बापू तो सत्य को ईश्वर मानते थे, उनके राम तो अजन्मे, अद्वितीय हैं, समान रूप से सबके हैं...

जब बापू से पूछा गया कि वह किस राम की आराधना करते हैं? तब उन्होंने कहा – मेरा राम, मेरी प्रार्थनाओं का राम कोई ऐतिहासिक दशरथ नंदन, अयोध्या का राजा राम नहीं। वह तो आदि, अजन्मा, अद्वितीय है। वह समान रूप से सबका है।

फोटो : सोशल मीडिया
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मीनाक्षी नटराजन

बापू को यदि सदी का सबसे आस्थावान ‘हिंदू’ कहा जाए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी हर सांस ‘राम’ को समर्पित थी। ‘राम’ ही उनका अंतिम शब्द भी था।

आज हम एक ऐसे माहौल में हैं, जहां ‘जय श्रीराम’ का नारा दोहराने के लिए मजलूम को सताना जायज ठहराया जाता है। सभ्य कहलाते नागरिक समाज से जोर-आजमाइश करते समूहों को कोई फटकार नहीं मिलती। कुछ ही महीनों पहले उत्तराखंड में एक प्यासे को मंदिर में आकर पानी पीने के लिए बुरी तरह मारा गया। प्यासे को पानी देना धर्म नहीं रह गया। अब प्यासों का भी धर्म पूछा जाने लगा। उना के दलितों की पीठ पर से कोड़ों के निशान मिटे नहीं हैं।

हाल में पचास के करीब विश्वविद्यालयों और शोध एवं अध्ययन केंद्रों द्वारा ‘हिंदू और हिंदुत्व’ को समझने के लिए तीन दिवसीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के वक्ताओं के मेल बॉक्स नफरत, धमकी और हिंसा से भर गए। एक विदुषी वक्ता को तो यह तक लिखा गया कि उसके बच्चे रोगी हो जाएंगे। इतने हिंसक वातावरण में क्या ‘धर्म’ को पुनः समझने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए? बापू के लिए ‘हिंदू’ होने का आखिर क्या मतलब था? क्या ‘हिंदू’ धर्म इतनी नफरत, हिकारत और हिंसा की इजाजत देता भी है? गांधी के ‘राम’ कौन थे?

अक्सर सुनते हैं कि ‘ईश्वर’ ‘सत्य’ है। लेकिन बापू कहते थे कि ‘सत्य’ ही ईश्वर है, यानी आस्था के गर्भ में सत्य है। ऋग्वेद (10/190/1) ‘ऋत’ और ‘सत’ को ही पहला पहल कहता है। ‘ऋत’ माने नैसर्गिक चर्या। ‘सत’ का बीज शब्द ‘अस’ है। ‘अस’ माने ‘जो है’। ‘सत’ ही है, बाकी किसी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। ऋत और सत का समागम ही धर्म है। बृहदारण्यक उपनिषद, योग वशिष्ठ, आदि अनेक ग्रंथ धर्म, चैतन्य, ब्रह्म, ईश्वर को ‘सत्य’ के ही रूप में परिभाषित करते हैं। ‘सत्य’ ही ईश्वर है कहते ही जैसे आधार ही बदल जाता है। सत्य का अन्वेषण ही धर्म है। अपनी अपूर्णताओं का आत्म साक्षात्कार इस सत्यान्वेषण की यात्रा का पहला पड़ाव है। ज्यादातर लोग अपने जीवनकाल में यहां तक पहुंच ही नहीं पाते। बापू पहुंच सके। इस पड़ाव तक पहुंचने के बाद व्यक्ति ‘अन्यपन’ के बोझ से मुक्त हो जाता है। अव्वल तो उसके लिए तब कोई भी ‘दूसरा’ नहीं रह जाता। दूसरों की कमियों में उसे अपनी खामियों का प्रतिबिंब दिखाई देने लगता है। अतः वह किसी को ‘सुधारता’ नहीं है। केवल खुद को दुरुस्त करता जाता है। फिर वह सबको उनकी दृष्टि से देखता है। अपनी दृष्टि से किए गए अन्वेषण और उससे उपजते निष्कर्ष को औरों पर नहीं थोपता। पहले पड़ाव के बाद धर्म रूपी मुक्ति की यात्रा आरंभ होती है। मगर अहिंसा के अनिवार्य अभ्यास के बिना यह असंभव है।


तभी बापू अहिंसा को सत्यान्वेषण का जरिया मानते थे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (आवश्यकता से अधिक को चोरी मानना), ब्रह्मचर्य (अनासक्ति) और असंग्रह; हमारे आध्यात्मिक फलसफे के ‘यम’ ‘नियम’, यानी व्यक्तिगत एवं सामुदायिक संहिता के पहले पांच सूत्र माने गए हैं। बापू के एकादश व्रत का यही स्रोत है। धर्म की ऐसी समझ के बाद उसे किसी रूढ़ी, विवाद, आडंबर या ढकोसलों में बांधा नहीं जा सकता। वह तो निर्लिप्त, समावेशी, निर्बंध आत्मचिंतन की प्रवाहमान धारा है। तभी हमारे लोक समाज मे ‘संगम’ का इतना महत्व है। विभिन्न नदियों की जलधारा का समागम संगम कहलाता है। वैसे ही धर्म विभिन्न सत्यान्वेषण की धारा का संगम है। उसका कोई वाद नहीं, वह धारा है। उसे कर्मकांड में कैद करना, परिधि में बांधना क्या अ-धर्म नहीं?

धर्म गतिमान है और उसकी गतिअत्यंत सूक्ष्म भी है। ईश्वर को आवरण, अलंकरण, आकार और गुण रहित अमावस के चांद की उपमा संत ज्ञानेश्वर की ‘ज्ञानेश्वरी’ में दी गई है। ‘सत्य’ ईश्वर है के बाद ईश्वर का कोई बिंब नहीं हो सकता या फिर वह किसी भी बिंब में दिखाई दे सकता है। उसका कोई तय स्थान या मंदिर भी नहीं हो सकता। वह तो कण-कण में है। ईश्वर के साथ कोई अनुबंध या सौदा नहीं हो सकता। ईश्वर पास करा दे, आयु लंबी कर दे या पद दिला दे-जैसी मन्नतें बचकानी हो जाती हैं। इसके बजाय खुद में उसको ढूंढना और सब में खुद को पाना। यह वास्तविक लगता है।

बापू तो हर शास्त्र और शास्त्र पर की जाती टीका के लिए भी सत्य, अहिंसा, अनासक्ति को मानक मानते थे। अहिंसा और सत्य की कसौटी पर जो खरा न उतरे, वह शास्त्र नहीं। जब उनसे पूछा गया कि वह किस राम की आराधना करते हैं? तब उन्होंने कहा – मेरा राम, मेरी प्रार्थनाओं का राम कोई ऐतिहासिक दशरथ नंदन, अयोध्या का राजा राम नहीं। वह तो आदि, अजन्मा, अद्वितीय है। वह समान रूप से सबका है। किसी मुस्लिम को भी यह नाम लेने से कोई गुरेज नहीं होगा। मगर उस पर कोई ऐसी बाध्यता नहीं होनी चाहिए। वह ईश्वर को ‘अल्लाह’ या ‘खुदा’ कहे तो कोई अंतर नहीं। (हरिजन28/4/46)

बापू का राम ‘सत्य’ है, सत्य के शोधन की राह दिखाने वाला है। बापू खुद को अनेकांतवादी कहते थे। जैनमत का यह सिद्धांत अहिंसा और सत्य का सर्वोत्तम अभ्यास है। ‘अनेकांतवाद’ किसी एक ही नजरिये को संपूर्ण सत्य नहीं मानता। हर वैविध्य को उतना ही सत्य मानता है जितना कि खुद के मार्गको समझता है। वास्तव में यही बापू की सनातनता की नींव है। अथर्व वेद सनातनता का सुंदर वर्णन करता है। जैसे दिन-रात अनादि होते हुए भी रोज नए कलेवर में आते हैं। वैसे ही ‘सनातन’ अनादि और पल-पल नवापन या नवाचार का मार्ग है। (संदर्भ-10/8/23) इसमें बहिष्कार, नफरत, भेद और हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं।

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