आकार पटेल का लेख: समाज और देश की सेवा करने वालों को सम्मानित करने के बजाए जेल में डाल कर किसका भला कर रही है सरकार!

पूरी दुनिया देख रही है कि कैसे सरकार के विपरीत दृष्टिकोण वाले व्यक्तियोंसे बदला लिया जा रहा है। कानून या कानूनों की विनाशकारी शक्ति का जिस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है उससे हमारे देश के एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र बनने की हमारी यात्रा और कठिन हो जाएगी।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

मोहम्मद जुबैर को जेल में डाले जाने की घटना भारत सरकार द्वारा देश के नागरिकों पर थोपे जा रहे न्यायिक गर्भपात की एक ताजा मिसाल है। मैं ‘भारत सरकार’ शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि भले ही कानून-व्यवस्था राज्यों का विषय है, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह के अधीन काम करने वाली केंद्र सरकार की एजेंसियां लगातार अपने अदिकारों का दुरुपयोग करते हुए बिना किसी मुकदमे या अदालती फैसले के ही नागरिकों के जीवन को तबाह करने में जुटी हैं।

जुबैर एक फैक्टचैकर हैं और आल्टन्यूज के संस्थापक हैं। यह ऐसी वेबसाइट है जो विशाल मीडिया जगत की फेक न्यूज की पोल खोलने का काम करती है। जुबैर एक ऐसे हास्यास्पद आरोप में जेल में डाल दिए गए हैं, जिसे यहां बताना भी मुनासिब नहीं है। जुबैरे के खिलाफ कोई असली शिकायत भी नहीं हुई है, सिवाए इसके कि किसी अनजान से व्यक्ति ने एक ट्वीट फॉर्वर्ड किया और बीजेपी ने उन्हें जेल में डाल दिया, जबकि जिस ट्वीट के आधार पर उन्हें जेल में डाला गया वह अभी भी मौजूद है। सरकार ने पुलिस को उनके घर भेजा और बिना किसी कारण के उनका सामान जब्त कर लिया गया।

आखिर सरकार ऐसा क्यों कर रही है? निश्चित रूप से उसकी मंशा लोगों को प्रताड़ित करने और परेशान करने की है। जुबैर ऐसे शख्स हैं जिन्होंने बीजेपी की महिला प्रवक्ता द्वारा एक धार्मिक गुरु पर की गई टिप्पणियों को सामने रखा था, और इसी टिप्पणी के चलते सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। सरकार की सारी कार्रवाई सिर्फ और सिर्फ देश के नागरिकों के खिलाफ प्रतिशोध के सिवा कुछ नहीं है।

कानूनविद् फैज़ान मुस्तफा ने लिखा है, “आपराधिक कानून जोकि सुरक्षा के साधान का वादा करता है, उसे सिर्फ नष्ट करने की शक्ति के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि इसी कानून में उचित प्रक्रिया की गांरटी को शामिल किया गया था ताकि हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई मिल सके।”

भारत में किसी के भी निर्दोष होने की धारणा को उठाकर फेंका दिया गया है और उसे दोषी ठहराने की धारणा से बदल दिया गया है। यही कारण है कि हर मामले में जेल भेजना का काम पहले किया जा रहा है और बाकी सबकुछ बाद में। जुबैर को जेल भेजे जाने का कोई कारण नहीं है। ऐसे ही आर्यन खान को भी जेल भेजे जाने का कोई कारण नहीं था जबकि उसके पास से न तो कोई ड्रग मिला था और न ही इसे रखने का कोई सबूत। तीस्ता सीतलवाड, रिया चक्रवर्ती और नवाब मलिक को भी जेल भेजने का कोई कारण नहीं है। सिवाए इसके कि इन लोगों की गिरफ्तारी को तमाशा बना जाए और और आम लोगों के मुकाबले सरकार के पास जो असीमित शक्तियां है उन्हें लोगों पर इस्तेमाल किया जाए।


आपराधिक न्यायिक प्रणाली में सारे कार्ड सरकार के ही पास हैं। उसके पास अभियोजन पक्ष है, पुलिस है, अदालतें हैं और यहां तक कि जज भी हैं जोकि सरकार ही नियुक्त करती है। आरोपी अकेला खड़ा है। यही कारण है कि न्याय प्रणाली में अभियुक्तों के पक्ष में और राज्य के खिलाफ सुरक्षा के उपाय हैं। इसलिए कहा जाता है कि, ‘जब तक दोष सिद्ध न हो तब तक हर कोई निर्दोष है’ और इसलिए किसी को दोषी साबित करना या किसी आपराधिक गतिविधि को साबित करने का जिम्मा सरकार का है।

भारत में कई कानूनों के बुनियादी सिद्धांतों को पलट दिया गया है और ऐसा सिर्फ बीजेपी के शासन में ही नहीं हो रहा है। यूएपीए (आंतकवाद के मामले में), एनडीपीएस (ड्रग्स के मामले में), पीएमएलए (मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में) और यहां तक कि नागरिकता के मामले में (असम का एनआरसी) भी किसी भी व्यक्ति का दोष सिद्ध करने का काम सरकार का है। कई राज्यों में उनके अपने सख्त कानून हैं मसलन गुजरात के गुजकोका (संगठित अपराध के लिए) में जमानत की शर्त को इतना मुश्किल बनाया गया है कि जमानत मिलना एक तरह से असंभव ही है। लेकिन इन कानूनों के बिना भी भारत में यह जिम्मा नागरिकों पर ही छोड़ दिया गया है, जैसा कि जुबैर के केस में हम देख रहे हैं। और सरकार अपने विध्वंसकारी शक्तियों के मद में चूर है। यह बहुत खतरनाक है और अगर न्यायपालिका इसे रोक नहीं सकती तो वह देश-समाज का बड़ा नुकसान कर रही है।

सरकार की रूचि मुकदमा चलाने में नहीं है, जैसा कि हमने कई सेलेब्रिटीज़ के मामलों में देखा है, जिन्हें हफ्तों तक जेल में रखा गया और जमानत नहीं दी गई। किन जब एक बार जब वे जमानत हासिल कर लेते हैं, तो सरकार आमतौर पर इनमें रुचि खो देती है और मामला बदल जाता है। यह रुख या रवैया कानून के शासन या संविधान को बनाए रखने का नहीं है। बल्कि इसका है कि किसी को कैसे परेशान किया जाए और पहली ही बार में उन्हें जेल में कैसे रखा जाए।

कई लोग हैं जिन्हें इस बात में आनंद आ रहा है कि सीतलवाड जैसी एक्टिविस्ट और जुबैर जैसे पत्रकार बिना दोष सिद्धी के जेल में बंद हैं। इन लोगों को एहसास होना चाहिए कि एक संवैधानिक लोकतंत्र या आधुनिक देश में ऐसे कृत्यों से कोई लाभ नहीं होता है। पूरी दुनिया देख रही है कि देश में जो गुस्से की स्थिति है उसमें कैसे सरकार के विपरीत दृष्टिकोण वाले व्यक्तियोंसे बदला लिया जा रहा है। कानून या कानूनों की विनाशकारी शक्ति का जिस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है उससे हमारे देश के एक विकसित और समृद्ध राष्ट्र बनने की हमारी यात्रा और कठिन हो जाएगी।


मैंने यहां एक बार भी उन अच्छे कामों का जिक्र नहीं किया है जो मोहम्मद जुबैर देश के लिए कर रहे थे। वह एक असली हीरो हैं और उन्होंने अपने साझीदार प्रतीक सिन्हा के साथ जो काम किए हैं उसके लिए उन जैसे व्यक्तियों को दूसरे देशों में सम्मानित किया जाता। लेकिन हमारे समय की यह अफसोसनाक स्थिति है कि एक नेक काम करने वालों पर सरकार और समाज का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ अपमानित कर रहा है बल्कि उनके खिलाफ नफरत का माहौल भी बनाया जा रहा है। यह न्यू इंडिया है, जहां हीरो और हीरोइनों को अपमानित कर जेल में डाला जा रहा है और यह काम एक ऐसी सरकार कर रही है जो अपने ही लोगों को खिलाफ है।

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