भारत के प्रति 'दुश्मन' जैसा सलूक कर रहे हैं ट्रंप, आखिर देश के लिए कब मुंह खोलेंगे नरेंद्र मोदी
अमेरिका ऐसा ‘दोस्त’ है, जिसपर भरोसा नहीं किया जा सकता कि कब कैसा रुख अपनाएगा और इसका उदाहरण हाल-फिलहाल देखने को भी मिला है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के प्रति आक्रामक, या कहें कि काफी हद तक दुश्मनों जैसा, सलूक कर रहे हैं और अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं कि होंठ सिले हुए हैं। इससे मोदी के समर्थक भी हताश-निराश हैं, उन्हें लग रहा है कि वे जिस व्यक्ति पर उसकी जिस खासियत के लिए यकीन कर रहे थे, वह छलावा के अलावा कुछ भी नहीं था क्योंकि मोदी ने कभी किसी ताकतवर देश के नेता के सामने साहस नहीं दिखाया। ऑपरेशन सिंदूर के फौरन बाद 14 जून 2025 को वाशिंगटन डी.सी. में होने वाले अमेरिकी सैन्य दिवस समारोह में शामिल होने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर को अमेरिकी न्योता भारत के लिए एक और बड़ा झटका है।
ट्रंप व्यापार को सामूहिक विनाश के औजार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। कृषि और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में भारतीय टैरिफ में कमी पर बात चल रही है- दोनों ही भारत के लिए नुकसानदेह होंगे। अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने से भारतीय किसानों को नुकसान होगा। सस्ती अमेरिकी कारें भारतीय मोटर निर्माताओं का जीना मुश्किल कर देंगी। विदेश विभाग में दक्षिण एशिया के लिए सहायक मंत्री के अहम पद के लिए ट्रंप द्वारा नामित पॉल कपूर ने भारत और पाकिस्तान के प्रति समान नजरिया रखने की बात कही है।
जब मैक्सिको और कनाडा व्यापार और टैरिफ पर ट्रंप के सामने नहीं अड़े तो ट्रंप पीछे हट गए। चीन, जिसकी प्रगति और समृद्धि काफी हद तक अमेरिका के लिए विनिर्माण और निर्यात पर आधारित है, वह पीछे नहीं हटा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की, ‘चीन के साथ हमारी डील हो गई है।’ लेकिन सीएनएन ने टिप्पणी की- ‘ट्रंप की भाषा में, चीन इस समझौते के बाद अमेरिका के साथ पहले की तुलना में ज्यादा निष्पक्ष व्यवहार नहीं कर रहा।’ अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार चीन 10 से 55 फीसद तक शुल्क का भुगतान करेगा, जबकि अमेरिकी व्यापार के दृष्टिकोण से 145 फीसद, जैसी कि ट्रंप ने पहले घोषणा की थी।
भारत ने ट्रंप के उस बयान का खंडन किया है जिसमें कहा गया था कि भारत द्विपक्षीय शुल्क शून्य करने पर सहमत हो गया है। 9 जुलाई की समयसीमा से पहले अंतरिम सहमति पर पहुंचने के लिए भारत की ओर से यही सब सुनने को मिला है, जिसके तहत अमेरिका को भारत से होने वाले सभी निर्यातों पर 26 फीसद शुल्क लगाया जाएगा। यह भारत द्वारा अब तक दिए जा रहे औसत शुल्क से काफी ज्यादा होगा और अमेरिका से होने वाले आयात से मिलने वाले शुल्क से काफी कम।
ट्रंप को जब भी मौका मिलता है, वह इस बात का बखान करते हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया सैन्य तनातनी में कैसे संघर्षविराम कराया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इससे इनकार किया है। लेकिन पाकिस्तान इसके लिए बार-बार ट्रंप की तारीफ कर रहा है और उन्हें धन्यवाद दे रहा है। पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए भारत के बहु-प्रतिनिधिमंडलीय हमले का मुकाबला करने के लिए एक पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने न केवल अमेरिका में, बल्कि लंदन, ब्रुसेल्स और पेरिस में भी इस बात पर जोर दिया। पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने दावा किया कि ट्रंप ने संकेत दिया था कि वे कश्मीर पर दोनों पक्षों के बीच किसी तटस्थ स्थान पर मध्यस्थता करेंगे। यह सुनना अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए काफी सुखद होगा। उधर, गौर करने वाली बात है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने एक शब्द भी नहीं कहा है।
‘बिजनेस वर्ल्ड’ की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल, जिसमें ट्रंप के बेटे एरिक और डॉनल्ड जूनियर के अलावा उनके दामाद जेरेड कुशनर बहुसंख्यक शेयरधारक हैं, ने हाल ही में पाकिस्तान क्रिप्टो काउंसिल के साथ एक करार पर दस्तखत किए हैं। इसके अलावा, ट्रंप की खासी दिलचस्पी ‘रेयर अर्थ मेटेरियल’ में है, जिसकी पाकिस्तानी प्रांत बलूचिस्तान में कोई कमी नहीं है। ऐसी खबरें हैं कि चीन और रूस दोनों की ही पाकिस्तान को ब्रिक्स में जगह देने में दिलचस्पी है, जबकि ट्रंप चाहते हैं कि भारत ब्रिक्स से बाहर हो जाए। इसलिए 7-8 जुलाई, 2025 को होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन काफी अहम है। इसमें प्रधानमंत्री मोदी के शामिल होने की उम्मीद है।
पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराने और बांग्लादेश को जन्म देने के लिए 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारत को सोवियत संघ द्वारा दिया गया ऐतिहासिक समर्थन अब अतीत की बात हो गई है। कह सकते हैं कि यह अब इतिहास बन चुका है। फिर भी, भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर का मानना है कि भारत-रूस संबंध ‘विश्व राजनीति में अचल’ है। 2014 से मोदी-आधारित भारतीय विदेश नीति के परिणामस्वरूप रूस और पाकिस्तान के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास हुए हैं और रूस ने उसे एमआई-35 अटैक हेलीकॉप्टर, एंटी-टैंक सिस्टम और वायु रक्षा उपकरण बेचे हैं।
सामूहिक तौर पर भारतीयों को निकाल बाहर करने और ऐसे ही और भी लोगों को वापस भारत भेजने की धमकियों के बाद हाल की एक घटना गौर करने वाली है। एक व्यक्ति को वापस भारत भेजा जा रहा था और नेवार्क हवाईअड्डे पर उसे हथकड़ी लगाकर जमीन पर गिरा दिया गया। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि वह अवैध अप्रवासी था। वैसी स्थिति में उसे वापस भेजना तो ठीक है, लेकिन क्या उसे सार्वजनिक रूप से ऐसे अपमानित करना चाहिए था? अमेरिका और भारत के बीच आधिकारिक तौर पर ‘व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ है। इस समझौते के मुख्य छह आधारों में से एक है दोनों देशों के लोगों के बीच के रिश्तों को बढ़ावा देना।
अमेरिका ने साफ कर दिया है कि अगर सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति का कोई भी पोस्ट अमेरिकी राष्ट्रपति या प्रशासन की नीतियों की आलोचना करने वाला पाया जाता है तो उस व्यक्ति को वीजा देने से मना किया जा सकता है या अमेरिका से निकाल बाहर किया जा सकता है। 1950 के दशक में जब एक अतिवादी अमेरिकी सीनेटर जोसेफ मैकार्थी और उनके समर्थकों ने कुछ अमेरिकियों के खिलाफ तीखा हमला किया और उन पर कम्युनिस्टों से संबंध रखने का आरोप लगाया। इससे वर्तमान जैसा ही भय का माहौल पैदा हो गया। आखिरकार, मैकार्थी के आरोप निराधार पाए गए। सीनेट ने उनकी निंदा की।
दोनों देशों के उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करने को दोनों देशों के नागरिकों के बीच बेहतर तालमेल के साधन के रूप में प्रचारित किया गया। हालांकि ट्रंप की इस उद्देश्य में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली आव्रजन नीति भारतीय छात्रों को परेशान करने, उन्हें अमेरिका छोड़कर चले जाने के लिए और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने वालों को वीजा देने में देरी करने या इससे इनकार करने की हद तक चली गई है। मोदी और उनके मंत्री चुपचाप देखते रहे हैं। इस प्रकार वे अपने पीड़ित देशवासियों के पक्ष में खड़े होने में विफल रहे हैं।
अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन में कहा गया है, ‘कांग्रेस (अर्थात् सीनेट और प्रतिनिधि सभा) किसी धर्म की स्थापना का सम्मान करने, या बेरोकटोक इसके आचरण पर रोक लगाने, या अभिव्यक्ति या प्रेस की स्वतंत्रता को घटाने, या लोगों के शांतिपूर्वक एकत्र होने और शिकायतों को हल करने के लिए सरकार को याचिका देने के अधिकार के खिलाफ कोई कानून नहीं बनाएगी।’ इसे देखते हुए, छात्रों का विरोध करने, स्वतंत्र राजनीतिक विचार रखने, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके प्रशासन का विरोध करना और अंतरराष्ट्रीय मामलों में रुख अपनाना भी शामिल है, का अधिकार है।
उन्हीं स्वतंत्रताओं पर अब ट्रंप खतरनाक तरीके से हमला कर रहे हैं। किसी व्यक्ति को इसलिए निशाना बनाना कि उसने राष्ट्रपति की आलोचना की तो हो ही रहा है, स्थिति यह है कि फिलिस्तीन समर्थक या इजरायल विरोधी रुख भी व्हाइट हाउस के मौजूदा मुखिया को मंजूर नहीं। यही वजह है कि सोशल मीडिया गतिविधि की व्यापक जांच अमेरिका में विदेशी शिक्षाविदों को आतंकित कर रही है। ट्रंप की सोच के उलट की गई कोई भी पोस्ट किसी विदेशी छात्र को अमेरिका से बेदखल करने या उसके वीजा आवेदन को खारिज करने के लिए काफी है।
इस तरह अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय खौफ में जी रहे हैं कि उनका दरवाजा इमिग्रेशन वाले कभी भी खटखटा सकते हैं। भारत के जिन लोगों ने अमेरिका से उच्च शिक्षा पाने के लिए पैसा और समय लगाया, वे सकते में हैं। बेशक वीजा देना या रद्द करना हर देश का संप्रभु अधिकार है, लेकिन ऐसे फैसले कानून के दायरे में होने के साथ-साथ व्यक्ति के आर्थिक और मानवाधिकारों का सम्मान करने वाले होने की उम्मीद की जाती है।
अमेरिका में स्थायी निवास या नौकरी कर रहे भारतीय भी सुरक्षित नहीं हैं। अगर वे ट्रंप की सोच के साथ नहीं हैं, तो अमेरिका में रहने की उनकी अवधि मनमाने ढंग से खत्म हो सकती है। भारतीयों को वर्क वीजा आवंटित करने पर भारत-अमेरिका समझौता- जो अमेरिकी बाजार में भारत की आईटी और अन्य कंपनियों के प्रतिस्पर्धी होने के लिए अहम है- व्यावहारिक रूप से खतरे में आ गया है। फिर से, मोदी या उनके किसी भी मंत्री ने विरोध में कुछ नहीं कहा। बीबीसी ने बताया कि ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बिग एंड ब्यूटीफुल बिल’ में ऐसा भी प्रावधान है जिससे भारत को भेजे जाने वाले पैसे पर ज्यादा शुल्क लगा करेगा।
जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1984 में भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री, भारतीय वायुसेना के टेस्ट पायलट राकेश शर्मा से पूछा कि अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है, जबकि वे सोवियत अंतरिक्ष यान पर पृथ्वी का चक्कर लगा रहे थे, तो उन्होंने उत्तर दिया था- ‘सारे जहां से अच्छा’। उसी तरह भारतीय वायुसेना के शुभांशु शुक्ला अब अमेरिकी अंतरिक्ष मिशन एक्सिओम-4 पर अंतरिक्ष यात्री हैं और अगर उनसे अमेरिका के बारे में यही सवाल पूछा जाए तो शायद उनका जवाब हो- यह तो जल रहा है!
डूबती अमेरिकी अर्थव्यवस्था से लेकर दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति एलन मस्क के साथ ट्रंप के झगड़े की बात हो, लॉस एंजिल्स और अन्य अमेरिकी शहर में हो रहे दंगों की बात हो, अमेरिका वास्तव में जल रहा है। 2025 की पहली तिमाही में अमेरिका की अर्थव्यवस्था में 0.3 फीसद की सिकुड़न आई है, अप्रैल में कुल कीमतों में 2.3 फीसद की वृद्धि हुई, डॉलर अन्य मुद्राओं के मुकाबले नरम हुआ और ऐसी स्थिति में राजकोषीय घाटे में वृद्धि की आशंका है। इसके साथ ही ट्रंप की टैरिफ बाधाओं ने आयात को घटा दिया है, इसलिए उच्च घरेलू उत्पादकता की मांग है, जिसे साकार होने में कम से कम 5-10 साल लगेंगे।
उधर, ट्रंप के साथ सोशल मीडिया पर तू-तू मैं-मैं के बाद मस्क ने सुलह का संकेत देते हुए कहा कि उन्हें ट्रंप के बारे में एक्स पर किए गए अपने कुछ हमलों पर खेद है। हाल ही में दोनों का रिश्ता एक-दूसरे को धमकी देने के स्तर तक गिर गया था। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मस्क रिपब्लिकन पार्टी के अंदर और बाहर ट्रंप विरोधियों को पैसे देने तक को तैयार हो गए थे ताकि कांग्रेस में ट्रंप के खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए पर्याप्त वोट जुटाए जा सकें।
टेस्ला कारों और हाई-स्पीड इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली स्टारलिंक के अरबपति मालिक मस्क अपने इन दोनों व्यवसाय को भारत लाने के इच्छुक हैं और उन्होंने दावा किया था कि न्यूयॉर्क के कुख्यात दिवंगत सेक्स ट्रैफिकर जेफरी एपस्टीन से संबंधित फाइलों में ट्रंप का भी नाम है। मस्क ने आरोप लगाया था- ‘यही असली वजह है कि उन्हें (फाइलों को) सार्वजनिक नहीं किया गया है।’ इस आरोप ने विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को मौका दे दिया कि वे मामले के हर पहलु को सामने लाने की मांग करें। उधर, इससे बिफरे ट्रंप ने जवाबी हमला करते हुए मस्क को आगाह किया कि अगर उन्होंने (मस्क ने) उनके विरोधियों को पैसे दिए तो उन्हें ‘गंभीर नतीजे’ भुगतने होंगे। इसलिए, ट्रंप भारत में टेस्ला और स्टारलिंक का स्वागत करने वाले मोदी को कैसे देख रहे होंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
इस बीच, सबसे खतरनाक बात यह रही कि सीएनएन की उस रिपोर्ट ने सुर्खियां बटोरीं जिसमें कहा गया था- ‘ट्रंप घरेलू धरती पर अमेरिकी सैनिकों का इस्तेमाल करने के लिए लॉस एंजेलिस मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं।’ ट्रंप ने लॉस एंजिल्स में अमेरिकी नेशनल गार्ड्स को तैनात किया। शहर या कैलिफोर्निया राज्य ने इसके लिए नहीं कहा था, जबकि वैधानिक तौर पर राज्य से ऐसा अनुरोध मिलना जरूरी था। ट्रंप ने मध्य और दक्षिण अमेरिकी मूल के स्पैनिश बोलने वाले लोगों द्वारा किए जा रहे दंगों से निपटने के लिए अमेरिकी मरीन को भी स्टैंडबाय पर रखा है। इन समुदायों के खिलाफ आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन एजेंसी अवैध अप्रवासियों को शरण देने के आरोप में छापेमारी कर रही हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए भावी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार माने जाने वाले कैलिफोर्निया के गवर्नर गैविन न्यूजॉम ने कहा है कि अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरे की वह घड़ी आ गई है जिसकी लंबे समय से आशंका थी। लॉस एजेंलिस में जो दंगा शुरू हुआ वह कैलिफोर्निया के अन्य हिस्सों, टेक्सास राज्य के शहरों, न्यूयॉर्क, शिकागो, अटलांटा, फिलाडेल्फिया, वाशिंगटन, बोस्टन और सिएटल तक फैल गया है। प्यू रिसर्च सेंटर के एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि केवल पांच देशों में बहुमत ने कहा कि उन्हें ट्रंप पर ‘कुछ’ या ‘बहुत’ भरोसा है कि वे सही काम करेंगे: नाइजीरिया (79%), केन्या (74%), इजराइल (69%), हंगरी (53%) और भारत (52%)।
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