संसद सत्र ने हमारे लोकतंत्र की कमजोरियों को उघाड़ा, सिर्फ किसान नहीं, पूरे लोकतंत्र पर संकट

हाल में हुए संसद सत्र में प्रधानमंत्री ने जिस कथित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की घोषणा की, वह ‘न्यू इंडिया के विचार’ का रूपक होगा! इसका मुख्य लक्ष्य उस व्यवस्था और उन मूल्यों को तहस-नहस करना है जो एक शताब्दी से भी अधिक के आजादी के आंदोलन के दौरान विकसित हुए।

फोटोः सोशल मीडिया
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कुमार केतकर

अमेरिका और यूरोप के राजनीतिक विद्वान तथा बुद्धिजीवी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के दो प्रोफेसर स्टीवन लेवित्स्की और डैनिएल जिबालत की किताब “हाउ डेमोक्रेसीज डाईः वॉट हिस्ट्री रिवील्स अबाउट फ्यूचर” से पैदा हुई गरमागरम बहस में उलझे हुए हैं। 2016 में चुनाव के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बनने वाले डोनाल्ड ट्रंप के कामकाज के बाद पैदा हुए खतरे को लेकर 2018 में प्रकाशित इस किताब ने घंटी बजा दी। लेखकों का तर्क है कि दुनिया के कई देशों की तरह अमेरिका के ‘समृद्ध’ लोकतंत्र के भी डूबने का खतरा पैदा हो गया है।

जब अपना देश आजाद हुआ था और इसने घोषणा की थी कि हमारे यहां संसदीय लोकतंत्र होगा, तो पश्चिम देशों, खास तौर से ब्रिटेन और अमेरिका के कई प्रमुख बुद्धिजीवियों ने या तो इस विचार का उपहास उड़ाया था या इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू का ‘रूमानी विचार’ बताया था। वे सारी आशंकाएं गलत साबित हुईं। निश्चित तौर पर कई बार गंभीर संकट आए, काफी उत्थान-पतन भी हुए, प्रधानमंत्री और कई राष्ट्रीय नेताओं की हत्याएं हुईं, नगा और मिजो से लेकर खालिस्तान आंदोलन तक कई बार संघीय एकता को अलगावादियों ने चुनौती दी, लेकिन उन सबसे हम उबर गए। भले ही परिभाषा में अस्पष्ट लेकिन अनुभव में काफी ठोस ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ बचा रह सका क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तौर पर आजादी के आंदोलन की विरासत हमारे पास थी। संसदीय लोकतंत्र उस विचार का अभिन्न अंग था।

2022 में भारत अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाएगा। लेकिन फिर से, गंभीर आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं कि क्या देश 2047 में आजादी के शताब्दी वर्षगांठ तक राजनीतिक और भौगोलिक रूप से सार्वभौम, एकजुट और अविभाज्य रह पाएगा। पहले एक सैद्धांतिक केंद्र बना हुआ था और उस सैद्धांतिक संघटन की विषय वस्तु धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, अनेकता, उदारवाद, संस्थागत स्वायत्ता और संघटन की स्वतंत्रता के साथ-साथ मीडिया की आजादी के विचार से बनी थी।

लेकिन 2014 में होने वाले ‘शासन परिवर्तन’ में धर्मनिरपेक्षता के गौरव और उसकी अनिवार्यता को नीचा दिखाकर, ’एक राष्ट्र’ के नाम पर संघवाद को तहस-नहस कर, गुटनिरपेक्षता के औचित्य पर सवाल उठाकर और बहु-शक्ति वाली दुनिया में एक सुपरपावर गठबंधन में ढिठाई के साथ शामिल होकर, योजनाबद्ध और मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीतियों को उठा फेंककर तथा बहुमतवाद के विचार को अंगीकार कर सत्ताधारी पार्टियों ने संसदीय लोकतंत्र और एकीकृत भारत पर खतरों को खुद ही तैयार किया है या उनका विस्तार किया है।

अभी सितंबर में कोरोना वायरस की महामारी की काली छाया में हुए संसदीय सत्र ने अपने लोकतंत्र की कमजोरियों को साफ तौर पर दिखाया है। प्रधानमंत्री ने जिस कथित सेंट्रल विस्टा परियोजना की घोषणा की है, वह ‘न्यू इंडिया के विचार’ का रूपक होगा! संसद के लिए नए भवन के साथ कई मंत्रियों तथा प्रधानमंत्री आवास के नए भवन वस्तुतः नए गणतंत्र की पुनर्रचना के लक्ष्य वाले हैं। इसका मुख्य लक्ष्य उस व्यवस्था और उन मूल्यों को तहस-नहस करना है जो एक शताब्दी से भी अधिक के आजादी के आंदोलन के दौरान विकसित हुए।

‘कांग्रेस-मुक्त’ भारत का नारा भरमाने वाला है। इसका वास्तविक लक्ष्य महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में हुए आजादी के आंदोलन के संघर्ष की पूरी प्रकृति के इतिहास और याददाश्त को पूर्णतः मिटाना है। इस योजना के मोहरे के तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ हिन्दुत्व की विचारधारा को स्थापित करना कोई इतना छिपा हुआ एजेंडा भी नहीं है।

साल 2022 इस योजना में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। यह आजादी की 75वीं वर्षगांठ का साल होगा और 1950 में हमने जिस गणतंत्र को अंगीकार किया था, उसे नीचा दिखाने वाले नए गणतंत्र की स्थापना के लिए नया ‘मुहूर्त’ होगा। उस साल नया संसदीय भवन काम करने लगेगा। वर्तमान राष्ट्रपति का कार्यकाल उसी साल खत्म हो रहा है। संसदीय लोकतंत्र की जगह पर ‘लोकतंत्र की राष्ट्रपतीय प्रणाली’ की या तो शुरुआत होगी या उसकी नियमित तौर पर स्थापना कर दी जाएगी। इसके लिए जिस चीज की जरूरत है, वह है संवैधानिक परिवर्तन।

अपने जनसंघ के दिनों से ही भारतीय जनता पार्टी संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ तर्क देती रही है। भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहता है कि वह सांस्कृतिक संगठन है, उसके बड़े पदाधिकारी संसदीय लोकतंत्र के विचार को नेहरूवादी स्वीकृति की बराबर आलोचना करते हैं। वे संवैधानिक बाधाओं को लेकर न तो चिंतित हैं, न आशंकित।

अफवाह के तौर पर उनके पास पहले ही रिपोर्ट हैं कि नरेंद्र मोदी, रामनाथ कोविंद को हटाकर या इस व्यवस्था को ही बदलकर राष्ट्रपति बन जाएंगे। यह राष्ट्रपति वाली तानाशाही होगी या एक राष्ट्र-एक चुनाव में एक पार्टी- एक नेता वाला लोकतंत्र होगा! संसद के सितंबर वाले सत्र ने पिटारा खोल दिया है। लेवित्स्की और जिबालत ने लोकतंत्रों के समाप्त होने के वैश्विक ट्रे्ंड को लेकर जो आशंका प्रकट की है, क्या भारत भी उसका ही शिकार हो जाएगा?

(लेखक राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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