दो सप्ताह का विराम: युद्ध, वर्चस्व और शांति की कूटनीति का अंतराल

यह कहा जा सकता है कि यह दो सप्ताह का युद्धविराम एक “संभावना का क्षण” है- एक ऐसा क्षण, जहां से या तो एक स्थायी समझौते की दिशा में कदम बढ़ सकता है, या फिर एक और गहरे और व्यापक संघर्ष की ओर रास्ता खुल सकता है।

दो सप्ताह का विराम: युद्ध, वर्चस्व और शांति की कूटनीति का अंतराल
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शैलेंद्र चौहान

युद्ध कभी अचानक नहीं रुकते- वे ठहरते हैं, सांस लेते हैं, और फिर या तो नए रूप में लौटते हैं या किसी समझौते की भाषा में ढल जाते हैं। इस संदर्भ में हाल का दो सप्ताह का युद्धविराम एक साधारण कूटनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि शक्ति, दबाव और संभावना के बीच खिंची हुई एक महीन रेखा है। यह विराम उतना ही अर्थपूर्ण है जितना संदिग्ध - क्योंकि इसमें शांति की आशा भी छिपी है और रणनीतिक पुनर्संयोजन की तैयारी भी।

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किया गया यह ऐलान कि अमेरिका ने अपने सैन्य उद्देश्यों को न केवल हासिल किया बल्कि उनसे आगे निकल गया है, इस पूरे घटनाक्रम को एक विशेष राजनीतिक स्वर देता है। यह स्वर विजय का है, नियंत्रण का है, और उस आत्मविश्वास का है जो बातचीत की मेज पर अपनी शर्तों को निर्णायक बनाने की कोशिश करता है। लेकिन इसी के समानांतर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की ओर से यह दावा कि “मैदान में जीत” को अब राजनीतिक रूप दिया जाएगा, इस बात को स्पष्ट करता है कि यह विराम दरअसल दो विजयों के बीच की प्रतिस्पर्धा है- एक वास्तविक, एक कथात्मक।

लेकिन इसी के समानांतर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का बयान एक अलग कथा प्रस्तुत करता है। वहां “मैदान में जीत” की बात कही जा रही है, और इस युद्धविराम को उस जीत को राजनीतिक वार्ता में परिवर्तित करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। यह द्वंद्व - दोनों पक्षों द्वारा अपने-अपने विजय-आख्यान का निर्माण - आधुनिक कूटनीति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़ा जाता, बल्कि कथाओं, दावों और धारणाओं के माध्यम से भी लड़ा जाता है।

इस पूरे परिदृश्य में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भूमिका केंद्रीय है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी है, जहां से विश्व के तेल का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। ट्रंप द्वारा इस स्ट्रेट को “पूरी तरह, तुरंत और सुरक्षित तरीके से खोलने” की शर्त रखना यह दर्शाता है कि अमेरिका के लिए यह केवल सैन्य या राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और भू-रणनीतिक हितों का प्रश्न भी है। यदि ईरान इस जलमार्ग पर नियंत्रण बनाए रखता है, तो वह वैश्विक ऊर्जा बाजार पर एक प्रकार का दबाव बना सकता है; वहीं यदि अमेरिका इसे खुला और सुरक्षित सुनिश्चित करता है, तो वह अपने सहयोगियों- विशेषकर पश्चिमी देशों और एशियाई ऊर्जा आयातकों - को आश्वस्त करता है।

यहां शहबाज शरीफ और आसिम  मुनीर की भूमिका भी अत्यंत दिलचस्प है। पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में एक मध्यस्थ के रूप में उभरता दिखाई देता है। इस्लामाबाद में वार्ता का प्रस्ताव केवल एक स्थान-निर्धारण नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय कूटनीति में अपनी प्रासंगिकता और प्रभाव को पुनर्स्थापित करना चाहता है। लंबे समय से आंतरिक आर्थिक और राजनीतिक संकटों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह एक अवसर है कि वह स्वयं को एक “समाधानकर्ता” के रूप में प्रस्तुत करे।

हालांकि, इस मध्यस्थता के पीछे भी कई स्तरों की जटिलताएं हैं। पाकिस्तान के ईरान के साथ संबंध ऐतिहासिक रूप से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं, और अमेरिका के साथ उसका संबंध भी रणनीतिक निर्भरता और अविश्वास के बीच झूलता रहा है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस मध्यस्थता में पाकिस्तान कितना निष्पक्ष रह पाता है, और क्या वह वास्तव में एक प्रभावी संवाद-स्थल बन सकता है।


ईरान द्वारा प्रस्तुत कथित 10-बिंदु प्रस्ताव इस पूरे समझौते की धुरी है। इन बिंदुओं में जो मांगें सामने आती हैं- जैसे यूरेनियम संवर्धन को स्वीकार करना, सभी प्रतिबंध हटाना, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रस्तावों को समाप्त करना, और मुआवज़ा देना- वे अत्यंत महत्वाकांक्षी हैं। यदि अमेरिका वास्तव में इन शर्तों को स्वीकार करता है, तो यह न केवल ईरान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी, बल्कि वैश्विक अप्रसार व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा झटका हो सकता है।

यहां यह प्रश्न भी उठता है कि क्या अमेरिका वास्तव में इतनी दूर तक जाने को तैयार है। इतिहास हमें बताता है कि अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास की कमी गहरी और स्थायी रही है। जॉइंट कॉम्प्रेहेनसिव प्लान ऑफ एक्शन इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसे बाद में अमेरिका ने स्वयं ही छोड़ दिया था। ऐसे में यह संभावना कम ही लगती है कि अमेरिका बिना कठोर शर्तों के ईरान के परमाणु कार्यक्रम को स्वीकार कर लेगा।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू “दोतरफा युद्धविराम” की अवधारणा है। ट्रंप ने इसे एक पारस्परिक निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन वास्तविकता में यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों पक्ष इसे समान रूप से देख रहे हैं या नहीं। ईरान के बयान में शर्तों और अपनी उपलब्धियों पर अधिक जोर है, जबकि अमेरिका के बयान में नियंत्रण और उपलब्धि की भाषा प्रमुख है। यह असमानता भविष्य में किसी भी समझौते के लिए एक चुनौती बन सकती है।

इसके अतिरिक्त, इस युद्धविराम में “लेबनान की इस्लामिक रेजिस्टेंस” के खिलाफ कार्रवाई को रोकने की बात भी शामिल है, जो सीधे तौर पर हिजबोल्लाह की ओर संकेत करता है। इसका अर्थ यह है कि यह संघर्ष केवल अमेरिका और ईरान के बीच सीमित नहीं है, बल्कि इसमें क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्ष भी शामिल हैं। ऐसे में यदि यह युद्धविराम सफल होता है, तो इसका प्रभाव पूरे मध्य-पूर्व में देखा जा सकता है; और यदि यह विफल होता है, तो इसका परिणाम एक व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष के रूप में सामने आ सकता है।

इस पूरे परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह युद्धविराम कितनी स्थिरता प्रदान कर सकता है। दो सप्ताह का समय अत्यंत सीमित है, विशेषकर तब जब इतने जटिल और गहरे मतभेदों को सुलझाना हो। यह अधिक संभावना है कि यह समय दोनों पक्षों को अपनी-अपनी स्थिति को पुनर्संगठित करने, अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने और वार्ता की रणनीति तय करने का अवसर देगा।

आर्थिक दृष्टि से भी इस युद्धविराम का प्रभाव महत्वपूर्ण होगा। यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य खुला रहता है और तनाव कम होता है, तो वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता आ सकती है। लेकिन यदि वार्ता विफल होती है और संघर्ष पुनः शुरू होता है, तो तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता की संभावना बढ़ जाएगी। इस संदर्भ में यह युद्धविराम केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी निर्णायक महत्व रखता है।


राजनीतिक दृष्टि से, ट्रंप का यह कदम उनके घरेलू राजनीतिक एजेंडे से भी जुड़ा हुआ हो सकता है। एक मजबूत और निर्णायक नेता की छवि बनाना, जो युद्ध भी जीत सकता है और शांति भी स्थापित कर सकता है- यह अमेरिकी राजनीति में हमेशा से एक प्रभावी रणनीति रही है। इसी प्रकार, ईरान के लिए भी यह आवश्यक है कि वह अपने नागरिकों के सामने यह दिखाए कि उसने दबाव के बावजूद अपनी संप्रभुता और रणनीतिक हितों से समझौता नहीं किया है।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि यह दो सप्ताह का युद्धविराम एक “संभावना का क्षण” है- एक ऐसा क्षण, जहां से या तो एक स्थायी समझौते की दिशा में कदम बढ़ सकता है, या फिर एक और गहरे और व्यापक संघर्ष की ओर रास्ता खुल सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या दोनों पक्ष अपने-अपने दावों और शर्तों से आगे बढ़कर एक वास्तविक और व्यावहारिक समझौते तक पहुंच पाते हैं, या फिर यह विराम केवल एक अस्थायी ठहराव साबित होता है।

इस समय दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर निर्णय का प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संरचना को भी प्रभावित करेगा। दो सप्ताह का यह समय इसलिए केवल एक कूटनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि इतिहास के एक संभावित मोड़ की तैयारी भी है- जहां युद्ध और शांति के बीच की रेखा एक बार फिर खींची जा रही है।

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