चुनावी बवंडर के साये में ट्रंप: दोहरे मोर्चे पर साख बचाने की जद्दोजहद में डोनाल्ड

डोनाल्ड ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 39 फीसदी रह गई जबकि 61 फीसद अमेरिकी उन्हें नापसंद करने लगे है।

फोटो: Getty Imges
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आशीस रे

जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एहसास हुआ कि ईरान पर बमबारी से तेहरान सरकार घुटने नहीं टेकेगी, वह अपनी साख बचाकर निकलने का रास्ता खोजने लगे। संघर्ष के छह हफ्ते बाद, वह युद्धविराम के लिए राजी हो गए। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का पहला दौर बेनतीजा रहा। इसके अलावा, ट्रंप के लिए यह भी जरूरी था कि संघर्ष के कारण देश के भीतर आई आर्थिक मुश्किलों को दूर करें।

अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के लिए राज्यों के हिसाब से प्राइमरी चुनाव 3 मार्च को शुरू हुए और 15 सितंबर को खत्म होंगे। इन्हीं से डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियों के अंतिम उम्मीदवार तय होंगे। राज्यों के गवर्नर, सीनेटर और प्रतिनिधि सभा के सांसदों के लिए आम चुनाव 3 नवंबर को होंगे।

नवंबर 2024 में मिली जबरदस्त जीत के बाद ट्रंप की लोकप्रियता लगातार गिरती गई है। उनकी रिपब्लिकन पार्टी के पास सीनेट और प्रतिनिधि सभा, दोनों में बहुमत है जो अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए बड़ी मदद होती है। इसके बावजूद वह कई कानून पास करवाने में नाकाम रहे हैं। इसकी वजह खुद रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों का विरोध था। उन्हें चिंता थी कि ऐसे कानून पास होने से उनके वोटर नाराज हो सकते हैं, और उनके चुनाव जीतने या दोबारा चुने जाने की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इस तरह, ट्रंप ने कार्यकारी आदेशों का सहारा लिया, लेकिन इनकी वैधता का समय सीमित होता है और कुछ मामलों में, उनकी स्वीकार्यता भी सीमित होती है।

हालांकि, दोनों सदनों में बहुमत होने से ट्रंप को विदेशों में सैन्य ऑपरेशन के मामले में कांग्रेस को दरकिनार करने की सहूलियत जरूर मिलती है। इनमें जनवरी 2026 में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का गैर-कानूनी अपहरण करके उन्हें न्यूयॉर्क ले आना और इसराइल के साथ मिलकर ईरान पर बिना किसी उकसावे के हमला करना शामिल है। 28 फरवरी 2026 को हुए पहले हमलों के बाद से हजारों लोग मारे गए हैं, लगभग 25,000 लोग घायल हुए हैं और 20 लाख से ज्यादा बेघर हुए हैं।


संघर्ष के चार हफ्ते बाद अमेरिका में देशव्यापी ‘नो किंग्स डे ऑफ एक्शन’ के तहत बड़े पैमाने पर लोगों की लामबंदी दिखी। 28 मार्च को पूरे अमेरिका में 90 लाख से ज्यादा लोगों ने ट्रंप, उनके प्रशासन और ईरान के खिलाफ युद्ध के विरोध में रैलियां निकालीं।

8-10 अप्रैल के बीच किए गए और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ द्वारा प्रकाशित ‘यूगोव’ जनमत सर्वेक्षण के मुताबिक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 39 फीसद पर आ गई, जबकि 61 फीसद अमेरिकी उनके काम से असंतुष्ट थे। ईरान पर जीत का दावा करते हुए ‘ट्रुथ सोशल’ पर उनके रोजाना के बयानों से कम ही लोग प्रभावित हुए। बढ़ती महंगाई के कारण जेब पर पड़ रहे बोझ से लोगों में हताशा बढ़ती जा रही है। 

2026 में अमेरिका में जीडीपी वृद्धि धीमी हो गई है, उपभोक्ता कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, कोविड-19 महामारी के बाद से रोजगार पैदा होने की दर सबसे कम है और एनर्जी की कीमतें आसमान छू रही हैं। फरवरी से मार्च के बीच पेट्रोल की कीमतें 21.2 फीसद बढ़ीं, जो 1967 में आंकड़ों की ट्रैकिंग शुरू होने के बाद सबसे ज्यादा मासिक बढ़ोतरी है। अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के मुताबिक कैलिफोर्निया में एक गैलन गैसोलीन की कीमत 5.93 डॉलर हो गई है जो पहले 3 डॉलर के आसपास थी। 

बीबीसी द्वारा उद्धृत विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले महीनों में खाने-पीने की कीमतें बढ़ सकती हैं, क्योंकि परिवहन और खेती से जुड़ी चीजों की बढ़ती कीमतों का असर अब दिखने लगा है। अमेरिका-इसराइल के हमले की जवाबी रणनीति के तौर पर ईरान ने होर्मुज को बंद कर रखा है जहां से कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, खाद, एल्युमीनियम और हीलियम जैसी जरूरी चीजों की बड़ी मात्रा में सप्लाई होती है। 


ट्रंप का कहना है कि एनर्जी की कीमतों में बढ़ोतरी कुछ समय के लिए है और इससे अर्थव्यवस्था को कोई खतरा नहीं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन के जरिये कीमतों में स्थिरता आने में अभी 4-5 महीने और लग सकते हैं। इससे, नवंबर के चुनावों मे भाग लेने वाले रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार चिंतित हैं।

इसके अलावा, ट्रंप का अमेरिका में जन्मे पोप लियो XIV के साथ टकराव भी अजीब है। पोप लियो XIV कैथोलिक चर्च के चुने हुए प्रमुख हैं। ट्रंप ने पोप पर ‘विदेश नीति के लिए बहुत बुरा’ होने का आरोप लगाया और कहा, ‘मैं पोप लियो का प्रशंसक नहीं।’ पोप ने इसका जवाब देते हुए कहा, ‘मुझे ट्रंप प्रशासन से डर नहीं... एक शांतिदूत के तौर पर, मैं धर्म संदेश में यकीन रखता हूं।’

अमेरिका में कैथोलिक आबादी 20 फीसद है और वे लोग इस टकराव को हल्के में नहीं लेंगे जबकि प्रोटेस्टेंट लोगों के लिए भी इसे नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। इसके अलावा, 36 फीसद कैथोलिक हिस्पैनिक हैं; उन्होंने जरूर गौर किया होगा कि स्पेन और अन्य स्पेनिश-भाषी देशों ने अमेरिका और इसराइल की आक्रामकता की साफ तौर पर निंदा की है।

इसका मतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी हाउस और शायद सीनेट पर अपना नियंत्रण खो सकती है। हाउस में डेमोक्रेटिक बहुमत का सीधा मतलब होगा ट्रंप के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव, हालांकि सीनेट में उन्हें दोषी ठहराना- जिसके बाद राष्ट्रपति को पद से हटाया जाता है और जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है, शायद ज्यादा मुश्किल हो।

अगर विधायिका राष्ट्रपति के खिलाफ हो जाए, तो वह राष्ट्रपति को ‘शक्तिहीन’ बना सकती है। उसके बाद भी ट्रंप विदेशों में सैन्य अभियान शुरू कर सकते हैं। ऐसी मनमानियों पर रोक का अकेला तरीका है कि डेमोक्रेट 1973 के ‘वॉर पावर्स एक्ट’ में संशोधन करे। अभी के नियम के मुताबिक राष्ट्रपति के लिए सेना तैनात करने के 48 घंटों के भीतर कांग्रेस को सूचित करना जरूरी है, और यह भी अनिवार्य है कि 60-90 दिनों के भीतर सेना को वापस बुला लिया जाए, जब तक कि कांग्रेस उस कार्रवाई को मंजूरी न दे दे। अब तक, ट्रंप ने जान-बूझकर इन्हीं नियमों का पालन किया है।


ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी में अमेरिका का साथ देने से साफ मना कर दिया; यह संकेत है कि वॉशिंगटन और लंदन के ‘खास रिश्तों’ में दरार पड़ने लगी है। इसके बजाय, 17 अप्रैल को यूके और फ्रांस ने 40 से भी ज्यादा देशों के सम्मेलन की मेजबानी की जिसका मकसद होर्मुज में यातायात और ‘आवाजाही की आजादी’ बहाल करने के लिए ‘रक्षात्मक नौसैनिक मिशन’ की संभावनाओं पर चर्चा करना था। इस बीच, ईरान ने कूटनीतिक तौर पर पश्चिमी देशों को बांटने और अमेरिका को अलग-थलग करने की कोशिश में, होर्मुज के रास्ते स्पेन और फ्रांस को ऊर्जा की सप्लाई शुरू कर दी है।

अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय राजी हो जाए तो होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर लंबे समय के लिए टोल लगाने की ईरान की इच्छा खतरनाक मिसाल कायम कर देगी। यह संयुक्त राष्ट्र के ‘समुद्री कानून कन्वेंशन’ का भी उल्लंघन होगा, जिसके मुताबिक किसी देश की समुद्री सीमा उसके तट से 12 नॉटिकल मील से ज्यादा नहीं हो सकती।

दुनिया के कम-से-कम नौ अन्य जलडमरूमध्य पर भी ऐसी ही मांग उठ सकती है। इनमें दक्षिण-पूर्व एशिया का मलक्का जलडमरूमध्य भी है, जो सिंगापुर के पास अपने सबसे संकरे बिंदु पर 1.7 मील चौड़ा है और दुनिया के समुद्री व्यापार का 25 फीसद हिस्सा संभालता है; जिब्राल्टर जलडमरूमध्य, जो अटलांटिक महासागर को भूमध्य सागर से जोड़ता है; और बाब-अल-मंडेब, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और स्वेज नहर के प्रवेश द्वार के रूप में काम करता है।

अमेरिका और ईरान के बीच 48 सालों में पहली सीधी बातचीत हुई।  इसके ‘असफल’ होने की बात मीडिया में छाई हैं। दोनों पक्षों में दशकों के अविश्वास, जिसे ट्रंप के आक्रामक रवैये ने और बढ़ा दिया था, को देखते हुए यह उम्मीद बेमानी थी कि बातचीत के पहले दौर में बड़ी सफलता मिल जाएगी। यह मानने की वजह है कि कई मुद्दों पर सैद्धांतिक रूप से सहमति बनी, हालांकि ईरान द्वारा अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने के तौर-तरीकों पर सहमति नहीं बनी थी। 26 फरवरी को जिनेवा में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच हुई अप्रत्यक्ष बातचीत में मध्यस्थता करने वाले ओमान के विदेश मंत्री सैय्यद बदर अलबुसैदी ने बातचीत में ‘काफी प्रगति’ की बात कही है। ‘ले मोंडे’ ने रिपोर्ट किया, ‘खाड़ी देश (ओमान) का कहना है कि ईरान यूरेनियम का जीरो स्टॉक रखने और मौजूदा संवर्धित सामग्री को ईंधन में बदलने पर राजी है। इसे अभूतपूर्व सफलता बताया जा रहा है।’

जैसा कि ट्रंप कहते हैं, कोई भी समझौता रिपब्लिकन के लिए निस्संदेह राहत की बात होगी। लेकिन यह शायद आगे आने वाली चुनावी चुनौतियों से पूरी तरह पार पाने के लिए काफी न हो। और इस बीच, कौन जाने कि ट्रंप आगे क्या करें?