प्रदर्शनों की उल्लेखनीय बात यह है कि यह अब भी जोर-शोर से जारी है और इनमें नारों के तौर पर गणतंत्र और इसके प्रतीकों, संविधान और राष्ट्रीय झंडे का इस्तेमाल हो रहा है। युवा और वृद्ध, महिलाएं और पुरुष, और खास तौर से महिलाएं और युवा जन सभाओं में संविधान की प्रस्तावना का पाठ कर रहे हैं, प्रदर्शनकारी संविधान की प्रतियों को साथ रखते हैं और उन्हें लहराते हैं, राष्ट्रीय झंडे साथ रखते हैं और एक स्वर में राष्ट्रगान गाते हैं। वे राष्ट्रपिता गांधी, संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का नेतृत्व करने वाले आंबेडकर और आजादी के आंदोलन के अन्य नायकों- भगत सिंह, अशफाकुल्ला और बिस्मिल के चित्र भी रखे रहते हैं।

अपने को अंगीकार किए जाने के बाद से संविधान पहली बार लोगों का दस्तावेज बन गया है, इसे लेकर सड़कों-गलियों पर निरक्षर और बेघर गरीब लोग बातें कर रहे हैं। गणतंत्र के संस्थापक अगर वर्तमान स्थिति को देख सकते, तो निश्चित तौर पर प्रसन्न होते कि यह पवित्र किताब आखिरकार उन तक पहुंच गई जिन तक इन्हें पहुंचाने का मकसद था, जिन्हें इसने गणतंत्र का नागरिक बनाया और इनसे छीनने की कोशिश करने वालों के खिलाफ आज ये पूरी शक्ति से इस पर फिर दावा कर रहे हैं। अच्छाई और बुराई के खिलाफ युगों पुराना संघर्ष आज भी चल रहा है।

(लेखिका वरिष्ठ इतिहासकार हैं)

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