महाराष्ट्र सरकार के 2 साल: उद्धव की शांत शैली, पवार की सियासी समझ और सोनिया-राहुल की नम्रता है गठजोड़ की बुनियाद

यह अब साफ है कि भाजपा ने महाराष्ट्र में अपनी जमीन खो दी है। बिजनेस-जैसी उद्धव की शैली, पवार की राजनीतिक कुशाग्रता और राहुल गांधी की नम्रता ने उन लोगों को एक साथ बांधे रखा है।

फोटो : सोशल मीडिया
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कुमार केतकर

अब तो विचारधारा बेकार है। सत्ता ही अहम है। दूसरों के हित के लिए जीने की बात अप्रासंगिक है। छल-कपट सत्ता को निर्धारित करती है। संस्थाओं को गुलाम बनाकर रखा गया है। उद्देश्य पुराने पड़ चुके हैं। भय छाया हुआ है। जब से केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए हैं, शासन-व्यवस्था के पैमाने बदल गए हैं।

महाराष्ट्र में महा विकास आघाड़ी सरकार अविश्वास के माहौल में उभरी। भारतीय जनता पार्टी का शिव सेना के साथ तीन दशकों के साथ साथ काम करने वाला संबंध था। यह हिन्दुत्व के विचार के आधार पर सतही तौर पर था। उस हिन्दुत्व की परिभाषा मुख्यतः ‘मुस्लिम-विरोधी’ होना था। शिव सेना का 1966 में गठन हिन्दुत्व की पहचान के सवाल पर नहीं हुआ था। लेकिन शिव सेना-जनसंघ-बीजेपी गठबंधन इसलिए बना क्योंकि दोनों पार्टियां अपने दम पर कांग्रेस से जूझने में कमजोर थीं।

लेकिन दोनों पार्टियों का सामाजिक गठन बहुत ही भिन्न था। भाजपा मुख्यतः शहरी, बड़े लोगों, उच्च जाति और मध्य तथा उच्च वर्गों की पार्टी थी। शिव सेना कामकाजी वर्ग के बीच बेरोजगार लोगों, निम्न मध्यवर्ग के युवा जिनकी न तो अच्छी शिक्षा थी और न जिनमें पेशेवर कुशलता थी, का गुस्सैल विस्फोट थी। युवाओं का यह वर्ग न तो कोई उम्मीद रख रहा था और न उसके पास भविष्य की कोई अपेक्षा थी। मराठी समुदाय, प्राथमिक तौर पर मुंबई में, के बीच चिंता यह थी कि वे महाराष्ट्र में पहचान और सम्मान के हकदार हैं। इसने अधिकतर मराठी भाषी लोगों, यहां तक कि मध्यवर्ग को लुभाया। ऐसा इसलिए कि सिर्फ छह साल पहले महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ था।

राजनीतिक तौर पर, पार्टियों के पास बढ़ने की कोई गुंजाइश नहीं थी। भाजपा अपने को ‘सम्माननीय’ मध्य वर्ग की पार्टी के तौर पर समझती थी और शिव सेना के बारे में उसका विचार था कि यह निम्न वर्ग की पार्टी है। फिर भी, सत्ता पर कब्जे के लिए ये दोनों साथ आए। भाजपा ने ‘प्रतिभा’ उपलब्ध कराई और शिव सेना ने सड़कों पर संघर्ष करने वाले लोग दिए। भाजपा में सब दिन एक किस्म की श्रेष्ठता मनोग्रंथि वाला खास वर्ग का तौर- तरीका था। औसत शिव सैनिक उनके प्रति भाजपा नेतृत्व के तिरस्कारपूर्ण लहजे से बराबर अपमानित महसूस करते थे। लेकिन दोनों को एक-दूसरे की जरूरत थी। शिव सेना ने हिन्दुत्व के लिए आक्रामक अभियान चलाना चुना और भाजपा ने उन्हें प्रोत्साहित करना आरंभ किया।

1995 में बहुसंख्यक सीटें जीतकर नहीं बल्कि अंकगणितीय अनिवार्यता की वजह से तथाकथित ‘भगवा गठबंधन’ सत्ता में आया। लेकिन तब शिव सेना ‘बड़ा भाई’ थी क्योंकि इसके पास भाजपा से अधिक सीटें थीं। खास उच्चता रखने का भ्रम पालने वाली भाजपा के लिए यह अस्वीकार्य था कि ‘राष्ट्रीय’ और ‘सांस्कृतिक तौर पर श्रेष्ठ’ होने के बावजूद उसे निम्न वर्ग के संगठन के नेतृत्व के अधीन काम करना पड़ेगा।

लेकिन 2014 में स्थिति पूरी तरह बदल गई। भाजपा अपने दम पर केन्द्र में बहुमत में आई और वह महाराष्ट्र में महत्वपूर्ण शक्ति बनगई। अब वह यहां भी दबंगई दिखाने लगी। उन लोगों ने शिव सेना नेतृत्व का अनादर, उनकी अनदेखी और उनके साथ दुर्व्यवहार आरंभ कर दिया। बालासाहब का 2012 में निधन हो गया। गुजराती मुख्यमंत्री के पास जूनियर ठाकरे के लिए उपहास के अतिरिक्त कुछ नहीं था।


राज ठाकरे से भिन्न उद्धव ठाकरे का व्यक्तित्व नरम है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने सोचा कि वे उद्धव के नेतृत्व वाली सेना पर सवारी कर सकते हैं। दिल्ली के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी भाजपा ने सेना को कोई महत्व नहीं दिया। सेना, खास तौर से उद्धव ने इस अपमान को दिल पर ले लिया। तब भाजपा ने कुछ सीटों का प्रस्ताव देकर यह कहते हुए उन्हें पुचकारने का प्रयास किया कि अब भाजपा ‘बड़ा भाई’ है। सेना अपने कम संख्या बल की वजह से प्रतिकार नहीं कर सकी। लेकिन यह असहनीय हो गया जब तब के भाजपा अध्यक्ष और अब केन्द्रीय गृह मंत्री ने पहले मुख्यमंत्री-पद का वायदा कर और बाद में इससे पीछे हटकर धोखा दे दिया।

भाजपा और शिव सेना- दोनों का मिलाकर विधानसभा में संख्या बल 161 है। इसमें भाजपा की सीटें 105 हैं। उद्धव समझ गए कि भाजपा का खेल तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक, पंजाब में अकालियों, आंध्र प्रदेश में वाई एस आर कांग्रेस, तेलंगाना में टीआरएस आदि-जैसे क्षेत्रीय दलों को निगल लेना है। शिव सेना, शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी और कांग्रेस में विचाराधारात्मक, संगठनात्मक या सामाजिक तौर पर कुछ भी आम नहीं है। उनके ’वोट बैंक’ अलग हैं, उनके कार्यक्रम भिन्न हैं, उनके नेतृत्व की शैली अलग हैं और फिर भी, तीनों पार्टियों को भय है कि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा उन पर ग्रहण लगा देगी। लेकिन एक बात तीनों में समान थीः मोदी-शाह के आतंक को रोकने की मजबूरी। महा विकास आघाड़ी इसलिए राजनीतिक आवश्यकता की उपज है।

उद्धव शांत चित्त हैं, वह आडंबरपूर्ण राजनीतिक इच्छाएं नहीं दिखाते, उन्होंने कभी दावा नहीं किया कि वह सभी समाधान जानते हैं, दूसरे दलों के नेताओं, वरिष्ठ नौकरशाहों तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों एवं यहां तक कि मीडिया से भी सीखने को वह तैयार रहते हैं। साम-दाम-दंड-भेद- किसी भी तरह सत्ताच्युत कर देने की जुगत में लगे राजनीतिक विरोध, बहुत संशयात्मक और अविश्वसनीय मीडिया तथा सीबीआई, एनआईए, ईडी, एनसीबी या आयकर-जैसी केन्द्रीय एजेंसियों के जरिये प्रतिशोध की राजनीति को उन्होंने झेला है। इन सबसे ऊपर, केन्द्रीय गृह मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय सरकार गिराने में सक्रिय रुचि ले रहे हैं। यहां तक कि महामारी के समय का भी सरकार को बदनाम करने और मुट्ठी में करने में उपयोग किया गया। लेकिन उद्धव ने अपना आपा नहीं खोया।

शरद पवार और उद्धव ठाकरे सटीक क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन्हें सोनिया गांधी और राहुल गांधी का पूरा समर्थन है। शिव सेना के मुखपत्र सामना के कार्यकारी संपादक संजय राउत उनके और सेना के बीच महत्वपूर्ण लिंक बन गए हैं। संदेह करने वाली और संशयी नौकरशाही और मीडिया तथा चिंतित लोग सत्तारूढ़ गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे को स्वीकार करने लगे हैं।

यह अब साफ है कि भाजपा ने महाराष्ट्र में अपनी जमीन खो दी है। बिजनेस-जैसी उद्धव की शैली, पवार की राजनीतिक कुशाग्रता और राहुल गांधी की नम्रता ने उन लोगों को एक साथ बांधे रखा है।

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