आकार पटेल / अपने हाथों अमेरिका को बरबाद करने पर तुले हैं ट्रंप
पुराने समय के बड़े साम्राज्य आमतौर पर लंबे समय में खत्म हुए। लेकिन किसी भी बड़ी शक्ति ने खुद को उतना नुकसान नहीं पहुंचाया जितना आज अमेरिका ट्रंप के हाथों कर रहा है।

अमेरिका में तारीफ़ करने लायक बहुत कुछ है, और ऐसा भी कम नहीं है जिसे नापसंद किया जाए। सबसे ज़्यादा तारीफ़ करने लायक बात यह है कि यह दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली लोगों को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहता है, और उन्हें अपने यहां आने के लिए खुला न्योता देता है।
अमेरिका की लगभग 15 फीसदी आबादी ऐसी है जो विदेश में पैदा हुई है। इसमें 50 लाख भारतीय भी शामिल हैं, और यह असल में अमेरिका की एक बड़ी दौलत है। कोई भी देश, जैसे भारत, एक बच्चे को पालने-पोसने और पढ़ाने-लिखाने, खाना खिलाने, रहने की जगह देने और कपड़े पहनाने में संसाधन खर्च करता है। बच्चा भारतीयों द्वारा सब्सिडी पाए हुए सबसे अच्छे सरकारी संस्थानों में पढ़ता है, और फिर 20 साल की उम्र में हमेशा के लिए अमेरिका चला जाता है। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और टेस्ला जैसी अमेरिकी कंपनियों और वहां के विश्वविद्यालयों को विदेश से आए ऐसे लोगों की प्रतिभा से लाभ होता है।
इन सब पर निवेश यहां हुआ, और उसका फायदा वहां हो रहा है।
अमेरिका जैसी यह काबिलियत कुछ हद तक यूरोप ने भी अपनाई है। लेकिन चीन या भारत जैसे देशों में ऐसा नहीं है। हम न तो बाहर की प्रतिभा को आकर्षित करते हैं और न ही हम उसे चाहते हैं। अगर ईमानदारी से कहें तो हममें से लगभग ऐसे सभी लोग जो विदेश जाने की कुव्वत रखते हैं, विदेश चले जाते हैं, और आंकड़ों से ऐसा साबित भी होता है। आज, अमेरिका इसे खत्म कर रहा है और उसका इरादा इतना पक्का है कि वह इसके लिए अमेरिकी कस्टम एंड इमिग्रेशन के हथियारबंद लोगों द्वारा आप्रवासियों की तलाश में उनके हाथों हो रही अपने नागरिकों की हत्याओं को भी ठीक मान रहा है। अमेरिका की तारीफ करने वालों को इसकी उम्मीद नहीं थी।
दूसरी तरफ, जो लोग दुनिया में अमेरिका के बर्ताव के बारे में जानते हैं, खासकर दूसरे विश्व युद्ध के बाद, उन्हें हमेशा वहां कुछ न कुछ बुरा नजर आता है। एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और यहां तक कि यूरोप में उसके लगातार दखल से करोड़ों लोगों को तकलीफें हुईं और उनका नुकसान हुआ है। 1950 के दशक में कोरियाई युद्ध से लेकर 1990 के दशक में सर्बिया तक और फिर 9/11 के बाद की उसकी बाजीगरी तक, हमेशा ऐसा ही रहा है।
मेरे हिसाब से, ऐसा पहली बार हो रहा है कि अमेरिका ने ऐसा रास्ता अपनाया है जब वह उस चीज़ को खत्म कर रहा है जिसकी तारीफ की जानी चाहिए, और उस चीज़ पर ज़ोर दे रहा है जिसे नापसंद किया जाता है। अमेरिका के दरवाजे इमिग्रेशन के लिए बंद करके, वह अपना ही नुकसान कर रहा है। भारत वह देश है जहां एच1B वीज़ा पाने वाले सबसे ज़्यादा लोग हैं। ऐसा वीजा कुल लोगों का लगभग दो-तिहाई। यह सच है कि ये लोग भारत में नहीं रहना चाहते और अगर मौका मिले तो अमेरिका जाना चाहते हैं, लेकिन वे किसी भी कंपनी में ऐसी प्रतिभा दिखाते हैं जिसकी नकल करना आसान नहीं है।
इसी तरह, ऐसे लोग भी जो बिना कागजात या अवैध तरीके से अमेरिका आते हैं, वे भी इसलिए आते हैं क्योंकि वे कुछ कर दिखाना चाहते हैं। ऐसे लोगों को देश से निकालना और दूसरों को आने से रोकना, जैसा कि अभी हो रहा है, अमेरिका पर बुरा असर डाल रहा है और आगे भी डालेगा। पिछले एक साल में अमेरिका में बेरोज़गारी बढ़ी है क्योंकि इमिग्रेशन पर हमले बढ़े हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि ऐसे कदमों से अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ है। जिस चीज़ की तारीफ़ होनी चाहिए थी, उसे बुरा साबित कर दिया गया है।
दूसरी तरफ देखें, तो अमेरिका एक ऐसा रास्ता अपना रहा है जो विदेशों में हिंसा के मामले में अपनी साम्राज्यवादी सोच को जारी रखता है, लेकिन अब इसमें एक और तेज़ी आ गई है। यह साम्राज्यवाद हम वेनेजुएला पर हमले, उसके नेता और उसकी पत्नी के अपहरण, और उसके तेल भंडार पर कब्जे खुली मांग में देख सकते हैं। इस घटना में दर्जनों लोगों की हत्या हुई, लेकिन अमेरिकी प्रेस में इसका बहुत कम ज़िक्र हुआ और कोई सहानुभूति नहीं दिखाई गई। ईरान पर बमबारी और इज़राइल को उसके सभी पड़ोसियों पर हमला करने में मदद करना भी दूसरे विश्व युद्ध के बाद के आम ट्रेंड का हिस्सा है।
ट्रम्प ने जो नया तरीका अपनाया है, वह है बेरहमी के साथ अपने सहयोगियों पर हमला किया है। उन्हें कनाडा चाहिए, उन्हें ग्रीनलैंड चाहिए, उन्हें पनामा नहर चाहिए। बेचारे यूरोपीय, जो लंबे समय से सिर्फ़ नस्ल के आधार पर अमेरिका के साथ भाईचारा मानते आए हैं, वे डरे हुए हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा कि कैसे रिएक्ट करें। उन्होंने एकजुट होने का दिखावा तो किया है, लेकिन अगर ट्रम्प अपने सैनिकों को ग्रीनलैंड भेज देते हैं, तो वे ज़्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे।
जापान और कोरिया, ऐसे देश हैं जिन्होंने सुरक्षा और व्यापार में अमेरिका का साझीदार बनने के लिए खुद से पहल की थी और जो दशकों से सहयोगी रहे हैं, उन्हें अब ट्रेड डील के लिए ब्लैकमेल किया जा रहा है। भारत, जो अमेरिका के करीब रहना चाहता था, खासकर पिछले दो बार के प्रधानमंत्रियों के समय में, और जिसके नेता ने अमेरिका में भारतीयों से ट्रंप को वोट देने के लिए कहा था, वह भी भौंचक है।
हम उस नाकाबिलियत और पूरी नासमझी के बारे में बात कर सकते हैं जिसके साथ हमारी सरकार ने ट्रंप की तरफ हाथ बढ़ाया है, लेकिन फिलहाल इसे छोड़ सकते हैं। आज हम अमेरिका और वह खुद के साथ क्या कर रहा है, इस बारे में बात कर रहे हैं।
पुराने समय के बड़े साम्राज्य आमतौर पर लंबे समय में खत्म हुंए। रोम को खत्म होने में सदियां लग गईं। आधुनिक युग में, यह तेज़ी से हो रहा है। अंग्रेज 1911 में दिल्ली की ऊंचाइयों से गिरकर युद्ध के बाद 1945 में गंभीर संकट में आ गए। सोवियत संघ कुछ ही हफ़्तों में गायब हो गया। लेकिन इनमें से किसी भी बड़ी शक्ति ने खुद को उतना नुकसान नहीं पहुंचाया जितना आज अमेरिका कर रहा है।
ट्रम्प उन दूसरे देशों से आई प्रतिभाओं को नफ़रत से खारिज कर रहे हैं जिसने अमेरिका को इतना कुछ दिया है, और उस सिस्टम को खत्म कर रहे हैं - यानी 'नियमों पर आधारित व्यवस्था' - जिसे अमेरिका ने खुद दुनिया पर राज करने के लिए बनाया था।
ट्रंप ने जो किया है और कर रहे हैं, उससे अमेरिका को फौरी और दीर्घ अवधि में नुकसान हुआ है। यह उन लोगों के लिए उतना ही दुखद है जिन्होंने लंबे समय से अमेरिका की तारीफ़ की है, जितना कि उन लोगों के लिए संतोषजनक है जो उसके कामों को नापसंद करते हैं।
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