आज देश चाहे राहुल गांधी जैसा इंसान, न कि हर जिम्मेदारी से मुक्त स्वघोषित ‘भगवान’

मोदी ने होशियारी से अपने लिए भगवान या जादूगर जैसी छवि गढ़ी है। वह हमेशा आम लोगों से दूर रहते हैं- कभी स्टेज पर तो कभी दूरदर्शन पर, तो कभी रेडियो के पीछे उन्हें महसूस किया जाता है। यहां तक कि प्राकृतिक आपदा में भी वह तुच्छ मनुष्यों को दूर आकाश से देखते हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

“राहुल गांधी कहां हैं?” यह एक ऐसा राजनीतिक सवाल है, जिसे इस देश के लोगों ने न जाने कितनी बार सुना है। अब राहुल गांधी पूछ रहे हैं, “प्रधानमंत्री कहां हैं?” दरअसल, कोविड महामारी के इस काल में राहुल गांधी विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए सुर्खियों में रहे।

भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को आता है और राहुल 12 फरवरी से ही इस विषय पर गंभीर रूप से सक्रिय हो जाते हैं। तभी से वह ज्यादा टेस्ट करने, प्रवासी मजदूरों को नकद देने, पैदल घर जा रहे लोगों को भेजने की व्यवस्था करने वगैरह की मांग ट्वीट और वीडियो संदेश के माध्यम से करते रहे।

इस दौरान उन्होंने वेब कान्फ्रेंस के जरिये चार बार मीडिया से बात की। स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़े मसलों पर रघुराम राजन, अभिजीत बनर्जी, आशीष झा, जोहान गिसेक और राहुल बजाज जैसी हस्तियों के साथ बातचीत की। पूर्ण लॉकडाउन के दौरान भी उन्होंने कई प्रवासी मजदूरों से मुलाकात की और सड़क पर ही बैठकर उनसे बातचीत की।

फिर भी एक पूर्व राजनयिक हाल ही में अपने कॉलम में वही घिसा-पिटा सवाल पूछते हैं कि, “जब आम लोग मुश्किलों का सामना कर रहे थे, तो उस दौरान राहुल गांधी कहां थे? कहां हैं वह?” यह अपने आप में अजीब सवाल है, बशर्ते इसका वास्तविक उद्देश्य सत्ता में बैठे लोगों को किसी बात के लिए जिम्मेदार ठहराना न हो और इसका स्वरूप ऐसा भी हो सकता है- सरकारी बयान कहां है, क्या कोई प्रेस कांफ्रेंस हुई, आंकड़ों, सरकारी नीतियों और इससे निपटने के तरीके पर कोई ब्रीफिंग हुई… वगैरह-वगैरह। ये वाजिब सवाल हैं।

याद है, पिछली बार कब किसी ने प्रधानमंत्री से इस तरह के सवाल पूछे गए थे? कोविड की इस वैश्विक महामारी के दौरान राहुल गांधी की जितनी सार्वजनिक गतिविधियां रहीं, प्रधानमंत्री मोदी की सक्रियता उसकी आधी भी नहीं रही। लगभग हर देश रोजाना प्रेस ब्रीफिंग कर रहा है, ज्यादातर राष्ट्राध्यक्ष नियमित तौर पर खुले प्रेस सेशन कर रहे हैं और देश का सामने आकर नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन मोदी ऐसा कुछ नहीं कर रहे।

19, मार्च को यानी 40 दिन बीतने के बाद मोदी कोरोना संकट पर पहली बार देश को संबोधित करते हैं। जैसा हमेशा होता है, मोदी सीधे प्रेस के सामने नहीं आते, रेडियो-टीवी के जरिये इकतरफा संवाद के तरीके पर कायम रहे। चीन की घुसपैठ के मुद्दे पर भी मोदी मौन रहे। इस मुद्दे पर भी उनकी चुप्पी पर राहुल गांधी 29 मई से ही सवाल उठा रहे हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

आज देश चाहे राहुल गांधी जैसा इंसान, न कि हर जिम्मेदारी से मुक्त स्वघोषित ‘भगवान’

राहुल गांधी के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से बात करने से यह पता चलता है कि उनमें ज्ञान और शैक्षणिक विशेषज्ञता के प्रति सम्मान का भाव है, दूसरों से सीखने का बड़प्पन है, खुली बातचीत और मिलजुलकर काम करने की उदारता है। लेकिन तथाकथित उदार मीडिया राहुल का यह कहकर माखौल उड़ाता है कि अब वह पत्रकार बनना चाहते हैं।

लेकिन वही मीडिया मोदी पर सवाल नहीं करता कि उन्होंने कोरोना पर देश के नाम अपने पहले संबोधन में लोगों को थाली पीटने के लिए क्यों कहा? किसी पत्रकार ने नहीं पूछा कि डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते चीन के प्रति राजनयिक रणनीति पर सवाल उठाने वाले मोदी की आवाज आज कहां गुम हो गई? चीन आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करेगा, ऐसे दावों का क्या हुआ? किस स्तंभकार ने मोदी से इस तरह के सवाल पूछे?

गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी ने निकाय चुनाव भी नहीं लड़ा था। उस बात को दो दशक से ज्यादा समय बीत चुका है। इस दौरान मोदी ने बड़ी होशियारी से अपने लिए भगवान या जादूगर जैसी छवि गढ़ी। नश्वर मनुष्य उन्हें बिना ध्यान लगाए देख-सुन नहीं सकते। वह हमेशा साधारण मनुष्यों से दूर रहते हैं- कभी स्टेज पर तो कभी दूरदर्शन पर, कभी वेब कॉन्फ्रेंस के जरिये तो कभी रेडियो के पीछे उन्हें महसूस किया जा सकता है।

यहां तक कि प्राकृतिक आपदा के दौरान भी वह तुच्छ नश्वर मनुष्यों को दूर आकाश से जेट की खिड़की से देखते हैं। स्वच्छ भारत के लिए झाड़ू पकड़ने से लेकर अपनी मां के साथ तस्वीर खिंचाने तक मोदी के हर सार्वजनिक ‘अवतरण’ को एक शो की तरह पेश किया जाता रहा। जिस तरह ऑस्ट्रेलिया के जादूगर मंच पर लंबी- चौड़ी कद-काठी और प्रभावशाली आवाज वाली शख्सियत के तौर पर सामने बैठे लोगों को चमत्कृत कर देते हैं, जबकि परदे के पीछे वे बड़े साधारण से इंसान होते हैं, उसी तरह मोदी के आसपास तकनीकी और मनोवैज्ञानिक भ्रम में लिपटा रहस्य का माहौल तैयार किया जाता है।

मोदी की कार्यशैली पर टीका-टिप्पणी निषेधित है, बेशक उनके फैसलों का खामियाजा आम लोग भुगतें। लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हुए रास्ते में मर जाएं, एटीएम की लाइन में खड़े-खड़े मर जाएं, लेकिन मोदी के कामकाज की समीक्षा नहीं होगी। वह दूरदर्शन पर आएंगे और लोगों को समझाएंगे कि उनकी सारी तकलीफ या तो खुद उनके भले के लिए है या फिर देश के लिए।

बहुत होगा तो वह कहेंगे, “अगर मैंने कुछ गलत किया है तो मुझे क्षमा कर दें”, लेकिन लोगों को नहीं पता कि मोदी को उनकी करनी के लिए जिम्मेदार कैसे ठहराएं। भगवान को किसी बात के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सब अच्छा हो, इसके लिए आप उनसे प्रार्थना तो कर सकते हैं, लेकिन अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो उसके लिए उन्हें दोषी नहीं मानते।

दूसरी ओर, राहुल गांधी कोई भगवान नहीं हैं। 2004 में औपचारिक रूप से राजनीति में आने के बाद उन्होंने जमीनी जनआंदोलनों में शामिल होने के लिए देश के बड़े हिस्से की यात्रा की, लेकिन मोदी ने ऐसा कभी नहीं किया। हजारों-हजार आम लोगों ने उन्हें सुना, छुआ और गले से लगाया। वह ऐसे नेता हैं जो अकेला चलता रहा, तब भी जब उनकी पार्टी के लोग थक गए, हताश हो गए। यह सिलसिला तब तक जारी रहा, जब तक उन्होंने लोगों का भरोसा हासिल नहीं कर लिया।

जनआंदोलनों में शामिल होने के लिए राहुल को बार-बार हिरासत में लिया गया। नवंबर, 2016 में जब ‘वन रैंक वन पेंशन’ की मांग के लिए आंदोलन के दौरान खुदकुशी करने वाले राम कृष्ण ग्वाल के परिवार के लोगों से राहुल ने मिलने की कोशिश की तो उन्हें दो दिन के भीतर तीन बार हिरासत में लिया गया। इस तरह के तमाम मौके आए, जब जनता के सरोकारों के लिए आगे आने के कारण राहुल गांधी को हिरासत में लिया गया।

वह ऐसे नेता हैं जो अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के अलावा आम लोगों के भी एक बड़े वर्ग को प्रेरित करते हैं, जिन्होंने सरकार की गलतियों के खिलाफ मोर्चा खोला और अकेले जुटे रहे। गांवों के उबड़- खाबड़ रास्ते हों या तपते रेगिस्तान, उन्होंने पैदल नापा। कभी लोकल ट्रेन से यात्रा की तो कभी बजट एयरलाइन से। गांवों के लोगों के साथ रहे, उन्हीं के बीच रातें बिताईं। दिहाड़ी मजदूरों, सफाई कर्मियों, रिक्शा खींचने वालों से मिले। यह सबकुछ पब्लिक रिकॉर्ड में है।

फिर भी दक्षिणपंथी सरकार परस्तों से लेकर तथाकथित उदार मीडिया ने यह सवाल करना नहीं छोड़ा कि “कहां हैं राहुल?” इसके उलट साल 2001 से देख लें, मोदी कितने जनांदोलनों का हिस्सा रहे? कितने लोगों ने उन्हें बिना तकनीकी ताम-झाम के सुना? कितनी बार वह पैदल चलकर गांव के किसी गरीब के दरवाजे तक गए? कितनी बार उन्होंने किसी साधारण से ढाबे पर खाना खाया?

कुल मिलाकर सच ये है, जो बहुत से स्तंभकारों और पत्रकारों के लिए कड़वा भी होगा, कि इस लोकतंत्र को किसी भगवान या किसी जादूगर जैसे शख्स की जरूरत नहीं है। हमें अपने सवालों के जवाब चाहिए। अपने बीच का कोई ऐसा आदमी चाहिए जिसे किसी बात के लिए कम से कम हम जिम्मेदार तो ठहरा सकें।

(नवजीवन के लिए संयुक्ता बसु का लेख)

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