विष्णु नागर का व्यंग्यः हिंदू होना तो आज के दौर में मोदी-शाह-योगी होना ही है...

सभी हिंदू ‘भले’ होते हैं- मोदी, अमित शाह जी, योगी होते हैं। मैं इसमें जानबूझकर जवाहरलाल नेहरू का नाम शामिल नहीं कर रहा हूं। महात्मा गांधी का नाम भी इस सूची से बाहर रख रहा हूं, क्योंकि या तो मोदी जी एंड पार्टी भली हो सकती है या महात्मा गांधी और नेहरू जी!

फोटोः सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

लो जी चुनाव प्रचार के दिन आ गए। मोदी-शाह के ऊबाऊ-भड़काऊ-दोहराऊ भाषण के 'अच्छे दिन' आ गए। मतलब पाकिस्तान, देशद्रोह, आतंकवाद पर बक-बक करने के दिन आ गए। इसी क्रम में हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकते, यह दोहराने-तिहराने-भुनाने के दिन भी आ गए।

वैसे देश में न कोई कह रहा था और न कोई पूछ रहा था कि फलां धर्म के लोग आतंकवादी होते हैं या नहीं होते हैं, लेकिन मोदी जी और उनके भ्राता शाह जी कहीं से, कुछ भी निकालकर परोसने की कला में निपुण हैं। भ्राता जी ने तो यहां तक कह दिया कि हिंदू इतने अधिक भले जीव होते हैं कि चींटी तक को नहीं मारते बल्कि उसे शक्कर खिलाते हैं।

वैसे हम तो कभी इतने भले नहीं रहे। हमने चींटी को कभी शक्कर नहीं खिलाई और खाने लगीं तो उन्हें भगाया ही है। जन्मना हिंदू जरूर हूं, मगर मैंने खटमल, मच्छर और काक्रोच मारने में अपना यथासंभव योगदान दिया है, चाहे इसे कोई याद रखे या भूल जाए! मोदी जी और शाह जी जरूर इतने दयालु होंगे, रहे होंगे कि उन्होंने न कभी खटमल मारे होंगे, न मच्छर, न काक्रोच, न कोई और। वैसे तो खैर यह उन्हें देखकर ही स्पष्ट हो जाता है।

तो यह बहुत ही काबिले तारीफ बात है कि दुनिया में अकेले हिंदू ऐसी कौम बची है, जिसमें एक भी आतंकवादी नहीं पाया जाता। वैरी गुड। जब एक भी हिंदू आतंकवादी नहीं होता, हो भी नहीं सकता तो वे भला चोर-डाकू, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी, जातिवादी भी कैसे हो सकते होंगे! बिल्कुल नहीं होते होंगे। वैरी-वैरी गुड।

मतलब इस तरह के काम करने वाला एक भी हिंदू नहीं हो सकता। खटमल-मच्छर तो शायद मेरी तरह मारे होंगे, मगर आदमी को तो उन्होंने कभी भी, कहीं भी, किसी भी परिस्थिति में नहीं मारा होगा। युद्ध में भी नहीं, दंगों में भी नहीं! अगर किसी जांच आयोग ने ऐसा पाया है, किसी अखबार-टीवी चैनल ने ऐसा कभी भी कहा है तो यह असत्य है।

बैंकों का पैसा जिन्होंने खाने दिया और जिन्होंने उन्हें भाग जाने दिया, उनमें से भी कोई एक भी हिंदू नहीं रहा होगा। क्योंकि हिंदू होना मात्र 'सदगुणों की खान' होना है। मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, आसाराम, रामरहीम होना है। ऐसी हालत में जितनी भी 'सद्गुणों की खानें' आज जेलों में बंद हैं या जो बंद होने के करीब हैं, उन्हें कानून बनाकर रिहा कर देना चाहिए। जिन पर हत्या-बलात्कार आदि-इत्यादि के मुकदमे चल रहे हैं, उन्हें अविलंब वापस ले लेना चाहिए (चुनावी आचार संहिता का अचार या मुरब्बा डालकर)।

ऐसा नहीं है कि 58 महीनों में इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है, बहुत हुई है और हो भी रही है। लेकिन अभी तक इस मामले में अपना-पराया हिंदू देखा जा रहा है। अभी 'संपूर्ण हिंदू एकता' स्थापित नहीं हुई है। हो जाएगी तो सारी जेलें हिंदुओं से खाली हो जाएंगी, अदालतों का बोझ फूल सा हल्का हो जाएगा और भारत के हिंदू राष्ट्र बनने में जो भी बाधाएं आ रही हैं, वे दूर हो जाएंगी।

बहुत ही अच्छी बात है कि एक भी हिंदू आतंकवादी नहीं होता, हो भी नहीं सकता और होगा भी नहीं। यानी सभी हिंदू 'भले' होते हैं- मोदी जी, अमित शाह जी, योगी जी होते हैं। मैं इसमें जानबूझकर जवाहरलाल नेहरू का नाम शामिल नहीं कर रहा हूं। महात्मा गांधी का नाम भी इस सूची में बाहर रख रहा हूं, क्योंकि या तो मोदी जी एंड पार्टी भली हो सकती है या महात्मा गांधी और नेहरू जी!

हां तो खैर एक भी हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता, भला आदमी ही होता है। वह वचन का इतना पक्का होता है कि फौरन 15-15 लाख रुपये निकालकर हर हिंदुस्तानी को दे देता है। इस थ्योरी के हिसाब से नाथूराम गोडसे भी भला आदमी था।

उसे लगा होगा कि भारत भू पर एक ही युग में दो भले आदमी एक साथ नहीं रह सकते, इससे भारत माता का बोझ बहुत बढ़ जाएगा तो माता के इस कष्ट को दूर करने हेतु ही 'राष्ट्रप्रेम' के वशीभूत होकर उसने गांधीजी की हत्या की होगी। नहीं-नहीं, सॉरी 'वध' किया था और राष्ट्रप्रेम से संचालित होकर 'वध' करना, भले होने का प्रमाण है, जैसे नरसंहार कराना भी है।

सारे हिंदू भले होते हैं तो बाबू बजरंगी भी भला ही है। असीमानंद, कर्नल पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा तो खैर भले सिद्ध किए जा चुके हैं। मगर क्या ये हिंदू नामधारी 'अर्बन नक्सलाइट' सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरवर राव भी भले हैं? कन्हैया कुमार भी भला है? दलित होने के बावजूद क्या आनंद तेलतुंबड़े को भला माना जा सकता है? जवाब होगा- नहीं।

वैसे मोदी जी हिंदू में ऐसी क्या कमी होती है कि एक भी हिंदू आतंकवादी नहीं हो पाता? हां, अगर यह आपकी 'आस्था' का प्रश्न है, आपकी रामजन्मभूमि है तो मैं सवाल नहीं करूंगा, क्योंकि आस्था, तर्क को नहीं मानती। दोनों में जानी दुश्मनी सी है। हालांकि, आस्था काफी चालक होती है। जरूरत पड़ने पर आस्था, तर्क के झूठमूठ कपड़े भी पहन लेती है और दावा करती है कि वह नंगी नहीं है, उसने तर्क के कपड़े पहन रखे हैं। आस्था सिर पर चोटी बल्कि चोटा रखने और मांग में सिंदूर लगाने में भी विज्ञान ढूंढ लाती है।

वैसे कई बार लगता है कि हिंदू अगर बहुत अच्छे-अच्छे काम ही कर सकते हैं, बुरे काम करने में समर्थ क्यों नहीं होते? वे अगर किसी और धर्मावलंबी की तरह दुकान चला सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, रिक्शा चला सकते हैं, खेत-मजदूरी कर सकते हैं, दरबान बन सकते हैं, टैक्स में हेराफेरी, घपले-घोटाले आदि कर सकते हैं, धमका सकते हैं, पीठ या पेट में छुरा घोंप सकते हैं, बलात्कार कर सकते हैं यानी सभी सतकर्म और दुष्कर्म कर सकते हैं, तो कभी-कभी, कोई-कोई आतंकवादी भी तो हो सकता होगा?

क्या हिंदू मात्र होने से मनुष्य में कोई शारीरिक या मानसिक खामी पैदा हो जाती है कि वह सत्कर्म ही कर पाता है? अगर वह महात्मा गांधी हो सकता है तो नाथूराम गोडसे होने की योग्यता भी रखता है, यह 70 साल पहले भी सिद्ध हो चुका है! वह दाल-चावल-कढ़ी, रोटी-सब्जी खाता है, तो अंडा-मुर्गा-मछली खाने के लिए भी स्वतंत्र होता है!

ईश्वर उसे दूसरों की अपेक्षा कमी-बेशी के साथ इस धराधाम पर क्यों भेजेगा? और वह हिंदुओं के साथ ही ऐसा बर्ताव क्यों करेगा, जबकि भारत में करोड़ों की संख्या में हिंदू हैं और उनमें से 95 फीसदी भगवान के भक्त हैं। भगवान, खुद भले चुनाव नहीं लड़ते हों मगर वे अपने नाम पर चुनाव लड़वाना तो जानते हैं। ऐसे में वे अपने पापुलर वोट बैंक में बट्टा लगाना क्यों चाहेंगे?

अरे एक मोहल्ले क्या, एक गली का नेता तक ऐसी गलती नहीं करता तो प्रभु होकर वे ऐसी गलती कैसे करेंगे, जबकि वह स्वयं बल-बुद्धि के दाता हैं! वह तो वैसे भी समदर्शी बजते हैं। हालांकि पंडे-पुजारियों को देखकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि यह सच है! पंडे-पुजारी अगर विषमदर्शी न हों तो उनका धंधा चौपट हो जाए, वे सड़क पर आ जाएं! अगर वे समदर्शी हो जाएं तो अंबानी जी फिर क्यों तीर्थ-तीर्थ, मंदिर-मंदिर भटकते फिरें, सत्ताइस मंजिला अपने महल को ही क्यों न केदारनाथ, बद्रीनाथ, नाथद्वारा सिद्ध करवा लें? किस पंडे-पुजारी में इतनी हिम्मत है कि वह अंबानी जी को रोक सके?

खैर मेरे इस कथन के बावजूद आप यह मान सकते हैं कि एक भी हिंदू, गलती से भी कभी आतंकवादी नहीं हो सकता। जिसे गर्व से कहना हो कहे कि मुसलमान, ईसाई आदि तो आतंकवादी होते हैं, मगर हिंदू कभी भी, कुछ भी करके आतंकवादी नहीं हो सकता। अगर हिंदू होकर भी कोई समस्त हिंदुओं को इतना नाकारा समझता है तो फिर उसे यह शिकायत करने का हक नहीं कि मोदी जी के होते हुए भी राम मंदिर क्यों नहीं बन रहा है!

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