नोटबंदी के बाद जीएसटी की मार से गंभीर संकट में है असंगठित क्षेत्र

नोटबंदी और जीएसटी की मार से असंगठित क्षेत्र गंभीर संकट में

सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी की दस्तकारी हो या मुरादाबाद और मिर्जापुर की पीतल की हुनरमंदी हो नोटबंदी के बाद इन छोटे स्तर के कारोबारों में जो कठिनाईयां शुरू हुईं, वे जीएसटी लागू होने के बाद से और जटिल हो गई हैं। 

जीएसटी के एक साल पूरा होने पर सरकार की ओर से जहां सफलता के दावे बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किए गए, वहीं इसी समय के आसपास अनेक छोटी औद्योगिक इकाईयों, दस्तकारियों और असंगठित क्षेत्र के बारे में प्रकाशित अनेक रिपोर्टों ने उद्यमियों और मजदूरों की बढ़ती समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया है। चाहे सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी की दस्तकारी हो या मुरादाबाद और मिर्जापुर की पीतल की हुनरमंदी हो, इन रिपोर्टों ने बताया है कि नोटबंदी के बाद इन छोटे स्तर के कारोबारों में जो कठिनाईयां शुरू हुईं, वे जीएसटी लागू होने के बाद और जटिल हो गईं। हालात ये हो गए कि अनेक हुनरमंदों को तो काम छोड़कर रोजी-रोटी के लिए दूसरे काम तलाशने पड़े।

वैसे भी छोटे उद्योगों, दस्तकारी आदि असंगठित क्षेत्र की अपनी बहुत सी समस्याएं पहले से चल रही थीं। जरूरत थी सावधानी से उन्हें सुलझाने की। इसके स्थान पर उन्हें नोटबंदी और जीएसटी के रूप में एक के बाद एक दो धक्के ऐसे मिले जिनसे वे संभल नहीं सके। इनमें से अनेक इकाईयां जहां संकट में पड़ गईं, वहीं कुछ में कार्यरत मजदूर या दस्तकार पहले से कहीं कम हो गए और कुछ इकाईयां तो बंद ही हो गईं।

नोटबंदी का संकट गंभीर था, फिर भी वह अस्थाई था। दूसरी और जीएसटी ने अनेक छोटे और कुटीर स्तर के कारोबारियों के लिए जो समस्याएं उत्पन्न कीं वे अधिक स्थाई किस्म की हैं।

चूंकि असंगठित क्षेत्र रोजगार की दृष्टि से संगठित क्षेत्र से कहीं बड़ा है, इस बारे में आश्चर्य व्यक्त किया गया है कि इस क्षेत्र की संकटग्रस्त स्थिति के बावजूद सरकार रोजगार सृजन संबंधी उपलब्धियों के बड़े आंकड़े कैसे प्रस्तुत कर रही है। वास्तव में केंद्रीय सरकार ने रोजगार सृजन संबंधी जो आंकड़े हाल में प्रस्तुत किए हैं, उनकी विश्वसनीयता बहुत कम है। यदि यह मान भी लिया जाए कि संगठित क्षेत्र के कुछ हिस्सों में कुछ वृद्धि हुई है, तो भी असंगठित क्षेत्र में हुई क्षति उससे कहीं अधिक है। कुछ मजदूरों का वर्गीकरण अलग से हो रहा है, कुछ मजदूरों को एक से अधिक बार गिना जा रहा है। इस तरह रोजगार वृद्धि की एक भ्रमित तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है जो वास्तविक स्थिति से कहीं भिन्न है। असंगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़ा नहीं है, बल्कि कम हुआ है, अथवा जो आजीविका पहले से उपलब्ध थी, उसकी आय अर्जन क्षमता पहले से कम हुई है।

दूसरी पहेली सुलझाने के लिए यह है कि अगर रोजगार वृद्धि नहीं हो रही है तो सरकार द्वारा प्रस्तुत ऊंची आर्थिक संवृद्धि दर या जीएनपी में अधिक वृद्धि को किस तरह समझा जा सकता है। विशेष स्थितियों में ऐसा संभव तो है कि जीएनपी में वृद्धि हो पर रोजगार में वृद्धि न हो। इसे रोजगारविहीन आर्थिक संवृद्धि या जॉबलेस ग्रोथ कहा जाता है। यह स्थिति अनेक देशों में कई बार देखी गई है। पर फिलहाल हमारे देश की हाल की आर्थिक स्थिति को समझने का यह महज एक पक्ष है। इससे पूरी स्थिति को नहीं समझा जा सकता है।

दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि आर्थिक संवृद्धि के जो बड़े आंकड़े प्रस्तुत किए जा रहे हैं, वे स्वयं ही अतिश्योक्तिपूर्ण है। इसमें एक पेंच तो यह है कि आर्थिक संवृद्धि की दर निकालने के तौर-तरीकों में, मापकों में कुछ बदलाव हाल के समय में किये गए हैं जिससे अतिश्योक्तिपूर्ण तस्वीर सामने आ रही है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात है कि अल्पकालीन संवृद्धि के आंकड़ों में संगठित क्षेत्र की कवरेज अधिक होती है और असंगठित क्षेत्र की कम होती है या देर से होती है। अतः ऐसे दौर में जब असंगठित क्षेत्र विशेष कारणों से संकट के दौर से गुजर रहा हो, अल्पकालीन संवृद्धि के उन आंकड़ों को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है जो असंगठित क्षेत्र में आए बड़े अदलाव का भली-भांति संज्ञान न ले सकते हों।

वास्तविकता यह है कि यदि असंगठित क्षेत्र में चल रहे संकट के दौर को भली-भांति संज्ञान में न लिया जाए तो रोजगार वृद्धि के आंकड़ों की विश्वसनीयता बहुत कम रह जाती है और काफी हद तक आर्थिक संवृद्धि के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल उठते हैं।

सुधार के लिए जरूरी है कि पहले मौजूदा स्थिति, मौजूदा संकट को भली-भांति समझा जाए। पर यदि अनुचित अतिश्योक्तिपूर्ण जानकारियों और आंकड़ों के भ्रमजाल में फंसाकर असंगठित क्षेत्र के मौजूदा संकट से ही ध्यान हटा दिया जाएगा, तो फिर असंगठित क्षेत्र के कारोबारियों और मजदूरों को समय पर सहायता पहुंचाने की नीतियां और योजनाएं कैसे बन सकेंगी। इसलिए जरूरत तो इस बात की है कि असंगठित क्षेत्र के मौजूदा संकट की सही पहचान बनाई जाए और फिर इस संकट को दूर करने के अनुकूल नीतियां अपनाई जाएं।

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