योगी का अनोखा पुलिस रिफॉर्म, अब यूपी पुलिस को बना दिया 2002 वाली गुजरात पुलिस

लगता है कि उत्तर प्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान पुलिस वाले लॉ एंड आर्डर मेन्टेन करने नहीं, बल्कि युद्ध लड़ने किसी बॉर्डर पर खड़े थे और सामने अपने देश के नागरिक न होकर दुश्मन थे, जिनपर नफरत की हद पार करके वार करना है।

फोटोः सोशल मीडिया
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कुमार मयंक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो, लगता है, पुलिस रिफाॅर्म पर खासा ध्यान दिया है। सचमुच, उन्होंने आज की यूपी पुलिस को 2002 की गुजरात पुलिस में बदल दिया है। योगी के लिए रिफाॅर्म का यही मतलब है। उनके राजकाज को देखकर तो यही लगता है। वैसे भी, आज की राजनीति में दो ही लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नक्शेकदम, माफ करें, पदचिह्नों पर चलने वाला माना जाता है- पहले, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और दूसरे, सीएम योगी आदित्यनाथ।

अब कुछ बातों पर ध्यान दें। संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का देशव्यापी विरोध हुआ। 20 प्रदेशों के 200 से अधिक शिक्षण संस्थान इस आंदोलन के केंद्र बने। लेकिन इस आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा 20 मौतें उत्तर प्रदेश में ही हुईं- सभी पुलिस की गोली या लाठी से। आखिर वजह क्या है? वजह हैं- प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो पुलिस से कहते हैं कि आंदोलनकारियों द्वारा तोड़ी गई सार्वजनिक संपत्ति का बदला उनकी निजी संपत्ति को नीलाम कर, मुआवजा वसूल कर लिया जाएगा।

योगी इस मायने में देश के पहले मुख्यमंत्री होंगे जो किसी सार्वजनिक आंदोलन का बदला लेने के लिए अपनी पुलिस को उकसा रहे हों। पुलिस ने उनकी बात सिर माथे पर रखा। जमकर लाठीचार्ज किया। आंसू गैस ही नहीं, स्टन गन के भी गोले छोड़े। गोली हवा में कम चलाई, आंदोलनकारियों पर ज्यादा। वे भी बिना किसी चेतावनी के। और तो और, मुफ्त में मुसलमानों को हिदायत भी दे डाली- ‘यहां अच्छा नहीं लगता तो पाकिस्तान चले जाओ। खाओगे यहां का, गाओगे वहां का, ऐसा अब नहीं चलेगा।’

योगी ने आंदोलन शुरू होते ही उससे निपटने के तरीके तय कर दिए। उन्होंने कहाः वे सब समाज विरोधी तत्व हैं जो लोगों को बहका-फुसला रहे हैं। वे सिर्फ समाज में गतिरोध पैदा करना चाहते हैं। उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। उन्हें अच्छा सबक सिखाएंगे। जो लोग सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं, वीडियोग्राफी द्वारा उन्हें पहचाना जाएगा। इसका बदला लेने के लिए उनकी संपत्तियां जब्त कर नीलाम की जाएंगी और उससे मुआवजा वसूला जाएगा।

पुलिस के निशाने पर मुस्लिम बहुल शहर और मोहल्ले रहे। बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, मुरादाबाद आजमगढ़- सभी जगहों पर पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों ने ज्यादतियों की सभी हदें पार कर दीं। केंद्रीय विश्वविद्यालय- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) पर उन्होंने खास नजरें इनायत कीं। शांतिपूर्वक प्रदर्शन करते छात्रों पर स्टन ग्रेनेड दागे गए, जिनका इस्तेमाल सामान्यतया युद्ध भूमि में किया जाता है। दो छात्रों के हाथ कटकर अलग हो गए। कई छात्र अब भी अस्पतालों में हैं।

ध्यान रहे, प्रधानमंत्री मोदी ने भी पहले ही कह दिया था कि विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोगों को उनके कपड़ों से ही पहचाना जा सकता है। बस, फिर क्या था? पुलिस का असली चेहरा सामने आ गया। लखनऊ का एक वायरल वीडियो बहुत कुछ कहता है। इसमें एक पुलिसवाला प्रदर्शनकारियों से कहता नजर आता हैः ‘सड़क क्या तेरे बाप की है जो इसपर विरोध-प्रदर्शन करोगे? जाओ, भागो, घर के अंदर जाकर प्रदर्शन करो’। एक व्यक्ति के यह कहने पर कि कम-से- कम हमारा ज्ञापन तो ले लीजिए, पुलिस अधिकारी गाली देते हुए कहता हैः ‘क्या सरकार हमें तनख्वाह तेरा ज्ञापन लेने के लिए देती है?’

यही नहीं, पुलिस ने अपने ही पूर्व महानिदेशक 77 वर्षीय आईपीएस ऑफिसर एसआर दारापुरी को उनके घर से गिरफ्तार किया, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने फेसबुक पर लोगों से नागरिकता कानून और एनआरसी के खिलाफ शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने को कहा था। यही नहीं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के जुर्म में उनके घर को नीलाम करने का नोटिस उनकी बीमार पत्नी को तब मिला जब वह जेल में थे।

यहां आपको कुछ याद आया? जिस भी पुलिस अधिकारी- पूर्व या वर्तमान, ने गुजरात में 2002 की घटनाओं पर जरा भी सवाल उठाया, उनके साथ क्या-क्या हुआ और हो रहा है। यहां उसका स्मरण हो आना स्वाभाविक ही है। इसलिए यह खटका भी होता है कि योगी कहीं आज के यूपी को 2002 का गुजरात तो नहीं बनाना चाहते।

लगता है, वह भूल गए हैं

अपने 25 वर्षों के राजनीतिक जीवन में योगी ने न जाने खुद भी कितने ही आंदोलनों का नेतृत्व किया और खुद कितनी सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। एक टीवी इंटरव्यू में योगी आदित्यनाथ ने स्वीकार भी किया था कि उन पर एक दर्जन से ज्यादा आपराधिक मुकदमे हैं। इनमें से अधिकतर सरकारी काम में बाधा पहुंचाने, सरकारी संपत्तियों को नष्ट करने, आगजनी करने और शांतिभंग की संभावना- जैसे मामले हैं। उन्होंने कहा था कि लोकहित में ऐसे 100 मुकदमों का सामना करने को भी मैं तैयार हूं। शायद उनके लिए लोकहित का अर्थ सीमित ही है।

तीन साल पहले हरियाणा में महीनों चले जाट आंदोलन के दौरान रोहतक और आसपास के इलाकों में लगभग 35,000 करोड़ रुपये (4.9 बिलियन डॉलर) की सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान का आकलन किया गया था। वहां भी बीजेपी की ही सरकार थी और अब भी है। क्या वहां के आंदोलनकारियों से मुआवजा वसूला जाएगा? क्या इतना साहस है बीजेपी के पास? शायद नहीं, क्योंकि हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर हैं जो एक जाट नेता दुष्यंत चैटाला की पार्टी के समर्थन से सरकार चला रहे हैं। जिस दिन यह समर्थन वापस, उसी दिन खट्टर सरकार भी वापस!

बीजेपी के कई नेता 1974 आंदोलन में भाग ले चुके हैं। उस दौरान पूरे देश में, खासतौर से गुजरात और बिहार में, महीनों बंद कराया गया, हड़ताल की गई और तब भी जनसंपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था। इस आंदोलन में मोदी सहित आज की सरकार के कई मंत्री शामिल थे। अब वही लोग छात्र आंदोलन को दबाने के लिए कड़े-से-कड़े कदम उठा रहे हैं।

वैसे, यूपी पुलिस पहले भी हिंसा होने पर बेकुसूर लोगों को मार डालती थी, घरों में घुसकर लूटपाट भी करती थी, पर वह कभी यह नहीं कहती थी कि तुम लोगों को तो अब पाकिस्तान ही चले जाना होगा, चले जाओ। इस बार उसका नया चेहरा है- बहुत कुछ 2002 गुजरात पुलिस जैसा। ऐसा लगता है कि सीएए और एनआरसी के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षाकर्मी लॉ एंड आर्डर मेन्टेन करने नहीं, बल्कि युद्ध लड़ने किसी बॉर्डर पर खड़े थे और सामने वाले लोग उसके अपने देश के नागरिक न होकर दुश्मन थे, जिन पर नफरत की हद पार करके वार करना है।

वैसे, यूपी में अपराधों पर काबू पाने के नाम पर पुलिस मुठभेड़ों में अपराधियों को मार गिराने के मामले भी इसी तरह के हैं। इनमें से अधिकतर पर विवाद हुए। कई बार आरोप लगे कि इन मुठभेड़ों में समुदाय विशेष के लोगों को ही निशाना बनाया गया। गोरक्षा का मुद्दा भी ऐसा ही रहा। गांव-गांव, शहर-शहर में योगी के गोरक्षक दलों ने गाय बेचने या ले जाने के आरोप लगाकर मुसलमानों को पीटा। कई जगहों पर अखलाक- जैसे लोग इस नाम पर पिटाई में मारे भी गए।

असंतोष पर काबू पाने का तरीका?

आदित्यनाथ अपने कार्यकाल का आधा समय पूरा कर चुके हैं। लेकिन इस दौरान यह आरोप आमतौर पर लगता रहा है कि उन्होंने पुलिस और नौकरशाही में अपने सजातीय लोगों को विशेष जगह दी जबकि आम आदमी और उनके प्रतिनिधि विधायक तो दूर, उन्होंने अपने मंत्रियों से ही मिलना बंद कर दिया। हालत यह हो गई कि पिछले महीने 200 से अधिक विधायकों ने विधानसभा में पूरे दिन धरना दिया क्योंकि नौकरशाहों ने मुख्यमंत्री के निर्देश पर उनकी बातें सुनना बंद कर दिया है। इनमें बड़ी संख्या में बीजेपी के विधायक भी शामिल थे। शायद इस तरह का निर्देश देकर योगी उस असंतोष पर भी काबू पाना चाह रहे हैं। संदेश तो बिल्कुल साफ हैः लाइन में आओ या....।

लेकिन यह तो याद करें योगी

योगी आदित्यनाथ गोरक्ष पीठाधीश्वर भी हैं। लगता है, राजनीति में आने की वजह से वह अपने धर्म-कर्म की कुछ बातें भूल गए हैं। एक बात तो उन्हें याद दिलाना जरूरी है। वह नाथपंथी हैं। कान में मुद्राधारण करते हैं- नाथपंथी जोगी दीक्षा के समय कान फाड़कर जो कुंडलप हनते हैं, उसे मुद्रा कहते हैं। आदित्यनाथ सोने की मुद्रा पहनते हैं। वह वर्जित है। उन्हें दर्शनी पहननी चाहिए जो सींग की बनी होती हैं और कुंडल नहीं जो धातु से बनी होती है। राजा भरथरी को मिट्टी का कुंडल उनके गुरु ने पहिराया था। मिट्टी या सींग की बनी दर्शनी का सोने के कुंडल से अधिक महत्त्व है जिसे धारण करने वाला ब्रह्म से साक्षात्कार कर चुका माना जाता है। कबीर के समय तक धनिक महंत सोने के कुंडल पहनने लगे थे, जिनकी उन्होंने यह कहते हुए खिल्ली भी उड़ाई हैः ‘भये विरक्त लोभ मन ठाना, सोना पहिरि लजावैं बाना।’

योगी भूल गए मुसलमान भी रहे हैं गोरखपंथी

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, गोरखपंथ के संस्थापक गुरु गोरखनाथ का जन्म विक्रमी संवत की 10वीं सदी में हुआ। यह समय भारतीय साधना के इतिहास में भारी उथल-पुथल का काल है- जब एक तरफ इस्लाम दरवाजा खटखटा रहा था, दूसरी तरफ बौद्ध साधना तंत्र-मंत्र की तरफ बढ़ रही थी। बौद्धों, शाक्तों और शैवों के कई संप्रदाय इस समय उपजे जिनमें सभी धर्मों के कुछ-कुछ तत्व गुरुओं ने लिए लेकिन यह तमाम साधना मार्ग ब्राह्मण और वेदों को धर्म की धुरी नहीं मानते थे इसलिए उनको वेद बाह्य माना गया। गोरखपंथ भी मूलतः इनमें से ही एक था।

गुरु गोरखनाथ ने पातंजलि के अष्टांग योग से छह अंगों को लेकर योग मार्ग से ब्रह्म को पाने की साधना का उपदेश दिया। बाद की सदियों में जैसे-जैसे इस्लाम राजनैतिक तौर से हावी हुआ, हर तरह के संप्रदाय पर हिंदू अथवा मुस्लिम खेमों में शामिल होने की स्थिति बन गई। गोरखनाथ ने ऐसे कई वेद विरोधी मार्गों- सांख्य, बौद्ध, जैन, शाक्तादि, को संगठित किया और उनके चेले हिंदू और मुसलमान- दोनों ही बने, खासकर वयनजीवी (जुलाहे) जो हिंदू भी थे और मुसलमान भी। साल 1891 की जनगणना में नाथपंथी जोगियों की तादाद 2,14,546 बताई गई है जिनमें गोरखनाथी 28,816 थे। जबकि साल 1921 की जनगणना में मुसलमान जोगी 31,158 थे, जबकि हिंदू जोगियों की संख्या 6,29,978 थी। आज योगी आदित्यनाथ जब मुसलमानों के प्रति बेवजह आक्रोश जताते हैं, वह उनकी परंपरा में कतई नहीं है।

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