आसान नहीं चीन पर व्यापार प्रतिबंध, पर मोदी सरकार चाहे तो आपदा बन सकता है बड़ा अवसर

चीनी सामानों पर प्रतिबंध मुश्किल है। लेकिन भारत चीन को अपने कृषि-आधारित सामान बेचकर फायदा उठा सकता है। चीन की आबादी के बड़े हिस्से में ज्यादा उम्र वाले लोग बढ़ते जा रहे हैं और कृषि श्रमिक अधिक पैसे वाले रोजगारों में शिफ्ट हो रहे हैं, जो भारत के लिए अवसर है।

फोटोः सोशल मीडिया
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प्रकाश भंडारी

भारत क्या चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध का खतरा उठा सकता है? अभी तो कुछ चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध ने स्थानीय रोजगार और निवेश को प्रभावित किया है और ऐसे समय में जब कोविड-19 ने भारतीय उद्योगों को गंभीर धक्का पहुंचाया है, चीनी सामान पर किसी तरह का व्यापार प्रतिबंध सप्लाई चेन में गंभीर अवरोध पैदा करेगा। बंदरगाहों और हवाई अड्डों पर चीन से आने वाले सामान रोके रखे जाने की औद्योगिक संगठन वैसे ही शिकायतें कर रहे हैं।

इन तथ्यों के मद्देनजर निरपेक्ष आकलन करना होगाः

  • चीन का जीडीपी 14 ट्रिलियन डॉलर है। भारत की 2020 में जीडीपी से यह सात गुना ज्यादा है।
  • भारत में चीन से होने वाला आयात 77 बिलियन डॉलर है जबकि भारत की ओर से चीन को होने वालला निर्यात 19 बिलियन डॉलर है।
  • भारत के आयात में चीन का हिस्सा 15 प्रतिशत है।
  • चीन से होने वाले आयात में इलेक्ट्रॉनिक कम्पोनेंट, दवा के कच्चे माल, इंजीनियरिंग के सामान और यहां तक कि सिलाई मशीनों की सुई तक हैं।

इसमें शक नहीं कि भारतीय उपभोक्ताओं और चीनी निवेशकों तथा निर्माताओं ने इस व्यापार से काफी लाभ उठाए हैं। चीनी उत्पादकों ने अपने सामान की बिक्री के लिए बड़ा बाजार पाया है और भारतीय उपभाक्ताओं को कम कीमतों का लाभ मिला है। चीन के अतिरिक्त दूसरे देशों से कच्चे माल मंगाकर भारत में उपभोक्ता सामानों को असेंबल किया जा सकता है, लेकिन इससे 15 से 20 प्रतिशत उत्पादन मूल्य बढ़ जाने की संभावना है।

व्यापार घाटा या बढ़त का प्रभाव अर्थव्यवस्था पर दिखता है, लेकिन सोशल मीडिया पर अधिकतर लोगों द्वारा पेश किए जाने साधारणीकृत विचार की तुलना में यह काफी जटिल है। उदाहरण के लिए, अमेरिका, ब्रिटेन और नीदरलैंड को भारत का निर्यात, आयात की तुलना में ज्यादा है। लेकिन इससे भारत की अर्थव्यवस्था उनसे बेहतर नहीं बन जाती। न व्यापार घाटा ही अच्छी बात है। लगातार व्यापार घाटा निपुण तरीके से सामान उत्पादन में अक्षमता दिखाता है। और यह आयात में भुगतान के लिए विदेशी मुद्रा भंडार पर सवाल उठाता है। भारत के पास आज की तारीख में वर्तमान मूल्यों पर अगले 12 माह तक आयात के भुगतान के लिए 500 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है।

व्यापार प्रतिबंध का धनी और मध्य वर्गों पर तो असर नहीं पड़ने की संभावना है, लेकिन कीमतों को लेकर ज्यादा संवेदनशील भारतीयों, गरीबों के लिए यह अधिक दुखदायी होगा। अब जैसे उदाहरण के लिए, ज्यादा महंगे या कम क्षमता वाले भारतीय टीवी रिटेलर के साथ-साथ गरीब पर भी असर डालेंगे। व्यापार प्रतिबंध कई दफा तीसरे देशों से तस्करी को भी बढ़ावा दे सकते हैं और उससे भी राजस्व की हानि होगी।

भारत में काफी सारे उद्यमी चीन से मध्यवर्ती (इंटरमीडिएट) सामान और कच्चा माल आयात करते हैं, जिनका बदले में घरेलू भारतीय बाजार के साथ (भारतीय निर्यात के तौर पर) ग्लोबल बाजार के लिए तैयार सामान बनाने में उपयोग करते हैं। इन मध्यवर्ती सामानों में बिजली मशीनरी, थर्मल पावर प्लांट के हिस्से, उर्वरक, आंखों और फोटोग्राफी मापक उपकरण, ऑर्गेनिक रसायन आदि-आदि शामिल हैं।

चीनी आयातों पर पूर्ण प्रतिबंध एक ही समय ऐसे सभी व्यापारों पर बुरा असर डालेंगे जो तैयार माल के उत्पादन में भारत की क्षमता पर असर डालने के अलावा पहले से ही किसी तरह बचे रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। निर्यातकों का कहना है कि चीन से क्रमबद्ध दूरी बनाना और अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को बढ़ाना भारत के हित में होगा।

कुछ लोगों का तर्क है कि भारत को चीनी सामान पर ज्यादा ऊंचे आयात शुल्क और तैयार सामानों पर प्रतिबंधात्मक शुल्क लगाने चाहिए। लेकिन ऐसा करने पर भारत पर विश्व व्यापार संगठन के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लग सकता है। इससे भी अधिक, राजनीतिक कारणों से शुल्क बढ़ाने पर सभी व्यापार सहयोगियों पर लंबे समय के लिए असर डाल सकता है और आपसी अविश्वास पैदा कर सकता है। वे यह भी कहते हैं कि सीमा विवाद को व्यापार युद्ध में बदलने से सीमा विवाद सुलझने की संभावना नहीं है। बल्कि, बदले में चीन के भारतीय निर्यातों पर व्यापार प्रतिबंधों और अड़ंगों से भारतीय व्यापार पर असर हो सकता है।

विशेषज्ञों को लगता है कि दोनों देश शांत हो जाएंगे। और जब एक दफा गर्दोगुबार थम जाएगा, वे ऐसे व्यापार युद्ध को बढ़ने देने से बचेंगे, जिसमें दोनों को घाटा होने की आशंका है। भारतीय अर्थव्यवस्था में जब बेहतरी होगी, तो कच्चे माल और चीनी सामानों की मांग बढ़ेगी और दोनों में से किसी देश को नाव अटकाने से कोई फायदा नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मीडिया का एक वर्ग और कुछ राजनीतिक दल चाहते हैं कि भारत डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत सुरक्षा उपनियमों को लागू करे, जिससे चीनी आयातों पर ज्यादा ऊंचे आयात शुल्क लगाने में सुविधा रहे। लेकिन इस तरह का कदम उचित समय पर उठाया गया नहीं होगा क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था मुश्किलों का सामना कर रही है।

लेकिन भारत सुरक्षा कारणों की वजह से टेलीकॉम सेक्टर में 5जी टेक्नोलॉजी की संभावित लॉन्चिंग में निश्चित तौर पर चीनी वेंडरों को हतोत्साहित करने की ओर दिख रहा है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान- जैसे प्रमुख बाजारों ने इन्हें पहले ही बाहर कर रखा है। भारत ने प्रतिबंध का आदेश देने से अपने आपको अब तक रोक रखा है लेकिन लद्दाख घटनाक्रम के बाद हुआवेई और जेडटीई- जैसी चीनी कंपनियों को इसमें भागीदार होने देने की अनुमति दिए जाने की संभावना कम ही है।

घरेलू क्षमताओं को बढ़ाना और वैश्विक तौर पर प्रतिद्वंद्वी बनना भविष्य की तरफ देखना है। सिर्फ इससे ही वैश्विक व्यापार में भारत की ज्यादा हिस्सेदारी हो सकती है। कोई भी देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है और उसे बेहतर ढंग से सामान बनाने वाले अन्य देशों से आयात पर निर्भर होना ही होता है। भारत चीन को अपने कृषि-आधारित सामान की आपूर्ति कर फायदा उठा सकता है। चीन की आबादी के बड़े हिस्से में ज्यादा उम्र वाले लोग बढ़ते जा रहे हैं और इसके कृषि श्रमिक अधिक पैसे वाले रोजगारों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। इससे भविष्य में भारत के लिए अवसर बन रहे हैं।

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