मृणाल पांडे का लेख: देश के सामने मुंह बाए खड़ी हैं मुसीबतें, असल सवालों से कब तक दूर भागती रहेगी मोदी सरकार?

देश की औसत कम उम्र के लिहाज से संभव है कि भारत में कोविड से मौतें कम हों लेकिन मार्च में अचानक बिना सलाह-मशवरे के बड़े पौरुष भरे हावभाव से घोषित कठोर लॉकडाउन ने भारतीय अर्थव्यवस्था और हाशिये पर जीवन-यापन करने वाले करोड़ों लोगों को तबाह कर दिया है।

फोटो: सोसल मीडिया
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मृणाल पाण्डे

देश की सीमा पर चीन के हर रोज नए उपद्रवों, देश के भीतर कोविड के दिनों दिन गहराते संकट, बेरोक टोक बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के बीच सोमवार 14 सितंबर को संसद का 18 दिनी मानसून सत्र शुरू हुआ। ऐसे अभूतपूर्व आपात्काल में संसद का मिल बैठना अच्छी बात है। लेकिन इन अभूतपूर्व परिस्थितियों की वजह से इस बार का सत्र सामान्य नहीं हो पाएगा, यह पहले ही दिन साफ हो गया। तालिका के हिसाब से मानसून सत्र में कुल 47 विषयों पर चर्चा होनी सूचित है, जिनमें 45 विधेयक और 2 आर्थिक विषय शामिल हैं। बीजेपी को संसद के दोनों सदनों में अपने भीमाकार बाहुबल पर गुमान है, इसलिए लोकसभा में 5 बिल रखे गए जिनमें विपक्ष को भारतीय किसानों को खुले बाजार के हवाले करने वाले तीन कृषि सुधारों से जुड़े बिलों पर आपत्तियां हैं। भारतीय चिकित्सा पद्धति से जुड़े दो बिल बिना बहस पारित हो गए। विपक्ष को उनके संभावित फलादेशों पर जानकारी लगभग गायब दिखी। समय की कमी का ही तर्क देकर विपक्ष के विरोध के बावजूद सांसदों के निजी बिल और प्रश्नकाल- दोनों को स्थगित कर दिया गया। यह भी संयोग नहीं कि दिल्ली दंगों का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकाल दिया गया है। सुरक्षा कारणों से दंगा भड़काई के संदिग्ध लोगों की जो फेहरिस्त पुलिस ने जारी की, उसने ‘सीमित प्रवेश’ के अंतर्गत सदन में मौजूद खास-उल-खास मीडिया को शाम की प्राइम टाइम चर्चाओं में हिंदू हित रक्षक सरकार बनाम ‘देशद्रोही हिंदू विरोधी’ का एक आजमूदा ध्यान भटकाऊ मुद्दा प्राप्त हो गया। 27 सांसदों के कोरोना पॉजिटव पाए जाने, कांग्रेस द्वारा पहले दिन काम रोको प्रस्ताव लाने सहित कई महत्वपूर्ण खबरें लगभग ओझल रह गईं।

खबर है कि सरकार कोरोना संकट से बुरी तरह प्रभावित गरीबों-पिछड़ों को खास योजना की तहत भरपूर लोन तथा सब्सिडियां मुहैया कराएगी जिसे अभी साल भर की ही मंजूरी मिली है। इतना समय बिहार चुनावों के प्रचार में कृषि संबंधी विधेयकों और इसका लाभ उठाने के लिए काफी होगा। पर यह गौरतलब है कि बड़े ब्रिटिश अखबार ‘दि गार्जियन’ के अनुसार, भारत के राष्ट्र प्रमुख जो भीषण कोरोना संक्रमण के बीच भी एक धार्मिक स्थल का भूमिपूजन कराने से नहीं चूके, की छवि लोकतंत्र के बीच एक हिंदू महाराजा की बनगई है। जबकि भारत जो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करता रहा, आज दुनिया की कमजोर अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है जहां दुनिया में कोविड के सबसे ज्यादा दैनिक मामले दर्ज हो रहे हैं।

देश की औसत कम उम्र के लिहाज से संभव है कि भारत में कोविड से मौतें कम हों लेकिन मार्च में अचानक बिना सलाह-मशवरे के बड़े पौरुष भरे हावभाव से घोषित कठोर लॉकडाउन ने भारतीय अर्थव्यवस्था और हाशिये पर जीवन-यापन करने वाले करोड़ों लोगों को तबाह कर दिया है। इनमें सबसे बड़ी तादाद महिलाओं की है। लॉकडाउन के बाद 20 राज्यों में एक्शन एड संस्था के कराए सर्वे के अनुसार, इस दौरान अनौपचारिक क्षेत्र की 79.23 प्रतिशत कामगार महिलाएं बेरोजगार हो गईं जबकि इसी क्षेत्र के पुरुष कामगारों में बेरोजगारी दर 51.6 प्रतिशत रही। इनमें सबसे बड़ी तादाद शहरी घरों में काम करने वाली महिला कामगारों की है। वेतन न मिलने की वजह से उनमें से 99 फीसदी ने गाढ़े समय के लिए बचा कर रखी राशि से काम चलाया, कई जरूरी मदों में कटौती की है जिसमें बच्चों की स्कूली शिक्षा, खास कर बेटियों की शामिल है और 66 फीसदी ने उधार पर पैसा लिया। यह भी पाया गया कि महिलाओं की तुलना में मालिकों से लड़-झगड़कर वेतनपा लेने वालों में पुरुषों का प्रतिशत बेहतर था। इन महिलाओं के पास आधार कार्ड होने के बावजूद अधिकतर को गरीबों के लिए घोषित सरकारी योजनाओं के लिए बहुत कम चिह्नित किया गया। उज्ज्वला-जैसी योजना की लाभार्थी इनमें कुल 10 प्रतिशत और जनधन योजना की लाभार्थिनी मात्र 19 प्रतिशत पाई गईं।

जाहिर है कि इस देश में चुनावों के पहले घोषित अधिकतर गरीब समर्थक सरकारी स्कीमों से अधिक बासी और बकवास चीज कुछ नहीं। मनमोहन सिंह के दस सालों का इतिहास- जब देश लगभग 10 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ रहा था- को अब कोई नहीं लौटा सकता। पर बिहार को छोड़कर शेष देश में केंद्र की जनधन तथा उज्ज्वला योजना, गरीबों के लिए मकान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे अब लटके हुए उन तारों से अधिक नहीं जिनसे करंट कब का गायब हो चुका है। सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक ने भी कोविड को निबटा कर मालदार बन रहे चीन की लाल सेना की नव-आक्रामकता के बरक्स अपना वह वोल्टेज खो दिया है जो पाक के खिलाफ तरंगायित हुआ था। संसद परिसर में मीडिया से मुखातिब प्रधानमंत्री ने संसद तथा देश का आह्वान किया कि वे एकजुट होकर दुर्गम पहाड़ियों पर खड़े वीर जवानों के बुलंद हौसलों को समर्थन दें। पर अरुणाचल, सिक्किम और भूटान से काली नदी पार नेपाल तक सारे हिमालयी इलाके में फैलते जा रहे चीन के कूटनीतिक पंजों तथा जगह-जगह हजारों चीनी सैनिकों के जमावड़ों के बीच वीर जवानों की टुकड़ियों का देश प्रेम तथा साहस चीन को मुंहतोड़ जवाब देने में कितना कामयाब होता है, यह सवाल अभी अनुत्तरित है।

दरअसल सितंबर, 2020 में तीन बड़े मुद्दों ने सारे ग्लोबल पूंजीवाद और उससे बनी दोस्तियों तथा धड़ों को भीतर से गंभीर घाव दे दिए हैं। पहला, कोविड की महामारी जिससे गरीब ही नहीं, अमीर भी अपनी दौलत का सहारा लेकर नहीं बच पाए। दूसरा, ग्लोबल वार्मिंग जिसके कारण ऑस्ट्रेलिया से लेकर जापान, फिलिपींस तथा अमेरिका के सबसे अमीर पच्छिमी तट के राज्य अभूतपूर्व दैवी आपदाओं- भीषण दावानलों, चक्रवाती तूफानों तथा बढ़ते जलस्तर से हिल उठे हैं। और तीसरा मुद्दा है- एशिया, यूरोप और अमेरिका में आर्थिक बेहतरी के दिनों में कब्रमें दफनकर दिए गए रंगभेदी, नस्लभेदी और जातिवादी प्रेतों का पुनर्जागरण। तनाव इतना है कि ऐसा प्रेतनर्त न आज शांति प्रेमी देशों में भी गृह युद्ध की स्थितियां बना रहा है। ट्रंप की धुर पूंजीवादी नीतियों और रंगभेदी आव्रजन विरोधी सोच ने कभी उदारता और समन्वय की मिसाल रहे अमेरिका को आत्मकेंद्रित, पूंजी परस्त, और नस्लभेदी, रंगभेदी बना दिया है। और कई दशक बाद वहां ‘ब्लैक लाइव्समैटर’ जैसे आंदोलन सड़कों पर उतर कर पुलिस को अपना वर्ग शत्रु समझने लगे हैं।

मार्क्सया कींस, किसी के पास वह वैज्ञानिक नुस्खा नहीं जो बता सके कि ऐसे कर्कश चुनावों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बेवकूफ बनेगा या कोई अक्लमंद! बहुत संभव है, चुनाव में अक्लमंदी कोई मुद्दा न हो। जिसके पास लड़ाकू बेशर्मी और खर्चा करने को अधिक गहरी जेबें हों, वही अल्गोरिद्म संचालित सोशल मीडिया के युग में जीत जाए। अपने यहां भी बिहार और उसके बाद बंगाल के चुनावों की तैयारी में बेशर्मी और मीडिया संचालन से दल अपनी डफलियां बजा रहे हैं, पर कथित लोकतांत्रिक सरकारों के चुनाव जो कई सवाल हवा में फेंक रहे हैं, उनका अभी कोई साफ जवाब नहीं दे रहा। विरोध को संगठित न होने देकर, विपक्ष के युवा नेताओं की छवि दागदार बनाने की कवायद करते हुए बूढ़ों की सरकारें क्या आज फिर वही गलती नहीं कर रही हैं जो कभी उधार का यौवन मांगने वाले राजा ययातिने की थी?

लोकतंत्र में विपक्ष कोई परदेसी वर्ग या जरासीम नहीं, एक विचार, एक विकल्प होता है। और जब तक मनुष्यता बुद्धिहीन नहीं होती, वह विकल्प से विमुख भी नहीं होगी। युवा नेता विशेष की निंदा से काम नहीं चल सकता। मूल सवाल तो यह है कि हमारे लोकतंत्र के ढांचे में वे कौन-सी विकृतियां हैं जिनसे चुनाव में भारी बहुमत पाने वाला नेता देर-सबेर हाईकमान का ताज पहनकर आर्थिक अपराधियों को संरक्षण देता हुआ खुद को महाराजा समझने लगता है?

Published: 20 Sep 2020, 7:59 PM
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