कश्मीर को मिटाने पर तुले हैं वे लोग, जिनकी उसे बनाने में कोई भूमिका नहीं

कश्मीर पर जवाहरलाल- सरदार पटेल-शेख अब्दुल्ला की त्रिमूर्ति को गांधीजी का आधार मिला और आगे की वह कहानी लिखी गई जिसे रगड़-पोंछ कर मिटाने में आज सरकार लगी है। जिन्होंने बनाने में कुछ नहीं किया, वे मिटाने के उत्तराधिकार की घोषणा कर रहे हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
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कुमार प्रशांत

आजादी दरवाजे पर खड़ी थी लेकिन दरवाजा अभी बंद था। जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल रियासतों के एकीकरण की योजना बनाने में जुटे थे। रियासतें किस्म-किस्म की चालों और शर्तों के साथ भारत में विलय की बातें कर रही थीं। जितनी रियासतें, उतनी चालें! और, एक और चाल भी थी जो साम्राज्यवादी ताकतें चल रही थीं। लेकिन वहां एक फर्क आ गया था। कभी इसकी बागडोर इंग्लैंड के हाथ होती थी। अब वह इंग्लैंड के हाथ से निकलकर, अमेरिका की तरफ जा रही थी। दुनिया धुरी बदल रही थी।

औपनिवेशिक साम्राज्यवादी ताकतों का सारा ध्यान इस पर था कि भारत न सही, भागते भूत की लंगोटी ही सही! तो हिसाब लगाया जा रहा था कि भारत भले छोड़ना पड़े लेकिन वह कौन-सा सिरा अपने हाथ में दबा लें हम कि जिससे एशिया की राजनीति में अपनी दखलंदाजी बनी रह सके। और मुद्दा यह भी था कि आजाद होने जा रहे भारत पर भी जहां से नजर रखने में सहूलियत हो। तो जिन्ना साहब समझ रहे थे कि अंग्रेज उनके लिए पाकिस्तान बना रहे हैं जबकि सच यह था कि वे सब मिलकर अपने लिए पाकिस्तान बना रहे थे।

साम्राज्यवादी ताकतें खूब समझ रही थीं कि जिन्ना को पाकिस्तान मिलेगा, तभी पाकिस्तान उन्हें मिलेगा। और पाकिस्तान के भावी भूगोल में कश्मीर का रहना जरूरी था क्योंकि वह भारत के मुकुट को अपनी मुट्ठी में रखने-जैसा होगा। 1881 से लगातार साम्राज्यवाद यह जाल बुन रहा था। अब सार्वजनिक हुए कई दस्तावेज इस षड्यंत्र का खुलासा करते हैं। यह सच्चाई उधर मालूम थी, तो इधर भी मालूम थी। सरदार साहब को मुस्लिम-बहुल कश्मीर में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी और वे कश्मीर से हैदराबाद का सौदा करने की बात कह भी चुके थे। लेकिन इतिहास में दर्ज है कि एकाध बार से ज्यादा सरदार इस तरह नहीं बोले हैं। यह चुप्पी एक रणनीति के तहत बनी थी। भारतीय नेतृत्व समझ रहा था कि कश्मीर के पाकिस्तान में जाने का मतलब पश्चिमी ताकतों को एकदम अपने सर पर बिठा लेना होगा।

आजाद होने से पहले ही, जवाहरलाल नेहरू की पहल पर एशियाई देशों का जो सम्मेलन भारत ने आयोजित किया था, उसमें महात्मा गांधी ने भी हिस्सा लिया था और उसमें ही यह पूर्व पीठिका बनी और स्वीकृत हुई थी कि स्वतंत्र भारत की विदेश-नीति का केंद्रीय मुद्दा साम्राज्यवादी ताकतों को एशियाई राजनीति में दखलंदाजी करने से रोकना होगा। इसलिए कश्मीर को पाकिस्तान में जाने से रोकने की बात बनी। यह भारत सरकार की सामूहिक भूमिका थी। बाकी रियासतों के मामलों से इसलिए कश्मीर का मामला अलग रखा गया था। इसमें जवाहरलाल-सरदार की पूर्ण सहमति थी। लेकिन यह तो हमारी रणनीति थी। दूसरे भी थे जिनकी दूसरी रणनीतियां थीं।

जिन्ना साहब ने अपना दांव चला और उन्होंने कश्मीर पर हमला कर दिया। उनकी इस मूढ़ता ने कश्मीर को उस तरह और उतनी तेजी से भारत की तरफ धकेल दिया जिसकी पहले संभावना नहीं थी। नेहरू-सरदार ने इसे ईश्वर का भेजा अवसर ही समझा और फिर आगे वह इतिहास बना जिसके तहत कश्मीर हमारे साथ आ जुड़ा।

वहां के नौजवान नेता शेख मुहम्मद अब्दुल्ला राजशाही के खिलाफ लड़ रहे थे और कांग्रेस के साथ थे। नए ख्यालात वाले ऐसे तमाम नौजवान जिस तरह जवाहरलाल के निकट पहुंचते थे, वैसे ही शेख भी जवाहरलाल के हुए। रियासतों के भीतर चल रही आजादी की जंग से जवाहरलाल खास तौर पर जुड़े रहते थे। स्थानीय आंदोलन की वजह से जब महाराजा हरि सिंह ने शेख मुहम्मद अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया था, तो नाराज जवाहरलाल उसका प्रतिकार करने कश्मीर पहुंचे थे। राजा ने उन्हें भी उनके ही गेस्टहाउस में नजरबंद कर दिया था। तो महाराजा के लिए जवाहरलाल भड़काऊ लाल झंडा बन गए थे।

अब, जब विभाजन भी और आजादी भी आन पड़ी थी तो वहां कौन जाए जो मरहम का भी काम करे और विवेक भी जगाए? माउंटबेटन ने प्रस्ताव रखाः क्या हम बापूजी से वहां जाने का अनुरोध कर सकतेहैं? महात्मा गांधी पहले कश्मीर कभी नहीं जा सके थे। जब-जब योजना बनी, किसी-न- किसी कारण अटक गई। जिन्ना साहब भी एक बार ही कश्मीर गए थे जब टमाटर और अंडों से उनका स्वागत हुआ था। गुस्सा यूं था कि यह जमींदारों और रियासत का पिट्ठू है!

प्रस्ताव माउंटबेटन का था, जवाब गांधी सेआना था। अब उम्र 77 साल थी। सफर मुश्किल था लेकिन देश का सवाल था तो गांधी के लिए मुश्किल कैसी! वे यह भी जानते थे कि आजाद भारत का भौगोलिक नक्शा मजबूत नहीं बना तो रियासतें आगे नासूर बन जाएंगी। वे जाने को तैयार हो गए। किसी ने कहाः इतनी मुश्किल यात्रा क्या जरूरी है? आप महाराजा को पत्र लिख सकते हैं! कहने वाले की आंखों में देखते हुए वे बोलेः “ हां, फिर तो मुझे नोआखली जाने की भी क्या जरूरतथी! वहां भी पत्र भेज सकता था। लेकिन भाई, उससे काम नहीं बनता है।”

आजादी से मात्र 14 दिन पहले, रावलपिंडी के दुर्गम रास्ते से महात्मा गांधी पहली और आखिरी बार कश्मीर पहुंचे। जाने से पहले, 29 जुलाई, 1947 की प्रार्थना-सभा में उन्होंने खुद ही बताया कि वे कश्मीर जा रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैं यह समझाने नहीं जा रहा हूं कि कश्मीर को भारत में रहना चाहिए। वह फैसला तो मैं या महाराजा नहीं, कश्मीर के लोग करेंगे। कश्मीर में महाराजा भी हैं, रैयत भी है। लेकिन राजा कल मर जाएगा तो भी प्रजा तो रहेगी। वह अपने कश्मीर का फैसला करेगी।”

1 अगस्त, 1947 को महात्मा गांधी कश्मीर पहुंचे। तब के वर्षों में घाटी में लोगों का वैसा जमावड़ा देखा नहीं गया था जैसा उस रोज जमा हुआ था। झेलम नदी के पुल पर तिल धरने की जगह नहीं थी। गांधी की गाड़ी पुल से होकर श्रीनगर में प्रवेश कर ही नहीं सकी। उन्हें गाड़ी से निकालकर नाव में बिठाया गया और नदी के रास्ते शहर में लाया गया। दूर-दूर से आए कश्मीरी लोग यहां-वहां से उनकी झलक देख कर तृप्त हो रहे थे- “बस, पीर के दर्शन हो गए!”

शेख अब्दुल्ला तब जेल में थे। बापू का एक स्वागत महाराजा ने अपने महल में आयोजित किया था तो नागरिक स्वागत का दूसरा आयोजन बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला ने किया था। महाराजा हरिसिंह, महारानी तारा देवी तथा राजकुमार कर्ण सिंह ने महल से बाहर आकर उनकी अगवानी की थी। उनकी खानगी बातचीत का कोई खास पता तो नहीं है लेकिन बापू ने बेगम अकबर जहां के स्वागत समारोह में खुलकर बात कहीः इस रियासत की असली राजा तो यहां की प्रजा है। वह पाकिस्तान जाने का फैसला करे तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती है। लेकिन जनता की राय भी कैसे लेंगे आप? उसकी राय लेने के लिए वातावरण तो बनाना होगा न! वह आराम से और आजादी से अपनी राय दे सके, ऐसा कश्मीर बनाना होगा। उस पर हमला कर, उसके गांव-घर जलाकर आप उसकी राय तो ले नहीं सकते हैं! प्रजा कहे कि भले हम मुसलमान हैं लेकिन रहना चाहते हैं भारत में, तो भी कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती है। अगर पाकिस्तानी यहां घुसते हैं तो पाक की हुकूमत को उनको रोकना चाहिए। नहीं रोकती है तो उस पर इल्जाम तो आएगा ही!

बापू ने फिर भारत की स्थिति साफ कीः कांग्रेस हमेशा ही राजतंत्र के खिलाफ रही है- वह इंग्लैंड का हो कि यहां का। शेख अब्दुल्ला लोकशाही की बात करते हैं, उसकी लड़ाई लड़ते हैं। हम उनके साथ हैं। उन्हें जेल से छोड़ना चाहिए और उनसे बात कर आगे का रास्ता निकालना चाहिए। कश्मीर के बारे में फैसला तो यहां के लोग ही करेंगे। फिर गांधी जी यह भी साफ करते हैं कि ‘यहां के लोग’ से उनका मतलब क्या है- यहां के लोगों से मेरा मतलब है यहां के मुसलमान, यहां के हिंदू, कश्मीरी पंडित, डोगरा लोग तथा यहां के सिख!

यह कश्मीर के बारे में भारत की पहली घोषित आधिकारिक भूमिका थी। गांधी जी सरकार के प्रवक्ता नहीं थे क्योंकि स्वतंत्र भारत की सरकार अभी तो औपचारिक रूप से बनी भी नहीं थी। लेकिन वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों के जनक और स्वतंत्र भारत की भूमिका के सबसे आधिकारिक प्रवक्ता थे, इससे कोई इंकार कर ही कैसे सकता था। गांधीजी के इस दौरे ने कश्मीर को विश्वास की ऐसी डोर से बांध दिया कि जिसका नतीजा शेख अब्दुल्ला की रिहाई में, भारत के साथ रहने की उनकी घोषणा में, कश्मीरी मुसलमानों में घूम-घूमकर उन्हें पाकिस्तान से विलग करने के अभियान में दिखाई दिया।

जवाहरलाल- सरदार पटेल-शेख अब्दुल्ला की त्रिमूर्ति को गांधीजी का आधार मिला और आगे की वह कहानी लिखी गई जिसे रगड़-पोंछ कर मिटाने में आज सरकार लगी है। जिन्होंने बनाने में कुछ नहीं किया, वे मिटाने के उत्तराधिकार की घोषणा कर रहे हैं। और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जब फौजी ताकत के बल पर पाकिस्तान ने कश्मीर हड़पना चाहा था और भारत सरकार ने उसका फौजी सामना किया था, तब महात्मा गांधी ने उस फौजी अभियान का समर्थन किया था।

(इस लेख में विचार लेखक के हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हैं)

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