ट्रंप और मोदी तो आते-जाते रहेंगे, मीडिया को जीवित रहना है, खुली हवा में सांस लेते रहना है

आज भारत समेत लगभग पूरी दुनिया में मीडिया को जमकर गाली दी जा रही है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप तो खुलेआम परंपरागत मीडिया को फेक न्यूज कहते हैं। भारत में थोड़ी गनीमत है, लेकिन शायद ही ऐसा कोई संपादक या एंकर होगा जो सत्ता प्रतिष्ठान की हां में हां न मिलाता हो।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया

आशुतोष

कुछ क्रांतियां चुपके से आती हैं और कुछ तूफान मचाती हुई। 1917 की रूसी क्रांति अपने साथ हिंसा का वह दावानल ले कर आई कि पूरी दुनिया हिल गई। साम्यवादी क्रांतियां ऐसी ही होती थीं। अफरातफरी मचाती हुई, खूनखराबा करती हुई। पर पिछले दिनों जो क्रांति मीडिया में हुई, उसका शोर ज्यादा नहीं दिखा। जब नतीजा सामने आया तो हर कोई हैरान और परेशान है।

यह क्रांति चुपके से आई। कब ये हमारे घरों में घुस गई, पता नहीं चला। हमारे जीवन का हिस्सा बन गई, हमें एहसास ही नहीं हुआ। ये क्रांति बंदूक की नली से नहीं निकली थी। एक अदृश्य-सी दुनिया हमारे इर्द-गिर्द बनती चली गई और हम सोते रहे। अचानक एक दिन पता चला कि फेसबुक, ट्विटर, यू ट्यूब और वाट्सएप के बगैर तो एक मिनट भी सांस लेना संभव नहीं रह गया है।

अब अखबार और टीवी- दोनों ही पाश्र्व में जाने को तैयार बैठे हैं। अब न तो सुबह अखबार का इंतजार होता है और न ही रात के एंकर का। अब खबर देखनी है तो गाड़ी चलाते हुए रेड लाइट पर ही देख लेते हैं और कमोड पर बैठे-बैठे पूरी बहस हजम हो जाती है या सुन ली जाती है। बस, हाथों में मोबाइल फोन होना चाहिए और कानों में ईयर फोन। भरी मीटिंग में फोन पर कोई नोटीफिकेशन आता है और चुपके से जान जाते हैं कि दुनिया के किस कोने में कौन-सी बड़ी घटना घट गई है। सुबह उठते ही वाट्सएप ग्रुप आपका स्वागत करता है। दस तरह के वीडियो और टेक्स्ट आपको सूचना देने को आतुर रहते हैं। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप उसे कंज्यूम करना चाहते हैं या नहीं।

मोबाइल अगर शरीर का एक अभिन्न अंग हो गया है तो मोबाइल चिप एक अतिरिक्त दिमाग जो लगातार चलती रहती है और हर सूचना खट से दे देती है। हम अब चीजों को भूलने लगे हैं और कंप्यूटर बाबा हर भूली चीज को याद दिलाने लगे हैं। वह हर मर्ज की दवा हैं। कभी गांव-देहात और शहर का आदमी अखबार में पढ़ी हुई चीज को धर्मग्रंथ मान यकीन कर लेता था। आज उसे यही नहीं पता कि वह किस पर यकीन करे या न करे। सूचना के इतने स्रोत हो गए हैं कि सब कुछ अजूबा-सा लगने लगा है। न्यूज की जगह फेक न्यूज चर्चा में है। और अखबार, न्यूज वेबसाइट से ज्यादा जानकारी ट्विटर और फेसबुक से मिलने लगी है। इस खेल को और दिलचस्प बना दिया है डोनाल्ड ट्रंप- जैसे खिलाड़ियों ने जो हर परंपरागत न्यूज के संस्थान को डिसक्रेडिट करने में लगे हैं।

आज खबर पाने और उसको कंज्यूम करने के तरीके भी बदल चुके हैं। आज हर कोई रिपोर्टर है। फेसबुक लाइव और यू ट्यूब ने लाइव नाम के भूत का हव्वा उतार दिया है। अब हर कोई फेसबुक लाइव कर सकता है और अपना वीडियो बना यू ट्यूब पर शेयर कर देता हैं। गांव-गांव, कस्बों-कस्बों से लाइव होने लगे हैं। लोग यू ट्यूब पर अपना निजी चैनल बना लाखों सब्सक्राइबर बना रहे हैं। यानी खबरों का परिदृश्य तो पूरी तरह से बदला ही है, उसके चरित्र भी बदल गए हैं और खबर परोसने का तरीका भी। न्यूज अब अभिजात्य वर्ग के हाथ से फिसलकर सर्वहारा के पास जा रही है।

जितनी तेजी से अब खबर आती है, उतनी ही तेजी से खबर भ्रष्ट करने का अभियान भी शुरू होता है। राजनीति के खिलाड़ियों के हाथ एक ऐसा खिलौना लग गया है कि वे उससे दिन-रात खेलते रहते हैं। ट्विटर ट्रेन्डिंग एक नया शैतान बच्चा है जो यह तय करता है कि कौन-सी खबर बाकियों से ज्यादा लोकप्रिय है। पहले ये अपने आप ट्रेन्ड करता था। अब पेशेवर वार-लार्ड आ गए हैं। जैसे पहले भाड़े पर जंग लड़ने वाले सिपाही होते थे, वैसे ही आज भाड़े के सोशल मीडिया वारियर्स खड़े हो गए हैं जो चंद मिनटों में किसी भी कंटेंट को ट्रेन्ड करा देते हैं।

अभी हाल ही में जोमैटो के मुस्लिम लड़के से खाना लेने से इंकार करने वाले एक हिंदू आदमी की खबर आई तो सैकड़ों खड़े हो गए जौमैटो के पक्ष में और खाना लेने से मना करने वाले शख्स की लानत-मलानत की जाने लगी। थोड़ी देर बाद जोमैटो के विरोध में भी लोग जुटने लगे और देखते-देखते जोमौटो विरोध में हैशटैग ट्रेन्ड करने लगा। अब ये कैसे तय होगा कि कौन सही है और ज्यादा लोकप्रिय। न्यूज और टीवी पर शाम की बहस अब एडिट मीटिंग से ज्यादा ट्विटर ट्रेन्डिंग तय कर रहे हैं। संपादक और एंकर कहीं ज्यादा कंफ्यूइज्ड दिखने लगे हैं। पता नहीं कब कौन-सी खबर ट्रेन्ड करने लगे और बहस का विषय बदलना पड़े।

तकनीकि बदली तो न्यूज कंज्यूमर का मिजाज भी बदला। उसके आचार-व्यवहार में बदलाव आया तो खबरों की पूरी संस्कृति ही बदल गई। पहले वह टीवी पर जाता था। 2007 में एप्पल का आईफोन आया। धीरे-धीरे स्मार्ट फोन हमारे आपके जीवन का हिस्सा हो गया। कंप्यूटर बाबा कमरे की चारदीवारी से निकल कर हथेली में आ गए। फेसबुक और ट्विटर की ताकत को बराक ओबामा ने सबसे पहले पहचाना और अपने चुनावी प्रतिद्वंद्वी को हराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। भारत में मोदी इस जिन्न की ताकत को पहचानने वाले पहले नेता थे।

2013 के बाद से सोशल मीडिया ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। अब वोटर या कंज्यूमर से सीधे जुड़ना आसान हो गया। मोदी हों या राहुल गांधी, अब अपनी बात कहने के लिए वे टीवी चैनल या अखबार के मोहताज नहीं हैं। मोदी के करोड़ों फाॅलोअर्स हैं, राहुल के लाखों। ट्विटर पर उनके एक शब्द लिखते ही वह फौरन राष्ट्रीय खबर बन जाती है। सोशल मीडिया की टीमें सेकेंडों में इन्हें लपक लेती हैं और फिर खबरों का नैरेटिव बदलने के लिए वर्चुल मीडियम में जंग शुरू हो जाती है। ये जंग धीरे से न्यूज रूम में प्रवेश करती है। ट्रेन्डिंग की रेस बड़े-बड़े संपादकों का दिमाग बदल देती है और जौमैटो की समस्या देश की सबसे बड़ी समस्या बन जाती है और गिरती अर्थव्यवस्था पीछे रह जाती है। मोदी की टीम इसमें माहिर है। और विपक्षी दल फिसड्डी।

टीवी में भी मोदी की टीम के लोग बैठे हैं जो लगातार देश का नैरेटिव एक खास दिशा में ले जाने में जुटे हैं। फिर जैसे ही यह कहा गया कि अर्थव्यवस्था की आलोचना करने वाले “पेशेवर निराशावादी” हैं या देश की सारी समस्याओं के लिए “खान मार्केट गैंग” जिम्मेदार है, विपक्ष को कोड़े पड़ने लगते हैं। उन्हें कठघरे में खड़ा कर बिना सुनवाई अपराधी घोषित कर दिया जाता है। प्रोग्राम खत्म होते-होते न्यायाधीश एंकर गर्व से अपने पत्रकार होने का दंभ भरता हुआ मेकअप रूम में जा शीशे के सामने अपना चेहरा देखता है जहां उसे खबरों के सिवाय सब कुछ दिखाई पड़ता है। यह खबरों का नया संसार है। इस संसार में मंत्री पत्रकारों को प्रेस्टीट्यूट कहता है और पत्रकार गौरी लंकेश के कत्ल को सही ठहराने वालों को देश के प्रधानमंत्री फाॅलो करते हैं और उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं।

मीडिया को जमकर गाली दी जाने लगी है। अजीब इत्तफाक है कि जब मीडिया की संरचना और प्रकृति में भयानक परिवर्तन हो रहे हैं, तब उसकी विश्वसनीयता सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप तो खुलेआम परंपरागत मीडिया को फेक न्यूज कहते हैं। भारत में अभी थोड़ी गनीमत है। पर शायद ही ऐसा कोई संपादक या एंकर होगा जो सत्ता प्रतिष्ठान की हां में हां नहीं मिलाता हो। ऐसे में वाशिंगटन पोस्ट के नए मालिक और दुनिया के सबसे अमीर आदमी जेफ बेजों के मुख से यह सुनना अच्छा लगता है- “मीडिया को शैतान बताना खतरनाक है। यह कहना खतरनाक है कि यह जनता का दुश्मन है। क्योंकि वह लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है।”

मीडिया ने अपनी साख कुछ खुद गंवाई है और कुछ मीडिया की बदलती संरचना ने नुकसान पंहुचाया है। पर उसे अगर लोकतंत्र का चौथा खंभा बने रहना है तो फिर उसे लोगों में अपने प्रति यकीन को नए सिरे से स्थापित करना होगा। ट्रंप और मोदी तो आते जाते रहेंगे, मीडिया को तो जीवित रहना है। उसे खुली हवा में सांस लेते रहना है।

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