मृणाल पांडे का लेखः मां-बाप के आईने में बेरोजगारी

आज पूरे साल काम मिलना शहरों और गांवों हर जगह कम होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों में मनरेगा भी सिकुड़ा है और औपचारिक क्षेत्र, शिक्षा और हुनरमंदी का बेहतर स्तर मांगने लगा है। ऐसे में ये दोनों बातें महिलाओं को रोजगार के दायरे से हटा रही हैं।

फोटोः नवजीवन ग्राफिक्स
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मृणाल पाण्डे

बेरोजगारी की वह समस्या, जिसे सरकार खुद अपने ही ताजा (एनएसएसओ 2017-18 के) आंकड़ों में भारी उछाल देख कर नकारने पर तुली हुई है, पिछले दशक में हमारी आंखों के सामने ही क्रमश: बनी है। हर साल खबरें आती हैं कि पुलिस या रेलवे की सरकारी नौकरियों की भर्ती खुलने पर जब कुछ हजार नौकरियों के लिए लाखों युवा पहुंच गए तो भारी भगदड़ मची। अपने शिक्षित बेरोजगार बच्चे को कहीं ‘लगवा’ देने की दयनीय याचना करने वाले भी हर कहीं मिल जाते हैं।

भारत में आजादी के चार दशकों तक समाजवाद अगर बहुत स्वीकार्य बना रहा तो इसी वजह से, कि उसने इस दौरान भरपूर सरकारी नौकरियों का सृजन किया। पर इससे मध्य वर्ग का आकार भी फैलता गया और महत्वाकांक्षाएं भी। सामान्य किराना व्यापारी, बैंकों के क्लर्क, प्रैक्टिसविहीन वकील और डॉक्टर, लेक्चरर, सेल्स प्रतिनिधि, बड़े किसान- सबने पेट काटकर अपने बच्चों को उन शिक्षा संस्थाओं में भेजना शुरू किया जहां बड़े लोगों के बच्चे पढ़ते थे।

फिर शिक्षा लोन की आकर्षक शुरुआत हुई, तो लोन लेकर बच्चे को पढ़ाने के इच्छुक माता-पिता की मांग देखकर कई राज्यों के राजनेताओं ने (इतना पैसा और किसके पास था?) बेशुमार निजी मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज खोल दिए, जहां से डिग्रीधारी डॉक्टरों-इंजीनियरों की एक बड़ी बाढ़ निकली और नौकरियों के अभाव में साल 2000 तक बेरोजगारों की संख्या एक करोड़ से एक करोड़ बीस लाख तक जा पहुंची।

यह फिर एक चुनाव का साल है और सरकार साल 2017-18 के विकराल बेरोजगारी के उन आंकड़ों को नकार रही है, जो बरसों से अंतरराष्ट्रीय तौर से भरोसेमंद आंकड़े देती आई सरकार की सांख्यिकीय संस्था ने तैयार किए थे। इस बीच जाने किस तरह रपट मीडिया में लीक हुई। सरकार उस रपट को एक ड्राफ्ट रपट बता रही है जिसे अभी नीति आयोग सरीखी छन्नी से छाना जाना है। विचित्र बात है।

ये आंकड़े किसी राजनीतिक विश्लेषण या अनुमान से नहीं, वैज्ञानिक तौर से तैयार किए मानकों पर प्रशिक्षित प्रतिनिधियों द्वारा घर-घर जाकर जमा किए गए सैंपलों के बहुत बड़े जखीरे से अनुभवी लोगों द्वारा तैयार किए जाते हैं। आज तक कभी भी उनकी विश्वसनीयता को किसी अन्य सरकारी संस्था से जंचवाया नहीं गया। जनगणना के आंकड़ों की ही तरह उनको भी मिलते ही साल-दर-साल जारी किया जाता रहा है। अचरज नहीं कि सरकार द्वारा इस बार के आंकड़ों को बदस्तूर अपलोड न करने के विरोध में संस्था प्रमुख और उनकी एक महिला सहयोगी ने पद से इस्तीफा दे दिया है।

अब मीडिया पर सरकारी लोग पूछ रहे हैं, आंकड़े जब तक पुष्ट नहीं होते सबूत क्या है कि बेरोजगारी बढ़ रही है? माता- पिता का सीधा जवाब है कुछ सौ नौकरियों के जुगाड़ को हर राज्य में जुटने वाली लाखों युवा बेरोजगारों की कतारें। उसमें जो खड़े हैं हमारे ही तो बच्चे हैं। पूछा जाता है पर इन सबको सरकारी नौकरियां ही क्यों चाहिए? गैर सरकारी क्षेत्र क्यों नहीं जॉइन करते, जहां आय लगातार बढ़ रही है। खेती अब दुबला चली है। पर हमारा उछाल भरता कॉरपोरेट क्षेत्र आज नई तरह की नौकरियों का कहीं बड़ा उत्पादक बन चुका है और बना रहेगा। जी, रहेगा।

लेकिन सच यह भी है कि आज भी शहर और गांव हर कहीं अधिकतर निजी क्षेत्र की नौकरियां सरकारी नौकरियों की तुलना में स्थायित्व, स्वास्थ्य सेवा, पेंशन और भत्तों के पैमाने पर उनसे कहीं कम ठहरती हैं। और अमूमन ट्रेनिंग पीरियड में एक प्रशिक्षित इंजीनियर या एमबीए डिग्रीधारक को बड़ी नामी निजी कंपनियां भी जो वेतन देती हैं, वह सब तरह के भत्ते सुविधाओं को मिलाकर एक सरकारी चपरासी को मिल रही तनख्वाह से कम ही ठहरता है।

अब जिनको लोन चुकाना है, शादी ब्याह, पक्की नौकरी और माता-पिता के बुढ़ापे की फिक्र करनी है, वे कब तक दशा सुधरने का इंतजार करेंगे? पूछा जाता है अगर सचमुच स्थिति इतनी संगीन है तो सड़कों पर अराजकता क्यूं नहीं दिखती? तो साहब, दैनिक भत्ते पर गोरक्षक बनकर, तो कहीं पार्कों में वैलेंटाइन डे मनाते जोड़ों के खिलाफ डंडा भंजाते फिर रहे युवा, सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों के लिए ट्रोलिंग कर विषवमन कर रहे ट्रोल्स, ये सब बेरोजगारों की बड़ी फौज के ही अंश हैं जिनको येन-केन पैसा कमाने से मतलब है।

रही बात उनके अभिभावकों की, तो मराठा, गुर्जर, पाटिल सरीखे बड़े जोतदार जाति समूहों के बुजुर्ग जो अतिरिक्त आरक्षण के लिए रेलों की पटरियों पर धरने दे रहे हैं, उनके कोप की जड़ें भी सीधे अपने बाल-बच्चों के भविष्य में हैं? महाराष्ट्र सरीखे तरक्कीयाफ्ता निजी क्षेत्र वाले राज्य में आरक्षण 75 फीसदी तक किस लिए उछल गया? ऊबर या ओला सरीखी टैक्सी चालक नौकरियों को दिखा कर कहा जाता है, देखो कितने नए रोजगार सृजित हो रहे हैं।

पहली बात, अधिकतर चालक दो-दो कंपनियों के लिए काम कर रहे हैं, सो उनकी तादाद वस्तुत: प्रचारित तादाद से कम है। रही बात नए हुनरमंद डॉक्टरों, चार्टर अकाउंटेंटों द्वारा नए रोजगारों की चेन बनाने की, सो उनका पहला काम तो खुद अपने लिए ठीक-ठाक काम जुगाड़ना होता है। तनिक सोचें कि 2014 से पहले बड़ी तादाद में जो डॉक्टर, अकाउंटेंट, इंजीनियर निकले भी, उन्होंने कितने रोजगारों का सृजन किया है? किया होता तो देश में 45 सालों में सबसे अधिक बेरोजगार नहीं होते।

रही बात मुद्रा लोन की, सो लोन पहले भी मिलते थे बस उनका नाम बदल कर मुद्रा लोन कर दिया गया है। यह लोन भी वही 26,000 से 27000 रुपये तक के हैं, जिनमें कितने रोजगारों का सृजन हो सकता है यह सहज सोचा जा सकता है। मुद्रा योजना का आकर्षक तत्व था, सरकार द्वारा सफल योजनाओं का समय-समय पर पुनर्मोद्रीकरण करने की घोषणा। लेकिन रोजगार विषयक सरकार द्वारा जारी अंतिम डाटा 2015-16 का है, जिसके तहत अपना रोजगार कर रहे लोगों में से 67 फीसदी लोग महीने में कुल 7500 रुपये कमाते हैं। अब इतने में ठीक-ठाक मुनाफे और निवेश की कितनी गुंजाइश बनेगी? अब तक ऐसे कुल पांच फीसदी उपक्रमों को ही लोन पर लोन दिया गया है।

आज सारे साल काम मिलना शहरों-गांवों दोनों जगह कम हो रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा सरीखे राज्यों से अंशकालीन रोजगार से उचाट होकर बेहतर काम की तलाश में युवाओं के अन्यत्र पलायन की यह एक बड़ी वजह है। मनरेगा भी सिकुड़ा है और औपचारिक क्षेत्र शिक्षा और हुनरमंदी का बेहतर स्तर मांगने लगा है, यह दोनों बातें महिलाओं को रोजगार के दायरे से हटा रही हैं। उधर स्पर्धा बढ़ी है पर सामान्य छोटे शहरों के निजी स्कूल भी बड़े शहरों के नामी-गिरामी स्कूलों के छात्रों से स्पर्धा कर पाने लायक शिक्षा देने में असमर्थ हैं। घूम-फिर कर अपने बच्चों की महत्वाकांक्षाओं से सभी मां-बाप समझौता कर लेते हैं।

सो जमीन, गहने बेचकर लोन लिए जाते हैं, जरूरी खर्चे स्थगित कर दिए जाते हैं, पर यह स्थिति का हल नहीं बनता। बस बेहतरीन नौकरी पाने के सपने धारकों में हर साल हजारों नए नाराज युवा जुड़ जाते हैं। स्कूली पढ़ाई के बाद संपन्न लोग तो अब बड़ी तादाद में बच्चों को विदेश भेजने लगे हैं, क्योंकि बड़े नामी शिक्षण संस्थानों को भी पढ़ाने के लिए उपयुक्त फैकल्टी खोजे नहीं मिलती। पर शेष मध्यवर्गीय युवा जिन निजी संस्थानों में जा रहे हैं, वहां फीस मोटी है, पर अल्पकालिक या विजिटिंग फैकल्टी का प्रयोग आम होता जा रहा है। इन संस्थानों के छात्र जब प्रतियोगिता में चयनित नहीं होते तो माता-पिता की कुर्बानियों का बोझ ढो रहे उनके मन की दशा हर रिजेक्शन के बाद कैसी होती है आप अनुमान कर सकते हैं।

व्यवस्था के साथ स्वप्नदर्शी माता-पिता से भी नाराज बेटे आज घर-घर में हैं। उनका गुस्सा, उनकी ग्लानि उन लाखों की है जिनको नौकरी लायक अर्हता पाने को स्कूल से निकलते ही मंहगे ट्यूशनों और फिर कोटा या लखनऊ या इंदौर या चैन्ने वनवास पर भेजा जाता रहा है, जिनको मीडिया लगातार बताकर उत्साहित करता रहता है कि किस तरह अमुक संस्था के कैंपस चयन में किसकी लॉटरी लग गई। पर जमीन पर वे पाते हैं कि तकलीफदेह वनवास भुगत कर नौकरी पा जाने के बाद भी कंपनी में ताजपोशी उनकी ही होनी है, जिनके पिता या परिवार की कंपनी है। या फिर कई बार जो तेजी से प्रोन्नत होंगे, वो वे युवा होंगे जिनके माता-पिता का कंपनी मालिकान के साथ उठना बैठना रहा है। जब खाते-पीते राजनेता इन तकलीफ झेल रहे से पुरमजाक लहजे में कहते हैं कि क्यों न वे स्वरोजगारी बनकर पकौड़ों का ठेला लगाएं, तो उनका क्रोध से फनफनाना स्वाभाविक है। क्या बेरोजगारी के असली आंकड़ों को दरी तले सरकाने वाले यह बात समझ रहे हैं?

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